हनुमान जी ने लंकिनी को किस हाथ की मुट्ठी से किया था प्रहार?

 विनोद कुमार झा 

रामचरितमानस के अनुसार, जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के दूत, अदम्य साहस के प्रतीक हनुमान जी ने रावण की स्वर्णमयी लंका के द्वार पर अपना पहला चरण रखा, तो उनका सामना लंका की प्रहरी लंकिनी से हुआ। यह केवल दो शक्तियों का टकराव नहीं था, बल्कि अधर्म के गढ़ में धर्म के प्रवेश का उद्घोष था।

​गोस्वामी तुलसीदास जी सुंदरकांड में लिखते हैं: "मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर वमत धरनीं ढनमनी॥"

​अहंकार से भरी लंकिनी को परास्त करने के लिए महावीर ने अपने बाएँ हाथ की मुट्ठी का मात्र एक प्रहार किया। उस एक प्रहार ने न केवल लंकिनी का गर्व चूर किया, बल्कि यह संकेत भी दे दिया कि जिस लंका को अपनी सुरक्षा पर अभिमान है, उसका अंत अब निकट है। आइए, विस्तार से जानते हैं हनुमान जी के उस पराक्रम और लंकिनी के उद्धार की इस पावन कथा को...

त्रेतायुग में जब राक्षसराज रावण ने माता सीता का हरण कर उन्हें लंका में बंदी बना लिया, तब भगवान श्रीराम ने उन्हें खोजने का संकल्प लिया। इस कार्य के लिए उन्होंने अपने परम भक्त हनुमान को लंका भेजा।

हनुमान जी ने विशाल समुद्र को एक ही छलांग में पार किया। उनके हृदय में केवल प्रभु श्रीराम का नाम था और मन में माता सीता को खोजने का संकल्प। जब वे लंका के समीप पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि वह स्वर्ण नगरी अत्यंत भव्य और सुरक्षित है।

लंका के मुख्य द्वार पर एक भयानक राक्षसी पहरा दे रही थी वह थी लंकिनी। उसका शरीर विशाल, आँखें अग्नि समान और स्वर गर्जना जैसा था। उसने हनुमान जी को रोकते हुए कहा, “हे वानर! यह लंका नगरी रावण की है। बिना अनुमति कोई भी यहाँ प्रवेश नहीं कर सकता। लौट जाओ, नहीं तो प्राणों से हाथ धो बैठोगे।”

हनुमान जी ने विनम्रता से उत्तर दिया “मैं केवल इस नगरी को देखने आया हूँ, मुझे अंदर जाने दो।” लेकिन लंकिनी ने उन्हें रोकने के लिए बल प्रयोग किया।

जब लंकिनी ने हनुमान जी पर आक्रमण किया, तब हनुमान जी ने अपने हल्के से एक मुक्के से उसे भूमि पर गिरा दिया। वह प्रहार इतना शक्तिशाली था कि लंकिनी का अभिमान चूर-चूर हो गया।

जैसे ही लंकिनी भूमि पर गिरी, उसे एक पुराना वरदान स्मरण हो आया। उसे पूर्व में बताया गया था कि “जिस दिन कोई वानर तुझे पराजित करेगा, समझ लेना कि लंका का विनाश निकट है।”

यह सुनते ही लंकिनी के मन में परिवर्तन आ गया। उसने हनुमान जी के चरणों में गिरकर कहा, “हे महावीर! आप कोई साधारण वानर नहीं हैं। आप अवश्य ही भगवान श्रीराम के दूत हैं। आज से लंका का अंत निश्चित है। कृपया अंदर जाएं और अपना कार्य पूर्ण करें।”

लंकिनी की अनुमति मिलने के बाद हनुमान जी लंका में प्रवेश कर गए। आगे चलकर उन्होंने माता सीता को खोज निकाला और रावण की लंका में हाहाकार मचा दिया।

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