विनोद कुमार झा
रसोई गैस यानी एलपीजी आज भारतीय घरों की जीवनरेखा बन चुकी है। कभी मिट्टी के चूल्हे और धुएँ से भरी रसोई में खाना पकाने वाली भारतीय गृहिणी के जीवन में गैस सिलेंडर ने एक बड़ी राहत दी है। केंद्र सरकार की उज्ज्वला योजना ने करोड़ों गरीब परिवारों तक एलपीजी कनेक्शन पहुँचाकर इसे एक सामाजिक क्रांति का रूप दिया। लेकिन हाल के दिनों में देश के कई हिस्सों से एलपीजी सिलेंडर की कमी, बुकिंग के बाद लंबा इंतजार और बढ़ती कीमतों के बीच कालाबाजारी की आशंकाओं ने आम उपभोक्ताओं को चिंता में डाल दिया है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि यह स्थिति केवल अफवाह है, वास्तविक आपूर्ति संकट है या फिर संगठित तरीके से हो रही कालाबाजारी का परिणाम।
वास्तविकता यह है कि अनेक शहरों और कस्बों में उपभोक्ताओं को समय पर एलपीजी सिलेंडर नहीं मिल पा रहा है। बुकिंग के बाद भी कई दिनों तक सिलेंडर की डिलीवरी नहीं होती। उपभोक्ताओं को यह कहकर टाल दिया जाता है कि स्टॉक उपलब्ध नहीं है या आपूर्ति में विलंब हो रहा है। लेकिन इसी के समानांतर कई जगहों पर अधिक कीमत देकर सिलेंडर तुरंत उपलब्ध होने की खबरें सामने आती हैं। यह स्थिति सामान्य नहीं कही जा सकती। यदि सरकारी वितरण प्रणाली में पारदर्शिता और सख्ती हो, तो ऐसी विसंगतियां इतनी व्यापक रूप से सामने नहीं आतीं।
एलपीजी की कीमतें पहले ही आम परिवार के बजट पर भारी पड़ रही हैं। मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए भी हर महीने सिलेंडर खरीदना आसान नहीं रह गया है। गरीब और निम्न आय वर्ग के लिए यह और भी कठिन हो गया है। उज्ज्वला योजना के तहत कनेक्शन तो मिल गया, लेकिन लगातार बढ़ती कीमतों और समय पर आपूर्ति न होने के कारण कई परिवार फिर से लकड़ी और कोयले के चूल्हों की ओर लौटने को मजबूर हो रहे हैं। यह स्थिति सरकार की उस मूल भावना को भी चुनौती देती है, जिसके तहत स्वच्छ ईंधन को हर घर तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया था।
कालाबाजारी की समस्या भी इस संकट का एक बड़ा कारण हो सकती है। अक्सर देखा गया है कि घरेलू गैस सिलेंडर का उपयोग अवैध रूप से छोटे उद्योगों, होटलों और ढाबों में किया जाता है। व्यावसायिक सिलेंडर की तुलना में घरेलू सिलेंडर सस्ता होता है, इसलिए कई लोग नियमों को दरकिनार कर उसका उपयोग करते हैं। इससे घरेलू उपभोक्ताओं के हिस्से के सिलेंडर बाजार में कम पड़ने लगते हैं। इसके अलावा कई बार गैस एजेंसियों पर भी अनियमित वितरण और कृत्रिम कमी पैदा करने के आरोप लगते रहे हैं। यदि ऐसी गतिविधियों पर प्रभावी निगरानी न हो, तो यह स्थिति कालाबाजारी को बढ़ावा देती है।
सवाल यह भी है कि यदि देश में गैस की आपूर्ति पर्याप्त है, तो फिर उपभोक्ताओं को इतनी परेशानी क्यों झेलनी पड़ रही है। कहीं न कहीं वितरण व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी और निगरानी तंत्र की कमजोरियां सामने आती हैं। डिजिटल युग में भी यदि उपभोक्ता को यह पता न हो कि उसकी बुकिंग के बाद सिलेंडर कब मिलेगा, तो यह व्यवस्था की कमियों को ही दर्शाता है।
सरकार और तेल कंपनियों की जिम्मेदारी केवल गैस उपलब्ध कराना ही नहीं, बल्कि उसकी निष्पक्ष और पारदर्शी वितरण व्यवस्था सुनिश्चित करना भी है। यदि कहीं कृत्रिम कमी पैदा की जा रही है या कालाबाजारी हो रही है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होना आवश्यक है। साथ ही यह भी जरूरी है कि वितरण प्रणाली को तकनीक के माध्यम से अधिक पारदर्शी बनाया जाए, ताकि उपभोक्ता को अपने सिलेंडर की स्थिति की स्पष्ट जानकारी मिल सके और किसी प्रकार की हेराफेरी की गुंजाइश न रहे।
इसके साथ ही उपभोक्ताओं को भी जागरूक होना होगा। यदि कहीं अतिरिक्त कीमत लेकर सिलेंडर दिया जा रहा है या नियमों का उल्लंघन हो रहा है, तो उसकी शिकायत संबंधित अधिकारियों तक पहुँचनी चाहिए। जब तक समाज और प्रशासन दोनों मिलकर इस समस्या के खिलाफ खड़े नहीं होंगे, तब तक कालाबाजारी जैसी प्रवृत्तियां पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकतीं।
दरअसल रसोई गैस केवल एक उपभोक्ता वस्तु नहीं है, बल्कि यह करोड़ों परिवारों के दैनिक जीवन से जुड़ी बुनियादी जरूरत है। जब रसोई का चूल्हा ही अनिश्चितता के साये में हो, तो आम आदमी की चिंता और मजबूरी दोनों बढ़ जाती हैं। इसलिए यह समय केवल आश्वासन देने का नहीं, बल्कि ठोस और प्रभावी कदम उठाने का है।
जरूरत इस बात की है कि अफवाह और हकीकत के बीच की सच्चाई सामने लाई जाए। यदि समस्या वास्तव में आपूर्ति की है, तो उसे तुरंत दूर किया जाए। यदि कालाबाजारी की जड़ें इस संकट के पीछे हैं, तो दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए। जब तक वितरण प्रणाली मजबूत, पारदर्शी और जवाबदेह नहीं बनेगी, तब तक आम जनता इसी तरह परेशान होती रहेगी।
आखिरकार एक जिम्मेदार शासन व्यवस्था का दायित्व यही है कि वह जनता की बुनियादी जरूरतों को बिना किसी बाधा के उपलब्ध कराए। एलपीजी गैस की उपलब्धता और कीमत का सवाल केवल बाजार का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और जनकल्याण से भी जुड़ा हुआ विषय है। यदि इस दिशा में समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आम आदमी की रसोई की आग धीरे-धीरे उसकी उम्मीदों को भी ठंडा कर सकती है।
