राजनीतिक हथगोले में दबी महिलाओं की आवाज़

 -इतिहास के पन्नों से वर्तमान तक संघर्ष, अपमान और सम्मान की अधूरी कहानी

विनोद कुमार झा 

भारतीय लोकतंत्र में “आधी आबादी” शब्द केवल एक सांख्यिकीय अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समानता का प्रतीक है। फिर भी, जब महिलाओं के अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयक संसद में आते हैं, तो वे अक्सर राजनीतिक टकराव के “हथगोले” बन जाते हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप की इस लड़ाई में सबसे ज्यादा नुकसान उस वर्ग का होता है, जिसके लिए ये कानून बनाए जाते हैं देश की महिलाएँ।

हाल के घटनाक्रम यह दर्शाते हैं कि महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर भी राजनीति हावी हो जाती है। सत्ता पक्ष यह दावा करता है कि वह महिलाओं को सम्मान और अधिकार दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है और इसी उद्देश्य से विधेयक लाता है। दूसरी ओर, विपक्ष इन प्रस्तावों में खामियाँ गिनाते हुए उनका विरोध करता है। लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है, परंतु जब यह असहमति समाधान के बजाय ठहराव का कारण बन जाए, तो यह चिंता का विषय बन जाता है। सवाल यह है कि क्या महिलाओं के अधिकार भी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बनकर रह जाएंगे?

भारत में महिलाओं की स्थिति बहुआयामी चुनौतियों से घिरी हुई है शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे आज भी पूरी तरह हल नहीं हुए हैं। ऐसे में यदि महिला आरक्षण या अधिकारों से जुड़े विधेयक राजनीतिक गतिरोध का शिकार होते हैं, तो यह केवल एक बिल का रुकना नहीं, बल्कि करोड़ों महिलाओं की उम्मीदों का ठहर जाना है। यह विडंबना ही है कि जिन प्रतिनिधियों को जनता ने बदलाव लाने के लिए चुना है, वही बदलाव की राह में बाधा बनते दिखते हैं।

यह भी आवश्यक है कि हम इस बहस को केवल सत्ता बनाम विपक्ष के चश्मे से न देखें। असली प्रश्न यह है कि क्या हमारे जनप्रतिनिधि महिलाओं के मुद्दों को लेकर वास्तव में गंभीर हैं? यदि हाँ, तो उन्हें दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सहमति का रास्ता निकालना होगा। महिलाओं के अधिकारों को “राजनीतिक लाभ-हानि” के तराजू पर तौलना लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है।

समय आ गया है कि संसद में महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर एक व्यापक और सकारात्मक संवाद हो। सत्ता पक्ष को चाहिए कि वह विधेयकों को अधिक समावेशी और पारदर्शी बनाए, वहीं विपक्ष को रचनात्मक सुझावों के साथ सहयोग करना चाहिए। केवल विरोध के लिए विरोध या श्रेय लेने की होड़ से आगे बढ़कर यदि सभी दल मिलकर काम करें, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव है।

यह प्रश्न केवल राजनीति का नहीं, बल्कि समाज की चेतना का भी है। क्या हम महिलाओं के अधिकारों को केवल कागजों तक सीमित रखना चाहते हैं, या उन्हें वास्तविक जीवन में लागू होते देखना चाहते हैं? यदि जवाब दूसरा है, तो राजनीतिक हथगोले को एक ओर रखकर संवाद और सहमति की दिशा में कदम बढ़ाना ही होगा। तभी “आधी आबादी” सच में अपने पूरे अधिकार और सम्मान के साथ इस लोकतंत्र का हिस्सा बन पाएगी।

जबकि भारतीय सभ्यता में नारी को कभी “शक्ति”, कभी “जननी”, तो कभी “देवी” के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता” का उद्घोष हमारे शास्त्रों में बार-बार गूंजता है, परंतु विडंबना यह है कि व्यवहारिक जीवन में नारी को वह सम्मान सदैव नहीं मिला जिसकी वह अधिकारिणी रही है। इतिहास और धर्मग्रंथों के पन्ने खोलें तो हर युग में नारी की महानता के साथ-साथ उसके अपमान और संघर्ष की कथा भी समानांतर चलती दिखाई देती है। किंतु वास्तविकता में उसे बार-बार अग्निपरीक्षाओं से गुजरना पड़ा। यह विरोधाभास केवल अतीत की कहानी नहीं, बल्कि वर्तमान की भी सच्चाई है। युग बदलते गए, समाज बदला, व्यवस्थाएँ बदलीं पर नारी के सम्मान का प्रश्न आज भी अधूरा है।

