मिडिल-ईस्ट में सीजफायर: क्या यह शांति की शुरुआत है या तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी?

विनोद कुमार झा 

मिडिल-ईस्ट एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में खड़ा है। पिछले एक महीने से अधिक समय से चल रहे भीषण संघर्ष के बाद अमेरिका और ईरान के बीच घोषित दो हफ्तों का युद्धविराम एक राहत की सांस जरूर देता है, लेकिन ज़मीनी हालात यह संकेत देते हैं कि यह शांति बेहद नाज़ुक और अस्थायी हो सकती है। अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा अचानक सैन्य कार्रवाई रोकने का फैसला, जो पहले कड़े रुख और धमकियों से भरा हुआ था, कूटनीति के लिए एक अवसर के रूप में देखा जा सकता है। खासतौर पर तब, जब यह निर्णय और के साथ बातचीत के बाद सामने आया। इससे पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका भी उभरकर सामने आई है, जो क्षेत्रीय कूटनीति में एक अहम मोड़ साबित हो सकती है।

हालांकि, इस युद्धविराम की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। एक ओर जहां ईरान ने 10-सूत्रीय प्रस्ताव के साथ बातचीत की दिशा में कदम बढ़ाया है, वहीं दूसरी ओर ड्रोन हमले, मिसाइल इंटरसेप्शन और सीमावर्ती क्षेत्रों में विस्फोट यह दर्शाते हैं कि जमीनी स्तर पर संघर्ष पूरी तरह थमा नहीं है। द्वारा लगातार मिसाइलों और ड्रोन को रोकना इस क्षेत्र में जारी सैन्य तनाव का प्रमाण है। इसी बीच, के नेतृत्व में इज़रायल ने स्पष्ट कर दिया है कि यह युद्धविराम लेबनान पर लागू नहीं होगा। इसका सीधा अर्थ है कि हिज़्बुल्लाह के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जारी रहेगी, जिससे संघर्ष का दायरा सीमित होने के बजाय और बढ़ सकता है। लेबनान में नागरिकों को बार-बार इलाका खाली करने की चेतावनियां इस बात का संकेत हैं कि मानवीय संकट और गहराने वाला है।

ईरान की ओर से भी जो संकेत मिल रहे हैं, वे किसी स्थायी समाधान की ओर इशारा नहीं करते। ईरान के सर्वोच्च नेतृत्व ने जहां एक ओर गोलीबारी रोकने का आदेश दिया है, वहीं यह भी स्पष्ट कर दिया है कि यह युद्ध का अंत नहीं है। उनकी शर्तें—प्रतिबंधों का पूर्ण हटना, मुआवज़ा और संपत्तियों की वापसी—अमेरिका के लिए आसानी से स्वीकार्य नहीं होंगी। ऐसे में 10 अप्रैल को इस्लामाबाद में प्रस्तावित वार्ता निर्णायक साबित हो सकती है, बशर्ते सभी पक्ष ईमानदारी से समाधान की दिशा में आगे बढ़ें।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस घटनाक्रम के दूरगामी प्रभाव दिख रहे हैं। द्वारा इस सीजफायर का स्वागत और रूस-यूक्रेन संघर्ष में इसी तरह के प्रयासों की अपील यह दर्शाती है कि एक क्षेत्रीय शांति पहल वैश्विक संघर्षों को भी प्रभावित कर सकती है। वहीं का उत्तर कोरिया के साथ रणनीतिक संवाद बढ़ाने का संकेत यह बताता है कि बड़ी शक्तियां इस संकट को अपने-अपने हितों के अनुसार साधने में लगी हैं। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि “कागज़ी सीजफायर” और “ज़मीनी सच्चाई” के बीच गहरा अंतर बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक सैन्य कमांड संरचनाओं तक स्पष्ट आदेश नहीं पहुंचते और सभी पक्षों में भरोसा स्थापित नहीं होता, तब तक संघर्ष की चिंगारियां भड़कती रहेंगी।

अंत:, यह युद्धविराम एक अवसर है लेकिन यह अवसर तभी सार्थक होगा जब इसे स्थायी शांति में बदला जा सके। इसके लिए केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति ही नहीं, बल्कि आपसी विश्वास, पारदर्शिता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भी आवश्यकता होगी। अन्यथा, इतिहास गवाह है कि मिडिल-ईस्ट में शांति के ऐसे प्रयास अक्सर अस्थायी साबित होते हैं और थोड़े समय बाद फिर से हिंसा का चक्र शुरू हो जाता है। मौजूदा सीजफायर को “शांति की शुरुआत” कहना जल्दबाज़ी होगी। यह अधिक उचित होगा कि इसे एक “संभावना” के रूप में देखा जाए एक ऐसी संभावना, जो या तो स्थायी समाधान की दिशा में बढ़ सकती है, या फिर एक और बड़े संघर्ष का प्रस्तावना बन सकती है।

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