सजा सेज, रोती दुल्हन...

 लेखक: विनोद कुमार झा 

गांव की गलियों में उस दिन शहनाइयों की मधुर धुन गूंज रही थी। घर के आंगन रंगोली से सजे थे, दीवारों पर झालरें चमक रही थीं और रिश्तेदारों की हंसी पूरे माहौल को उत्सव में बदल रही थी। लेकिन उस चकाचौंध के पीछे कुछ आंखें ऐसी भी थीं जिनमें खुशी से ज्यादा चिंता तैर रही थी। दुल्हन बनी साजल अपने कमरे में सजी हुई सेज के पास बैठी थी, मगर उसकी आंखों की नमी उसके भीतर के तूफान को छिपा नहीं पा रही थी।

साजल के पिता रामकिशोर गांव के सम्मानित व्यक्ति थे। उन्होंने अपनी बेटी की शादी में कोई कमी नहीं छोड़ी थी। वर्षों की जमा-पूंजी, खेत का एक हिस्सा और मां के गहने तक बेच दिए गए थे ताकि समाज के सामने उनकी इज्जत बनी रहे। मां सुशीला बार-बार साजल के माथे को चूमती और कहती,  “बेटी, ससुराल ही अब तेरा असली घर है। वहां सबका मान रखना।” लेकिन साजल जानती थी कि इस शादी में केवल उसका भविष्य नहीं, उसके परिवार की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी थी।

दूल्हा आर्यन शहर में नौकरी करता था। पढ़ा-लिखा, समझदार और आधुनिक विचारों वाला लड़का माना जाता था। गांव में हर कोई इस रिश्ते की तारीफ करता था। मगर किसी को यह नहीं मालूम था कि आर्यन का दिल किसी और के लिए धड़कता था। कॉलेज के दिनों से वह निधि नाम की लड़की से प्यार करता था। दोनों शादी करना चाहते थे, लेकिन जाति और समाज की दीवारें इतनी ऊंची थीं कि उनका रिश्ता परिवार वालों को मंजूर नहीं हुआ।

आर्यन ने बहुत विरोध किया, मगर उसके पिता ने साफ कह दिया, “हमारे खानदान में प्रेम विवाह नहीं होते। समाज में हमारी इज्जत है।” मजबूरी में आर्यन ने चुप्पी ओढ़ ली और साजल से शादी के लिए तैयार हो गया।

शादी की रात जब सभी रस्में खत्म हुईं, साजल फूलों से सजी सेज पर बैठी आर्यन का इंतजार कर रही थी। बाहर हंसी-मजाक चल रहा था, मगर कमरे के भीतर एक अजीब सन्नाटा पसरा था। थोड़ी देर बाद आर्यन कमरे में आया। उसके चेहरे पर न मुस्कान थी, न उत्साह।

साजल ने धीरे से घूंघट हटाया और संकोच भरी आवाज में बोली “बैठिए…”आर्यन ने उसकी तरफ देखा, फिर नजरें झुका लीं। कुछ पल बाद वह बोला, “मुझे तुमसे एक सच कहना है। मैं किसी और से प्यार करता हूं।”

ये शब्द सुनते ही साजल के हाथ कांप उठे। उसे लगा जैसे किसी ने उसके सपनों का गला घोंट दिया हो। आंखों में आंसू भर आए, मगर उसने खुद को संभालते हुए पूछा, “फिर मुझसे शादी क्यों की?” आर्यन की आवाज भारी हो गई,“परिवार और समाज के दबाव में…”

उस रात फूलों से सजी सेज पर बैठी दुल्हन रोती रही। बाहर लोग नई जिंदगी की खुशियों की बातें कर रहे थे और भीतर एक लड़की की दुनिया बिखर रही थी।

दिन बीतने लगे। साजल ने अपने दर्द को मुस्कान के पीछे छिपाना सीख लिया। वह घर के हर काम में खुद को झोंक देती। सास-ससुर उसकी तारीफ करते, मगर पति की बेरुखी उसके दिल को रोज तोड़ती। आर्यन उससे दूरी बनाए रखता। कई बार देर रात तक बाहर रहता।

धीरे-धीरे गांव में कानाफूसी शुरू हो गई।

“लगता है बहू में ही कोई कमी है…”

“इतनी सुंदर होकर भी पति को बांध नहीं पाई…”

समाज ने हमेशा की तरह दोष लड़की पर डालना शुरू कर दिया। एक दिन साजल ने अपनी मां को फोन पर रोते हुए कहा,  “मां, क्या औरत का जीवन सिर्फ समझौते के लिए होता है?”