सत्ययुग: आदर्शों के बीच छिपा अन्याय : सत्ययुग को आदर्श और धर्म का युग कहा जाता है, लेकिन इस युग में भी नारी अपमान के उदाहरण मिलते हैं। अहिल्या का पत्थर बन जाना केवल एक कथा नहीं, बल्कि यह दर्शाता है कि स्त्री को अक्सर परिस्थितियों का दोषी मान लिया जाता था। वहीं अनसूया जैसी महान नारी ने अपने तप, त्याग और धैर्य से यह सिद्ध किया कि नारी केवल सहनशील नहीं, बल्कि अद्भुत शक्ति का स्रोत है। इसके साथ ही सावित्री का अपने पति के प्राण यमराज से वापस लाना नारी की दृढ़ता और संकल्प का प्रतीक है।

त्रेतायुग: मर्यादा और पीड़ा का संगम : त्रेतायुग में सीता का जीवन आदर्श नारी के रूप में प्रस्तुत किया गया, परंतु उनके साथ हुए व्यवहार पर प्रश्नचिह्न आज भी खड़े होते हैं। अग्निपरीक्षा और वनवास जैसी घटनाएँ यह दिखाती हैं कि समाज ने उनके आत्मसम्मान से अधिक अपनी शंकाओं को महत्व दिया। इसी युग में शूर्पणखा का अपमान यह संकेत देता है कि स्त्री की गरिमा को उसके रूप या स्वभाव के आधार पर आँका जाता रहा। वहीं तारा और मंदोदरी जैसी बुद्धिमान और नीति-निपुण नारियों की सलाह को अनदेखा करना यह दर्शाता है कि नारी की बुद्धिमत्ता को भी अक्सर महत्व नहीं दिया गया।

द्वापरयुग: अन्याय के विरुद्ध पुकार : द्वापरयुग में द्रौपदी का चीरहरण भारतीय इतिहास की सबसे पीड़ादायक घटनाओं में से एक है। भरी सभा में एक नारी का अपमान हुआ और सत्ता, शक्ति और धर्म के रक्षक मौन रहे। यह मौन ही सबसे बड़ा अपराध था। वहीं कुंती का जीवन भी त्याग और पीड़ा से भरा रहा, जहाँ उन्होंने अपने पुत्रों के भविष्य के लिए अपने व्यक्तिगत जीवन का बलिदान दिया। गांधारी का स्वयं को अंधत्व में बाँध लेना एक ऐसी नारी का प्रतीक है, जिसने अपने अस्तित्व को पति के साथ जोड़कर देखा और अंततः उसी का परिणाम भी भुगता।

कलियुग: प्रगति के बीच पुरानी मानसिकता :  आधुनिक युग में शिक्षा, तकनीक और कानूनों के विकास के बावजूद नारी के प्रति हिंसा और भेदभाव समाप्त नहीं हुआ है। कार्यस्थल से लेकर घर तक, कई महिलाएँ आज भी असमानता और उत्पीड़न का सामना कर रही हैं। यह यथार्थ बताता है कि समस्या केवल व्यवस्था में नहीं, बल्कि मानसिकता में है। “दुर्योधन” अब किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि वह सोच है जो आज भी समाज के विभिन्न रूपों में मौजूद है।

राजनीति और नारी सम्मान:  नारी सशक्तिकरण की दिशा में नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण विधेयक) एक ऐतिहासिक कदम माना जा सकता है। यह केवल संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने का प्रयास नहीं, बल्कि निर्णय प्रक्रिया में उनकी आवाज को स्थान देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। यदि इस प्रकार के विधेयकों को पारित करने में बाधाएँ आती हैं, तो यह केवल किसी एक दल की विफलता नहीं, बल्कि उस व्यापक सामाजिक सोच का प्रतिबिंब है, जो अभी भी नारी को बराबरी देने में संकोच करती है।

 कानून से आगे सोच का परिवर्तन : यह समझना आवश्यक है कि केवल कानून बना देने से नारी का सम्मान सुनिश्चित नहीं हो सकता। असली बदलाव तब आएगा जब समाज अपनी सोच बदलेगा जब बेटियों को समान अवसर मिलेंगे, जब उनके निर्णयों का सम्मान होगा, और जब उन्हें केवल “सुरक्षा” नहीं, बल्कि “स्वतंत्रता” भी मिलेगी।

आज आवश्यकता है कि हम इतिहास की गलतियों को दोहराने के बजाय उनसे सीखें। एक ऐसा समाज बनाएं जहाँ किसी द्रौपदी को न्याय के लिए पुकारना न पड़े, किसी सीता को अपनी पवित्रता सिद्ध न करनी पड़े, और कोई अहिल्या अन्याय का शिकार न बने।

नारी केवल सहनशीलता की प्रतीक नहीं, बल्कि परिवर्तन की वाहक है। जब हम उसे समानता, सम्मान और अवसर देंगे, तभी भारत सच्चे अर्थों में “शक्ति” का देश बन पाएगा। अब समय आ गया है नारी को सम्मान देने का नहीं, बल्कि उसके सम्मान को स्वीकार करने का।

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