-कुछ रिश्ते धुएं की तरह होते हैं, दिखते नहीं… मगर सांसों में घुले रहते हैं"
विनोद कुमार झा
बरसात की वह शाम जैसे अपने भीतर हजारों अनकहे दर्द छिपाए बैठी थी। आसमान में काले बादल थे, हवा में भीगी मिट्टी की खुशबू थी, और रेलवे स्टेशन के पुराने प्लेटफॉर्म पर बैठी एक लड़की की आंखों में इंतज़ार की नमी थी। उसका नाम था काजल। हाथों में पुरानी डायरी दबाए वह बार-बार स्टेशन की घड़ी देख रही थी। हर गुजरती ट्रेन के साथ उसका दिल धड़क उठता, फिर बुझ जाता।
उसे इंतज़ार था राजू का। राजू… वही लड़का जिसने कभी उसकी जिंदगी को रंगों से भर दिया था। लेकिन अब वह प्यार किसी धुएं की तरह ओझल हो चुका था, पीछे छोड़ गया था सिर्फ सुलगते अंगारे।
पांच साल पहले मिथिलांचल के एक छोटे-से कस्बे में दोनों की मुलाकात हुई थी। काजल गांव के स्कूल में नई शिक्षिका बनकर आई थी। सादगी से भरी, बड़ी-बड़ी आंखों वाली काजल पूरे गांव के लिए कौतूहल का विषय थी। दूसरी ओर राजू गांव के मुखिया का बेटा था, पढ़ाई शहर से करके लौटा था और गांव में एक लाइब्रेरी खोलना चाहता था।
पहली बार दोनों की मुलाकात पंचायत भवन में हुई। “आप बच्चों को सिर्फ किताबें मत पढ़ाइए,” राजू ने मुस्कुराकर कहा था, “उन्हें सपने देखना भी सिखाइए।”
काजल ने पहली बार उसकी आंखों में देखा था। उन आंखों में अजीब-सी गहराई थी। जैसे कोई बहुत कुछ छिपाकर भी सब कुछ कह देना चाहता हो।
धीरे-धीरे दोनों मिलने लगे। कभी स्कूल के बरगद के नीचे, कभी नदी किनारे, तो कभी गांव की उस पुरानी लाइब्रेरी में जहां धूल भरी किताबों के बीच उनका प्यार सांस लेने लगा था। राजू कविताएं लिखता था। काजल उन्हें अपनी डायरी में सहेज लेती।
एक दिन राजू ने उससे कहा था, “अगर जिंदगी कभी हमें अलग भी कर दे, तो याद रखना… मेरा प्यार तुम्हारे अंदर अंगारों की तरह हमेशा जिंदा रहेगा।”
काजल हंस पड़ी थी, “प्यार अंगारे नहीं होता राजू, प्यार तो बारिश होता है।” राजू चुप हो गया था। शायद उसे आने वाले वक्त का अंदेशा था।
उनका प्यार गांव की गलियों से निकलकर लोगों की जुबान तक पहुंच चुका था। लेकिन जहां प्यार होता है, वहां नफरत की परछाइयां भी जन्म लेती हैं। काजल एक साधारण परिवार की लड़की थी, जबकि राजू ऊंची जाति और रसूख वाले घर से था। मुखिया जी को यह रिश्ता मंजूर नहीं था।
एक रात घर में राजू को बुलाकर उसके पिता ने कहा,“इश्क किताबों में अच्छा लगता है। समाज हकीकत से चलता है।” “लेकिन मैं काजल से प्यार करता हूं।” “प्यार पेट नहीं भरता।” “पर बिना प्यार के जिंदगी भी तो नहीं चलती।”
मुखिया जी ने गुस्से में मेज पर हाथ पटका, “अगर उस लड़की से रिश्ता रखा, तो इस घर से रिश्ता खत्म समझो!” राजू के भीतर तूफान मच गया। एक तरफ परिवार था, दूसरी तरफ प्यार।
उधर गांव वालों ने काजल के चरित्र पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। स्कूल जाते वक्त लोग ताने मारते। लेकिन उसने कभी राजू का साथ नहीं छोड़ा।
