पश्चिम एशिया का संकट और भारत की ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती

विनोद कुमार झा 

पश्चिम एशिया में तेजी से गहराता भू-राजनीतिक संकट एक बार फिर वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर कर रहा है। इजराइल-ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डाला है, बल्कि इसके दूरगामी प्रभाव पूरी दुनिया, विशेषकर ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों पर पड़ सकते हैं। भारत, जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आयात करता है, इस संकट के संभावित प्रभावों को लेकर स्वाभाविक रूप से चिंतित है।

विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति शृंखला बाधित हो सकती है। इसका सीधा असर भारत में एलपीजी की उपलब्धता और कीमतों पर पड़ेगा। पहले भी वैश्विक संकटों के दौरान यह देखा गया है कि आपूर्ति में हल्की सी रुकावट भी कीमतों में भारी उछाल ला देती है, जिसका बोझ अंततः आम उपभोक्ता को उठाना पड़ता है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में, जहां करोड़ों परिवार रसोई गैस पर निर्भर हैं, यह स्थिति सामाजिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से गंभीर चुनौती बन सकती है।

भारत की ऊर्जा निर्भरता की वास्तविकता यह है कि वह अपनी कुल तेल जरूरतों का लगभग 80 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में पश्चिम एशिया में अस्थिरता का मतलब केवल महंगाई नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा खतरा भी है। एलपीजी, जो आज शहरी ही नहीं बल्कि ग्रामीण भारत की रसोई का अहम हिस्सा बन चुकी है, उसकी आपूर्ति में व्यवधान व्यापक जनजीवन को प्रभावित कर सकता है। इस संभावित संकट को देखते हुए भारत सरकार ने सक्रिय और बहुस्तरीय रणनीति अपनाने की दिशा में कदम तेज कर दिए हैं। उच्चस्तरीय बैठकों में ऊर्जा सुरक्षा को लेकर व्यापक मंथन हो रहा है। सरकार का जोर केवल तात्कालिक समाधान पर नहीं, बल्कि दीर्घकालिक विकल्पों को मजबूत करने पर भी है।

सबसे प्रमुख पहल पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) के विस्तार की है। शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में पीएनजी को बढ़ावा देकर एलपीजी पर निर्भरता कम करने की कोशिश की जा रही है। यह न केवल सुरक्षित और सुविधाजनक है, बल्कि आपूर्ति के लिहाज से भी अधिक स्थिर विकल्प माना जाता है। इसके साथ ही सरकार इंडक्शन चूल्हों और विद्युत आधारित कुकिंग को प्रोत्साहित कर रही है, ताकि घरेलू ऊर्जा खपत का स्वरूप बदला जा सके। “एक देश, बहु-ऊर्जा विकल्प” की यह सोच भविष्य की जरूरतों के अनुरूप है।

हालांकि, इन योजनाओं की सफलता कई व्यावहारिक चुनौतियों पर निर्भर करती है। देश के ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में अभी भी एलपीजी ही सबसे भरोसेमंद ईंधन है। वहां पीएनजी की पहुंच सीमित है और बिजली की आपूर्ति भी कई जगहों पर अनियमित है। ऐसे में इंडक्शन चूल्हों को अपनाने के लिए बुनियादी ढांचे को मजबूत करना अनिवार्य होगा। साथ ही, उपभोक्ताओं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाना और जागरूकता बढ़ाना भी जरूरी है, ताकि वे इन विकल्पों को अपनाने के लिए प्रेरित हों। ऊर्जा संकट का यह खतरा भारत के लिए एक बड़ा अवसर भी लेकर आया है ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में निर्णायक कदम उठाने का। अक्षय ऊर्जा स्रोतों जैसे सौर, पवन और हरित हाइड्रोजन में निवेश बढ़ाना अब केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं, बल्कि रणनीतिक अनिवार्यता बन चुका है। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन अभी भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।

इसके अलावा, घरेलू गैस उत्पादन को बढ़ावा देना, ऊर्जा के आयात स्रोतों का विविधीकरण करना और सामरिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserves) को और सुदृढ़ करना भी उतना ही जरूरी है। यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी वैश्विक संकट की स्थिति में देश के पास पर्याप्त भंडार हो, जिससे आपूर्ति बाधित होने पर भी जनजीवन प्रभावित न हो। नीतिगत स्तर पर यह भी जरूरी है कि केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो। ऊर्जा अवसंरचना के विस्तार, नई तकनीकों के उपयोग और निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करने से इस दिशा में तेजी लाई जा सकती है। साथ ही, ऊर्जा दक्षता (Energy Efficiency) को बढ़ावा देकर भी मांग को नियंत्रित किया जा सकता है।

 पश्चिम एशिया का यह संकट भारत के लिए एक स्पष्ट संदेश है ऊर्जा सुरक्षा को लेकर आत्मनिर्भरता, विविधीकरण और नवाचार ही भविष्य की कुंजी हैं। सरकार के प्रयास सराहनीय हैं, लेकिन इनकी वास्तविक सफलता तभी सुनिश्चित होगी जब योजनाओं का प्रभावी और तेज क्रियान्वयन हो, और आम जनता तक इसका लाभ समय पर पहुंचे। देश की ऊर्जा नीति को अब केवल आपूर्ति सुनिश्चित करने तक सीमित नहीं रखा जा सकता, बल्कि इसे स्थिर, सुलभ और टिकाऊ बनाना होगा। यही वह रास्ता है, जो भारत को न केवल वर्तमान संकट से उबार सकता है, बल्कि भविष्य की चुनौतियों के लिए भी तैयार कर सकता है।

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