विनोद कुमार झा
भारतीय राजनीति में परिवारवाद कोई नई बात नहीं है। दशकों से देश की कई प्रमुख पार्टियां इस प्रवृत्ति की वाहक रही हैं। सत्ता का हस्तांतरण लोकतांत्रिक प्रक्रिया से अधिक पारिवारिक परंपरा के रूप में देखा जाने लगा है। ऐसे माहौल में यदि कोई नेता यह कहे कि “परिवारवाद की बहती गंगा में मैं क्यों रहूं वंचित?” तो यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि राजनीति के एक अलग दृष्टिकोण का संकेत है। यह दृष्टिकोण कहीं न कहीं की राजनीति में भी दिखाई देता है। बिहार की राजनीति में एक ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं जिन्होंने लंबे समय तक सत्ता में रहते हुए भी अपने परिवार को राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में आगे नहीं बढ़ाया। भारतीय राजनीति में यह एक अपवाद जैसा लगता है। जहां एक ओर कई क्षेत्रीय दलों में बेटे-बेटियां, दामाद और रिश्तेदार सत्ता के केंद्र में दिखाई देते हैं, वहीं नीतीश कुमार ने वर्षों तक अपने परिवार को राजनीतिक मंच से दूर रखा। यह निर्णय उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को एक अलग पहचान देता रहा है।
दरअसल, बिहार की राजनीति लंबे समय तक परिवार आधारित सत्ता संरचनाओं से प्रभावित रही है। चाहे बात हो परिवार की हो या उनके उत्तराधिकारियों की, राज्य की राजनीति में परिवार का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। आज भी और जैसे नाम राजनीतिक चर्चा के केंद्र में रहते हैं। ऐसे परिदृश्य में नीतीश कुमार की राजनीति का मॉडल अलग दिखता है, जिसमें व्यक्तिगत परिवार की बजाय संगठन और प्रशासनिक अनुभव को प्राथमिकता दी जाती रही है। हालांकि यह भी सच है कि की राजनीति पूरी तरह विवादों से मुक्त नहीं रही। गठबंधन बदलने की उनकी रणनीति पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। कभी के साथ, तो कभी के साथ उनका राजनीतिक समीकरण बदलता रहा है। आलोचकों का कहना है कि यह राजनीतिक स्थिरता की बजाय सत्ता संतुलन की राजनीति है। लेकिन समर्थकों का तर्क है कि बिहार की जटिल सामाजिक संरचना में स्थिर शासन के लिए लचीली रणनीति आवश्यक होती है।
नीतीश कुमार की राजनीति को समझने के लिए यह भी देखना होगा कि उन्होंने बिहार में शासन के कई क्षेत्रों में सुधार की कोशिश की। सड़क, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और पंचायत स्तर पर भागीदारी बढ़ाने जैसे कदमों ने उन्हें एक प्रशासनिक नेता की छवि दी। साइकिल योजना, महिला आरक्षण और कानून-व्यवस्था पर जोर जैसे फैसलों ने बिहार की राजनीति में एक अलग विमर्श खड़ा किया। यही कारण है कि लंबे समय तक सत्ता में बने रहने के बावजूद उनकी व्यक्तिगत छवि अपेक्षाकृत सादगीपूर्ण और संयमित मानी जाती है। लेकिन हाल के समय में इस बहस को एक नया मोड़ भी मिला है। अब यह चर्चा तेज हो गई है कि जेडीयू अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री के पुत्र भी राजनीति में सक्रिय हो गए हैं। यदि इसे व्यापक संदर्भ में देखा जाए तो यह बिहार की राजनीति में एक दिलचस्प मोड़ है। दरअसल, उन नौ मुख्यमंत्रियों के पुत्रों में शामिल हो गए हैं जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने लगे हैं।
अब सवाल यह उठता है कि क्या यह वही रास्ता है जिससे अब तक दूर रहने की कोशिश करते रहे थे? या फिर यह राजनीति की स्वाभाविक प्रक्रिया है, जिसमें सार्वजनिक जीवन से जुड़े परिवारों के सदस्य भी समय के साथ सक्रिय भूमिका निभाने लगते हैं? राजनीति के जानकारों का मानना है कि अभी की भूमिका शुरुआती चरण में है, लेकिन उनकी बढ़ती सार्वजनिक उपस्थिति इस बात का संकेत देती है कि आने वाले समय में वे अधिक सक्रिय दिखाई दे सकते हैं।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि बिहार की राजनीति में नेताओं के पुत्रों का सक्रिय होना कोई नई बात नहीं है। पुत्र आज राज्य की राजनीति के प्रमुख चेहरों में से एक हैं। इसी तरह अन्य दलों में भी नई पीढ़ी के नेताओं का उदय होता रहा है। ऐसे में यदि भी राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते हैं तो यह स्वाभाविक राजनीतिक विकास माना जाएगा, लेकिन इसके साथ ही परिवारवाद बनाम वैचारिक राजनीति की बहस भी फिर से तेज हो सकती है।
परिवारवाद से दूरी बनाए रखने का जो संदेश लंबे समय तक की राजनीति से जुड़ा रहा, अब वही संदेश एक नई परीक्षा के दौर से गुजरता दिखाई देता है। यह संभव है कि भविष्य में यदि संगठनात्मक भूमिका निभाते हैं, तो यह भी कहा जा सकता है कि राजनीति में भागीदारी का अधिकार हर नागरिक को है चाहे वह किसी नेता का पुत्र ही क्यों न हो? लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी होगा कि उनकी पहचान केवल वंश के आधार पर नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक क्षमता और सार्वजनिक कार्यों के आधार पर बने।
यह सवाल केवल का नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के भविष्य का है। क्या राजनीति में नेतृत्व योग्यता और जनसेवा के आधार पर तय होगा, या फिर परिवार और वंश परंपरा ही निर्णायक बनी रहेगी? बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की भूमिका इस बहस को जीवित रखती है और अब उनके पुत्र की सक्रियता ने इस बहस को एक नया आयाम दे दिया है।यह कहना गलत नहीं होगा कि “परिवारवाद की बहती गंगा में मैं क्यों रहूं वंचित?” जैसे विचार और उसके साथ बदलते राजनीतिक हालात भारतीय राजनीति को एक महत्वपूर्ण सवाल के सामने खड़ा करते हैं क्या नई पीढ़ी वंशवाद की परंपरा को आगे बढ़ाएगी, या योग्यता आधारित नेतृत्व की नई राजनीति गढ़ेगी?
