लेखक: विनोद कुमार झा
मिथिलाक माटि… ओ माटि जकर सुगंध मात्र सँ मन हरसि उठैत अछि। ओसारा पर बैसल बूढ़-पुरान, पोखैर क छाँह, कोइलीक मधुर कूक आ ढेकीक लय ई सभ मिलि क’ बनबैत अछि मिथिलाक ओ जीवन, जे आज धीरे-धीरे बदलैत समयक धुंध मे ओझरा रहल अछि। आधुनिकता अपन चमक ल’ क’ जरूर आयल अछि, मुदा ओहि चमक मे कतेको एहन धरोहर हराइत जा रहल अछि, जकरा सँ हमर पहचान बनैत छल। एहनहि एक अमूल्य विरासत अछि ‘पौऽती’, जे केवल घास सँ बनल टोकरी नहि, बल्कि ममताक बुनल इतिहास अछि।
मिथिलाक एकटा छोट सन गाम। कतहु सँ कोइलीक कूक सुनाइत छल, तँ कतहु ढेकीक ठक-ठक। मुदा एहि बेर बुधनी दाईक आँगनमे अलग चहल-पहल छल। हुनकर पोती आरतीक दुरागमन (गौना) तय भेल छल।
बुधनी दाई अपन पुरान संदूक सँ सिक्की आ मुंज निकालि रहल छलीह। ओ धीरे-धीरे रंगीन सिक्की कें पानि मे भिजा रहल छलीह। काँपैत हाथ होइतहुँ हुनका उत्साह मे कोनो कमी नहि छल किएक तँ ओ अपन पोती लेल पौऽती बना रहल छलीह।
आरती, जे शहर मे पढ़ल-लिखल आधुनिक सोच वाली लड़की छलीह, ओ ई सब देख क’ हल्का मुस्कुरा देलक। ओ कहलक "दादी, अहाँ एतेक कष्ट कियैक करैत छी? आब ई सब के जमाना कहाँ रहल? बजार मे प्लास्टिक आ स्टीलक सुंदर बास्केट भेट जाइत अछि।"
बुधनी दाईक आँखि नम भ’ गेल। ओ आरती कें लगमे बैसा क’ कोमल स्वर मे कहलथिन, "पुतौनी, ई घासक टोकरी नहि अछि। ई हमर संस्कार अछि। जखन हमर माय हमरा पौऽती देने छलीह, तँ ओहिमे ओ अपन आशीर्वाद बुनने छलीह। ई सिक्की मे हमर माटिक सुगंध बसल अछि।" आरती चुप भ’ गेल। ओ दादीक हाथक बारीक बुनावट देखय लागलि। हर एक तंतु मे धैर्य छल, हर एक घुमाव मे प्रेम।
बुधनी दाई समझबैत कहलथिन, "देखु, ई ‘मुंज’ आधार बनैत अछि आ ई ‘सिक्की’ ओकर सजावट। पहिने एकरा पानि मे भिजा क’ कोमल बनाओल जाइत अछि। फेर तकुआ सँ छेद क’ क’ बुनावट होइत अछि।"
ओ रंगीन सिक्की सँ मयूर, कमल आ सूर्य-चंद्रमा बनबैत छलीह। ई केवल कला नहि, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलैत परंपरा छल।
ओ कहलथिन "जखन महिला सभ एक संग बैस क’ पौऽती बनबैत छल, तँ गीत, हँसी आ अपनापन सेहो बुनल जाइत छल।"
बुधनी दाई फेर कहलथिन , "दुरागमन मे ई पौऽती खाली सामान राखबाक पात्र नहि होइत अछि। ई बेटी संग ओकर माय-बाप क आशीर्वाद ल’ क’ जाइत अछि।"
एहिमे सिन्दूर राखल जाइत अछि थे सुहागक प्रतीक होएत। पूजनक सामग्री: अक्षत, सुपारी, चन्दन सभ एहि मे रहैत अछि। माय अपन बेटी लेल ककही, ऐना, टिकुली, श्रृंगारक समान भरैत छथिन।
ओ धीरे सँ कहलथिन "मान्यता अछि जे जतेक भरल-पूरल पौऽती, ओतेक खुशहाल बेटी के जीवन।"
बुधनी दाई एकटा गहिर साँस लेलथिन "आब पोखैर भरि देल गेल, चौर सूखि गेल। सिक्की घास मिलनाय कठिन भ’ गेल। आ आब नई पीढ़ी सेहो सीखय नहि चाहैत अछि।"
"सब प्लास्टिक पसन्द करैत अछि, मुदा ई नहि बुझैत अछि जे प्लास्टिक कचरा बनैत अछि, आ पौऽती आशीर्वाद बनि क’ पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलैत अछि।"
आरतीक आँखि भरि आयल। ओ महसूस कयलक जे ओ आधुनिकता के चक्कर मे अपन जड़ सँ दूर भ’ रहल छल। ओ दादीक हाथ सँ तकुआ लेलकिन आ कहलक "दादी, हमरा सिखाउ। हम अपन पौऽती खुद बनायब।" धीरे-धीरे आरती सेहो बुनावट सीखय लागलि। ओहि पौऽती मे आब दादीक अनुभव आ पोतीक सीख दूनू जुड़ि गेल।
दुरागमनक दिन जखन आरती अपन ससुरारि लेल निकललि, तखन ओकर हाथ मे दादीक बनायल सुंदर पौऽती छल। सभ लोक देख क’ कहय लागल "वाह! कतेक सुंदर आ पारंपरिक!" आरती गर्व सँ मुस्कुराइत सोचलक "ई केवल टोकरी नहि, हमर पहचान अछि।"
पौऽती केवल हस्तशिल्प नहि अछि , ई मिथिलाक नारीक श्रम, प्रेम, धैर्य आ संस्कृति के जीवित प्रतीक अछि। जँ हम एहि कें बिसरि देब, तँ केवल एकटा वस्तु नहि, बल्कि अपन इतिहास गुमाय देब।
आब प्रश्न ई अछि की हम आधुनिकता संग-संग अपन जड़ के बचा सकैत छी? की हम अपन घर मे एहन कोनो धरोहर सहेजने छी? विरासत कें जिंदा रखबाक जिम्मेदारी आब हमर पीढ़ीक अछि।