एक रात दोनों नदी किनारे मिले। हवा तेज थी। चांद बादलों में छिपा हुआ था। “चलो यहां से दूर कहीं भाग चलते हैं,” काजल ने कांपती आवाज में कहा। राजू चुप रहा। “तुम बोलते क्यों नहीं?” “मैं… मैं मां को छोड़कर नहीं जा सकता।”
काजल की आंखें भर आईं, “और मुझे छोड़ दोगे?” राजू के पास कोई जवाब नहीं था। उस रात पहली बार दोनों के बीच खामोशी खड़ी हो गई।
कुछ दिनों बाद अचानक खबर फैली कि काजल की शादी शहर के एक व्यापारी से तय हो गई है। यह सुनकर राजू जैसे टूट गया। वह उससे मिलने दौड़ा, लेकिन काजल ने दरवाजा नहीं खोला। अंदर बैठी वह भी रो रही थी। क्योंकि वह जानती थी जिस प्यार में साहस नहीं होता, वह सिर्फ याद बनकर रह जाता है।
समय गुजर गया। काजल की शादी हो गई। राजू गांव छोड़कर दिल्ली चला गया। उसने खुद को काम में डुबो दिया, लेकिन दिल में काजल की याद अंगारों की तरह सुलगती रही।
उधर काजल की जिंदगी भी खुशहाल नहीं थी। उसका पति पैसे वाला जरूर था, मगर दिल से बहुत कठोर। वह काजल की भावनाओं को कभी समझ नहीं पाया।
रातों में वह अपनी पुरानी डायरी निकालती और राजू की कविताएं पढ़ती- "कुछ रिश्ते धुएं की तरह होते हैं, दिखते नहीं… मगर सांसों में घुले रहते हैं।" हर शब्द उसके दिल को जलाने लगता।
पांच साल बाद उसी रेलवे स्टेशन पर दोनों अचानक आमने-सामने आ गए। काजल की आंखों में वही नमी थी। राजू के चेहरे पर थकान। कुछ पल दोनों सिर्फ एक-दूसरे को देखते रहे।
“कैसी हो?” राजू ने धीरे से पूछा। “जिंदा हूं।” यह सुनकर राजू की आंखें झुक गईं। “तुम खुश हो?” काजल ने पूछा।
राजू हल्का-सा हंसा, “कुछ सवालों के जवाब नहीं होते।” बारिश तेज हो चुकी थी। प्लेटफॉर्म पर भीड़ कम हो गई थी।
काजल ने अपनी डायरी उसकी ओर बढ़ाई और बोली यह “तुम्हारी कविताएं अब भी संभालकर रखी हैं।” राजू ने कांपते हाथों से डायरी ली। उसके अंदर एक सूखा गुलाब रखा था।
“तुमने शादी क्यों की?” राजू ने अचानक पूछ लिया। काजल मुस्कुराई, मगर वह मुस्कान दर्द से भरी थी “क्योंकि तुमने लड़ना छोड़ दिया था।” यह सुनते ही राजू जैसे भीतर से टूट गया।
ट्रेन आने की घोषणा हुई। काजल उठ खड़ी हुई। “अगर उस दिन तुम मेरा हाथ पकड़ लेते ना,” उसने कहा, “तो शायद आज जिंदगी कुछ और होती।” राजू की आंखों से आंसू बह निकले।
“मैं डर गया था।” “और मैंने सब खो दिया।” दोनों के बीच फिर खामोशी उतर आई। ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आ चुकी थी। काजल धीरे-धीरे डिब्बे की ओर बढ़ी। राजू उसे जाते हुए देखता रहा।
एक पल को काजल रुकी। पीछे मुड़ी। उसकी आंखों में अब शिकायत नहीं थी, सिर्फ थका हुआ प्यार था। “कुछ प्यार कभी खत्म नहीं होते राजू,” उसने कहा, “वे बस ओझल हो जाते हैं… और अंदर ही अंदर अंगारों की तरह सुलगते रहते हैं।”
ट्रेन चल पड़ी राजू वहीं खड़ा रहा, भीगता हुआ। उसके हाथ में पुरानी डायरी थी, और दिल में वही अधूरा प्यार… जो कभी पूरी तरह बुझ नहीं पाया।
