विनोद कुमार झा
भारत में सोना केवल धातु नहीं है। यह परंपरा है, प्रतिष्ठा है, सुरक्षा है और भावनाओं से जुड़ी ऐसी विरासत है जो पीढ़ियों से भारतीय समाज का हिस्सा रही है। बेटी के विवाह से लेकर त्योहारों तक, कठिन समय की बचत से लेकर सामाजिक सम्मान तक सोना भारतीय जीवन के लगभग हर महत्वपूर्ण अवसर में मौजूद रहता है। लेकिन जब देश का प्रधानमंत्री नागरिकों से सोने की खरीद कम करने की अपील करे, तो यह केवल व्यक्तिगत खर्च का विषय नहीं रह जाता, बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और देशहित का गंभीर मुद्दा बन जाता है।
हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने तेलंगाना और गुजरात की जनसभाओं में देशवासियों से आग्रह किया कि वे अनावश्यक रूप से सोने की खरीद से बचें। उन्होंने कहा कि भारत भारी मात्रा में सोना विदेशों से आयात करता है और इसके लिए देश की बड़ी विदेशी मुद्रा खर्च होती है। प्रधानमंत्री का यह बयान ऐसे समय आया है जब वैश्विक स्तर पर पश्चिम एशिया में तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक अनिश्चितताएं भारत जैसे विकासशील देशों के लिए गंभीर चुनौती बन रही हैं।
दरअसल, भारत दुनिया के सबसे बड़े स्वर्ण उपभोक्ता देशों में शामिल है। भारतीय परिवारों के पास हजारों टन सोना मौजूद है, लेकिन विडंबना यह है कि यह संपत्ति अर्थव्यवस्था की उत्पादक धारा में बहुत कम योगदान दे पाती है। हर वर्ष अरबों डॉलर का सोना विदेशों से आयात किया जाता है। इससे देश का व्यापार घाटा बढ़ता है और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है। जब एक ओर सरकार उद्योग, निर्यात और विनिर्माण को बढ़ावा देकर अर्थव्यवस्था को गति देने का प्रयास कर रही हो, तब दूसरी ओर बड़ी मात्रा में धन का निष्क्रिय रूप से सोने में बदल जाना आर्थिक दृष्टि से चिंता का विषय बन जाता है।
भारतीय मानसिकता में सोना हमेशा “सबसे सुरक्षित निवेश” माना गया है। शेयर बाजार में जोखिम दिखता है, बैंक ब्याज दरें कम लगती हैं, जबकि सोना लोगों को स्थिर और भरोसेमंद संपत्ति प्रतीत होता है। ग्रामीण भारत में तो सोना सामाजिक सुरक्षा का माध्यम माना जाता है। किसान परिवारों में संकट के समय सबसे पहले घर का सोना गिरवी रखा जाता है। मध्यम वर्ग के लिए यह भविष्य की सुरक्षा है और महिलाओं के लिए आत्मविश्वास एवं सामाजिक सम्मान का प्रतीक। इसलिए सरकार की अपील के बावजूद लोगों की सोच बदलना आसान नहीं है।
लेकिन यह भी सच है कि अत्यधिक स्वर्ण आयात देश की आर्थिक सेहत को कमजोर करता है। भारत पहले ही ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर विदेशी तेल पर निर्भर है। पेट्रोलियम आयात पर भारी विदेशी मुद्रा खर्च होती है। यदि उसी के साथ सोने का आयात भी तेजी से बढ़े, तो आर्थिक संतुलन बिगड़ना स्वाभाविक है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री ने केवल सोने की खरीद कम करने की अपील नहीं की, बल्कि पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने और सार्वजनिक परिवहन को अपनाने की भी सलाह दी। यह संदेश सीधे तौर पर “जिम्मेदार उपभोग” और “आर्थिक राष्ट्रवाद” से जुड़ा हुआ है।
आज दुनिया ऐसे दौर से गुजर रही है जहां वैश्विक संघर्षों का असर सीधे आम नागरिकों की जेब पर पड़ता है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने पर कच्चे तेल की कीमतें उछलती हैं। डॉलर मजबूत होता है तो आयात महंगा हो जाता है। ऐसे समय में यदि भारत जैसे विशाल देश के नागरिक संयमित आर्थिक व्यवहार अपनाएं, तो यह राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी राहत बन सकता है। प्रधानमंत्री की अपील इसी सामूहिक जिम्मेदारी की भावना को जगाने का प्रयास है।
