विनोद कुमार झा
देश और दुनिया जब किसी बड़े संकट से गुजरते हैं, तब सबसे बड़ी परीक्षा सिर्फ सरकारों की नहीं बल्कि निजी क्षेत्र की संवेदनशीलता की भी होती है। वर्तमान समय में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, विशेषकर ईरान-इजरायल युद्ध, ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। इसका सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देश पर पड़ना स्वाभाविक है। लेकिन इस चुनौतीपूर्ण समय में जहां एक ओर भारत सरकार ने संतुलित विदेश नीति और रणनीतिक निर्णयों के जरिए स्थिति को संभालने का प्रयास किया है, वहीं दूसरी ओर कुछ निजी तेल कंपनियों का रवैया चिंता पैदा करता है।
पेट्रोल और डीजल की कीमतें देश के हर नागरिक के जीवन से सीधे जुड़ी होती हैं। परिवहन, कृषि, उद्योग हर क्षेत्र पर इसका प्रभाव पड़ता है। वर्तमान में पेट्रोल की कीमतें 94 से 105-106 रुपये प्रति लीटर और डीजल 78 से 97 रुपये प्रति लीटर के दायरे में बनी हुई हैं। यह पहले से ही आम आदमी के बजट पर भारी बोझ डाल रहा है। ऐसे में जब सरकारी तेल कंपनियों ने कीमतों को स्थिर रखने का निर्णय लिया, तो यह राहत की बात थी। लेकिन निजी कंपनियों द्वारा कीमतों में वृद्धि ने इस राहत को लगभग निष्प्रभावी कर दिया है।
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या संकट के समय मुनाफा कमाना ही एकमात्र उद्देश्य होना चाहिए? निजी कंपनियों का तर्क हो सकता है कि वे बाजार के नियमों के अनुसार काम करती हैं और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर उनके निर्णयों पर पड़ता है। लेकिन जब देश की जनता पहले ही महंगाई और अनिश्चितता से जूझ रही हो, तब इस प्रकार के निर्णय सामाजिक जिम्मेदारी के विपरीत प्रतीत होते हैं। इसके विपरीत, भारत सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए संतुलित कूटनीति अपनाई है। विभिन्न देशों के साथ संबंधों को मजबूत रखते हुए तेल आपूर्ति को बाधित नहीं होने दिया गया है। यह एक दूरदर्शी नीति का संकेत है, जिसने देश को बड़े संकट से बचाए रखा है। सरकार का यह प्रयास सराहनीय है, लेकिन निजी क्षेत्र का सहयोग भी उतना ही आवश्यक है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि निजी तेल कंपनियां केवल लाभ-हानि के गणित से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित और सामाजिक जिम्मेदारी को भी प्राथमिकता दें। संकट के समय संवेदनशीलता और संयम ही किसी भी संस्था की वास्तविक पहचान होती है। अतः, यह समय मुनाफाखोरी का नहीं, बल्कि साझी जिम्मेदारी निभाने का है। यदि सरकार, निजी क्षेत्र और जनता मिलकर संतुलन बनाए रखें, तभी देश इस चुनौतीपूर्ण दौर से मजबूती के साथ बाहर निकल सकेगा।