मां की आंखें भी भर आईं, मगर उन्होंने खुद को मजबूत दिखाते हुए कहा, “बेटी, समाज में जीना आसान नहीं होता। हर औरत को बहुत कुछ सहना पड़ता है।” साजल चुप हो गई। उसे लगा जैसे उसका दर्द भी समाज की पुरानी परंपराओं के नीचे दबा दिया गया हो।

उधर आर्यन भी अंदर से टूट रहा था। निधि की शादी किसी और से हो चुकी थी। वह समझ चुका था कि उसने अपने प्यार को भी खो दिया और एक निर्दोष लड़की की जिंदगी भी बर्बाद कर दी। मगर अब बहुत देर हो चुकी थी।

एक शाम साजल आंगन में अकेली बैठी थी। उसकी आंखों में खालीपन था। तभी आर्यन उसके पास आया और धीमी आवाज में बोला, “मैंने तुम्हारे साथ बहुत गलत किया है।” साजल ने उसकी तरफ देखा, मगर कुछ नहीं कहा।

आर्यन की आंखें नम थीं, “तुम्हें कभी वो सम्मान और प्यार नहीं दे पाया जिसकी तुम हकदार थीं। मैं अपने दर्द में इतना डूबा रहा कि तुम्हारा दर्द देख ही नहीं पाया।”

साजल के भीतर वर्षों से दबा दर्द अचानक बाहर आ गया। वह फूट-फूटकर रो पड़ी। “मैंने इस रिश्ते को बचाने की हर कोशिश की… लेकिन हर बार खुद को अकेला पाया।” उस दिन पहली बार दोनों ने खुलकर अपने दर्द को महसूस किया। 

समय के साथ आर्यन ने खुद को बदलने की कोशिश की। उसने साजल को समझना शुरू किया। उसके साथ समय बिताने लगा। धीरे-धीरे दोनों के बीच संवाद बनने लगा। प्यार भले अचानक नहीं आया, मगर सम्मान और अपनापन जन्म लेने लगा। लेकिन समाज कहां बदलता है?

जब भी कोई झगड़ा होता, लोग ताने देने लगते, “प्रेम करने वालों की शादी कर देते तो ये दिन नहीं देखने पड़ते…” “जबरदस्ती के रिश्ते कभी सफल नहीं होते…” इन तानों ने दोनों को और मजबूत बना दिया। उन्होंने तय किया कि वे समाज के डर से नहीं, अपनी समझ और सम्मान से रिश्ता निभाएंगे।

कुछ वर्षों बाद साजल गांव की महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गई। उसने लड़कियों को पढ़ाना शुरू किया और उन्हें आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया। वह अक्सर कहती, “शादी जिंदगी का अंत नहीं, एक नया अध्याय है। अगर रिश्ते में सम्मान नहीं, तो हर चमकती सेज के पीछे एक रोती दुल्हन छिपी होती है।” उसकी बातें सुनकर कई औरतों की आंखें भर आतीं, क्योंकि वे भी कहीं न कहीं उसी दर्द को जी चुकी थीं।

एक रात आर्यन ने साजल से कहा,  “तुमने मुझे सिखाया कि प्यार केवल पाने का नाम नहीं, किसी के दर्द को समझने का नाम भी है।” साजल हल्का सा मुस्कुराई। उसकी आंखों में अब पहले जैसी नमी नहीं थी। शायद उसने दर्द के साथ जीना नहीं, दर्द से ऊपर उठना सीख लिया था।

फूलों से सजी वह सेज, जो कभी उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा दुख बनी थी, अब उसे यह याद दिलाती थी कि समाज की परंपराओं से बड़ा इंसान का सम्मान और सच होता है।

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