विनोद कुमार झा
भारतीय लोकतंत्र का सबसे जीवंत और आकर्षक पहलू चुनाव हैं। यही वह समय होता है जब जनता सर्वोच्च शक्ति के रूप में सामने आती है और राजनीतिक दल उसके दरवाजे पर दस्तक देते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में चुनावी राजनीति का एक नया और चिंताजनक ट्रेंड तेजी से उभरा है “रेबड़ी संस्कृति”।आज हालात ऐसे बन गए हैं कि देश के विभिन्न राज्यों में होने वाले चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों के बीच मानो ‘मुफ्त की रेबड़ियां’ बांटने की होड़ लग जाती है। कोई मुफ्त बिजली का वादा करता है, कोई बेरोजगारों को भत्ता, तो कोई महिलाओं, किसानों या युवाओं के लिए नकद सहायता योजनाओं की घोषणा करता है।
यह सिलसिला अब इतना व्यापक हो चुका है कि यह सवाल उठने लगा है क्या यह लोकतंत्र का सशक्तिकरण है या फिर मतदाताओं को लुभाने की एक खतरनाक प्रवृत्ति? ‘रेबड़ी’ शब्द यहां प्रतीकात्मक है ऐसी सुविधाएं या वादे जो चुनावी लाभ के लिए मुफ्त या अत्यधिक सब्सिडी के रूप में दिए जाते हैं। इन वादों का उद्देश्य सीधा होता है जनता को तात्कालिक लाभ का भरोसा देकर वोट हासिल करना। लेकिन यह समझना जरूरी है कि हर कल्याणकारी योजना ‘रेबड़ी’ नहीं होती। सरकारों का दायित्व है कि वे गरीबों, वंचितों और जरूरतमंदों के लिए योजनाएं बनाएं। समस्या तब पैदा होती है जब योजनाएं आर्थिक विवेक और दीर्घकालिक स्थिरता को नजरअंदाज करते हुए केवल चुनावी फायदे के लिए बनाई जाती हैं।
हाल ही में जिन चार राज्यों में चुनावी माहौल बना है, वहां राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों में ‘मुफ्त योजनाओं’ की भरमार देखने को मिल रही है। हर दल यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि उसकी ‘रेबड़ी’ सबसे ज्यादा स्वादिष्ट है किसी की रेबड़ी मीठी है, किसी की नमकीन, तो किसी की खट्टी-मीठी।मैथिली भाषा का एक प्रसिद्ध मुहावरा इस स्थिति को सटीक रूप से बयां करता है: “पकड़ल माछ निकलल गरै, छूट गैल तऽ रहो सौड़ा माछ।”
अर्थात, जो हाथ में है वह निकल जाता है और जो छूट गया, उसकी कल्पना और भी बड़ी बन जाती है। ठीक यही स्थिति आज मतदाताओं की है वे पिछले वादों के अनुभव से भी परिचित हैं और नए वादों के आकर्षण से भी।
जनता चुनावी ‘रेबड़ी’ का स्वाद जनता कई बार चख चुकी है।कई बार यह योजनाएं वास्तव में राहत देती हैं गरीब परिवारों को आर्थिक सहायता, शिक्षा और स्वास्थ्य में सहयोग, या जीवन स्तर में सुधार। लेकिन कई बार ये वादे अधूरे रह जाते हैं, या फिर इनका बोझ इतना बढ़ जाता है कि राज्य की अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ता है। ऐसे में जनता के सामने दुविधा होती है, क्या वह तात्कालिक लाभ को चुने या दीर्घकालिक विकास को? रेबड़ी संस्कृति का सबसे बड़ा सवाल आर्थिक स्थिरता से जुड़ा है। जब सरकारें बड़े पैमाने पर मुफ्त योजनाओं की घोषणा करती हैं, तो इसके लिए संसाधन भी चाहिए। या तो कर बढ़ाए जाते हैं, या कर्ज लिया जाता है, या फिर अन्य विकास योजनाओं में कटौती की जाती है। इन तीनों ही स्थितियों का असर अंततः आम जनता पर ही पड़ता है।
यदि कोई राज्य लगातार मुफ्त योजनाओं पर निर्भर हो जाता है, तो उसकी वित्तीय स्थिति कमजोर हो सकती है, जिससे भविष्य में विकास कार्य प्रभावित होते हैं। चुनावों में प्रतिस्पर्धा लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन जब यह प्रतिस्पर्धा ‘कौन ज्यादा मुफ्त देगा’ तक सीमित हो जाए, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय बन जाती है।राजनीतिक दलों को नीतियों, विकास योजनाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी ढांचे पर प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए। लेकिन जब चुनावी विमर्श ‘रेबड़ी’ तक सिमट जाता है, तो गंभीर मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।
इस पूरे परिदृश्य में दिलचस्प बात यह है कि पक्ष और विपक्ष दोनों ही इस ‘रेबड़ी संस्कृति’ में शामिल दिखाई देते हैं।सत्ता में रहने वाले दल अपनी योजनाओं को उपलब्धि के रूप में पेश करते हैं, जबकि विपक्ष इससे भी ज्यादा आकर्षक वादों के साथ मैदान में उतरता है। दोनों ही पक्ष जनता को यह विश्वास दिलाने में लगे हैं कि उनकी ‘रेबड़ी’ सबसे बेहतर है। इस प्रतिस्पर्धा में विचारधारा, नीतिगत बहस और दीर्घकालिक दृष्टि कहीं पीछे छूट जाती है।
मीडिया में इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू मतदाता की भूमिका है। क्या मतदाता केवल तात्कालिक लाभ देखकर निर्णय लेगा? या वह दीर्घकालिक विकास, स्थिरता और पारदर्शिता को प्राथमिकता देगा? लोकतंत्र की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि जनता कितनी जागरूक और विवेकशील है। यदि मतदाता केवल ‘रेबड़ी’ के आधार पर वोट देगा, तो राजनीतिक दल भी उसी दिशा में अपनी रणनीति बनाएंगे।
यह कहना गलत होगा कि सभी मुफ्त योजनाएं गलत हैं। गरीबों और जरूरतमंदों के लिए कल्याणकारी योजनाएं आवश्यक हैं। लेकिन जरूरी है कि इनमें संतुलन हो, योजनाएं आर्थिक रूप से टिकाऊ हों, उनका लक्ष्य स्पष्ट हो, उनका लाभ वास्तव में जरूरतमंदों तक पहुंचे साथ ही, राजनीतिक दलों को भी जिम्मेदारी दिखानी होगी और केवल चुनावी लाभ के लिए अव्यवहारिक वादों से बचना होगा।
“रेबड़ी ले लो रेबड़ी…” यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि आज की चुनावी राजनीति का प्रतीक बन चुका है। इस मिठास के पीछे कई बार कड़वी सच्चाई छिपी होती है आर्थिक दबाव, अधूरे वादे और विकास की धीमी गति। मैथिली का मुहावरा हमें यह याद दिलाता है कि जो दिखता है, वह हमेशा सच नहीं होता। इसलिए आज जरूरत है कि मतदाता इस ‘रेबड़ी संस्कृति’ के पार जाकर सोचें क्या यह वादा वास्तव में उनके जीवन को बेहतर बनाएगा? क्या यह राज्य और देश के भविष्य के लिए सही है? लोकतंत्र की असली ताकत केवल वोट देने में नहीं, बल्कि सही निर्णय लेने में है। और जब जनता इस जिम्मेदारी को समझेगी, तभी ‘रेबड़ी’ की राजनीति से आगे बढ़कर ‘विकास’ की राजनीति का मार्ग प्रशस्त होगा।