हालांकि केवल भावनात्मक अपीलों से समाधान नहीं निकलेगा। सरकार को यह समझना होगा कि भारतीय समाज में सोने का आकर्षण केवल फैशन या दिखावे तक सीमित नहीं है। यह असुरक्षा और भविष्य की चिंता से भी जुड़ा है। जब तक लोगों को ऐसे निवेश विकल्प नहीं मिलेंगे जो सुरक्षित, सरल और लाभकारी हों, तब तक वे सोने से दूरी नहीं बनाएंगे। सरकार ने सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड जैसी योजनाएं शुरू कीं, लेकिन उनकी पहुंच अभी सीमित है। वित्तीय साक्षरता की कमी और ग्रामीण क्षेत्रों में निवेश संबंधी जागरूकता का अभाव भी बड़ी बाधा है।
जरूरत इस बात की है कि देश में निवेश की संस्कृति को व्यापक बनाया जाए। लोगों को यह भरोसा दिलाया जाए कि उनका पैसा बैंकिंग प्रणाली, म्यूचुअल फंड, सरकारी बॉन्ड, इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं और उद्योगों में लगकर न केवल सुरक्षित रहेगा बल्कि देश की प्रगति में भी योगदान देगा। यदि नागरिकों की बचत उत्पादक क्षेत्रों में जाएगी, तो उससे रोजगार बढ़ेगा, उद्योग मजबूत होंगे और अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भर बनेगी।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारतीय अर्थव्यवस्था केवल सरकारी योजनाओं से मजबूत नहीं हो सकती। इसके लिए नागरिकों की आर्थिक आदतों में बदलाव भी जरूरी है। जिस प्रकार स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान स्वदेशी आंदोलन ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को राष्ट्रभक्ति से जोड़ा था, उसी प्रकार आज आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए जिम्मेदार उपभोग को राष्ट्रीय कर्तव्य के रूप में देखने की आवश्यकता है। अनावश्यक विलासिता, अत्यधिक ईंधन खपत और गैर-उत्पादक निवेश से बचना केवल व्यक्तिगत बचत नहीं बल्कि राष्ट्रहित का विषय भी है।
इतिहास गवाह है कि जब-जब भारत कठिन दौर से गुजरा, तब जनता ने त्याग और अनुशासन का परिचय दिया। युद्धकाल में लोगों ने अपने गहने दान किए, संकट के समय बचत योजनाओं में निवेश बढ़ाया और राष्ट्रीय हित को व्यक्तिगत सुविधा से ऊपर रखा। आज का दौर भले युद्ध का न हो, लेकिन आर्थिक चुनौतियां किसी संघर्ष से कम नहीं हैं। वैश्विक प्रतिस्पर्धा, महंगाई, बेरोजगारी और आयात निर्भरता जैसी समस्याएं देश के सामने गंभीर प्रश्न खड़े कर रही हैं।
ऐसे समय में प्रधानमंत्री की अपील को केवल राजनीतिक बयान मानकर खारिज करना उचित नहीं होगा। यह एक चेतावनी भी है और अवसर भी। चेतावनी इस बात की कि यदि हमने अपनी आर्थिक आदतों पर नियंत्रण नहीं किया तो आने वाले समय में विदेशी निर्भरता और बढ़ सकती है। अवसर इस बात का कि यदि नागरिक और सरकार मिलकर जिम्मेदार आर्थिक व्यवहार अपनाएं, तो भारत आत्मनिर्भर और मजबूत अर्थव्यवस्था की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकता है।
सोने की चमक आकर्षक जरूर है, लेकिन राष्ट्र की आर्थिक मजबूती उससे कहीं अधिक मूल्यवान है। अब समय आ गया है कि भारतीय समाज निवेश और उपभोग की अपनी पारंपरिक सोच में संतुलन लाए। क्योंकि अंततः मजबूत अर्थव्यवस्था ही मजबूत राष्ट्र की सबसे बड़ी पहचान होती है।

