शब्दों की मर्यादा और राजनीति की गिरती भाषा

 विनोद कुमार झा 

भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती उसकी बहुलता, असहमति और संवाद की संस्कृति में निहित है। लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह राजनीतिक बयानबाजी का स्तर गिरता जा रहा है, वह चिंताजनक ही नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरे का संकेत भी है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए कथित रूप से ‘आतंकवादी’ जैसे शब्द का प्रयोग इसी गिरावट की एक और कड़ी के रूप में सामने आया है।

चेन्नई में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दिया गया यह बयान, भले ही बाद में सफाई के साथ जोड़ा गया हो, लेकिन राजनीतिक विमर्श में इसकी गूंज दूर तक सुनाई दे रही है। विपक्ष की ओर से सत्तारूढ़ दल पर तीखे हमले लोकतंत्र का हिस्सा हैं, परंतु व्यक्तिगत और अत्यधिक आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग उस सीमा को लांघ जाता है, जहां आलोचना स्वस्थ बहस का रूप लेती है।

भाजपा के प्रवक्ता Sambit Patra ने इस बयान को सुनियोजित षड्यंत्र बताते हुए कांग्रेस की मानसिकता पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यह कोई ‘फिसलन’ नहीं बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है, जिसके तहत प्रधानमंत्री की छवि को धूमिल करने का प्रयास किया जा रहा है। इसी क्रम में Vinod Tawde ने भी इस बयान की कड़ी निंदा करते हुए इसे संवैधानिक पद की गरिमा के खिलाफ बताया।

यह पूरा विवाद केवल एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक प्रवृत्ति को उजागर करता है जिसमें राजनीतिक दल एक-दूसरे के खिलाफ मर्यादा भूलते जा रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में हमने देखा है कि चुनावी मंचों से लेकर सोशल मीडिया तक, भाषा का स्तर लगातार गिरा है। राहुल गांधी सहित कई नेताओं के भाषणों पर भी इसी तरह के आरोप लगते रहे हैं, जहां व्यक्तिगत कटाक्ष और अपमानजनक शब्दों ने राजनीतिक बहस को प्रभावित किया है।

यह सवाल उठता है कि क्या लोकतंत्र में विरोध का मतलब केवल आक्रामकता और अपमान ही रह गया है? क्या वैचारिक मतभेदों को व्यक्त करने के लिए अब शालीन और तार्किक भाषा पर्याप्त नहीं रह गई? दरअसल, लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है वह सरकार की नीतियों की आलोचना करे, खामियों को उजागर करे और वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करे। लेकिन जब आलोचना व्यक्तिगत हमले में बदल जाती है, तो उसका असर जनमानस पर नकारात्मक पड़ता है।

इस प्रकरण का एक और पहलू यह है कि सत्तारूढ़ दल भी ऐसे बयानों को राजनीतिक अवसर के रूप में इस्तेमाल करता है। अतीत में कई बार देखा गया है कि विपक्ष के विवादित बयानों को चुनावी मुद्दा बनाकर जनता के बीच प्रस्तुत किया गया है। इससे न केवल राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ता है, बल्कि असली मुद्दे, जैसे रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक विकास पिछे छूट जाते हैं।

यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए किसी भी प्रकार की आपत्तिजनक टिप्पणी केवल व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि उस पद की गरिमा पर भी प्रभाव डालती है। उसी प्रकार, विपक्ष के नेताओं के लिए भी यह जरूरी है कि वे अपने शब्दों के चयन में सावधानी बरतें, क्योंकि उनके बयान करोड़ों लोगों को प्रभावित करते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि सभी राजनीतिक दल आत्ममंथन करें। क्या वे जनता के सामने एक सकारात्मक और रचनात्मक राजनीति का उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं, या केवल आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति में उलझकर लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर कर रहे हैं?

मीडिया और नागरिक समाज की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्हें चाहिए कि वे ऐसे बयानों को सनसनीखेज बनाने के बजाय मुद्दों पर केंद्रित बहस को बढ़ावा दें। साथ ही, मतदाताओं को भी यह तय करना होगा कि वे किस प्रकार की राजनीति को स्वीकार करना चाहते हैं वह जो विकास और नीतियों की बात करती है, या वह जो केवल विवाद और विभाजन को जन्म देती है।

अतः यह विवाद एक चेतावनी है राजनीति में भाषा की मर्यादा बनाए रखना केवल नैतिक दायित्व नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सेहत के लिए अनिवार्य शर्त है। यदि राजनीतिक दल इस मर्यादा को नहीं समझते, तो इसका खामियाजा पूरे लोकतांत्रिक तंत्र को भुगतना पड़ सकता है।

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