पश्चिम एशिया का बढ़ता युद्ध, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराता संकट

 विनोद कुमार झा 

पश्चिम एशिया एक बार फिर ऐसे युद्ध की आग में जल रहा है जिसकी लपटें केवल क्षेत्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित कर रही हैं। अमेरिका  इजरायल  और ईरान  के बीच जारी सैन्य टकराव अब सातवें दिन में प्रवेश कर चुका है और हर बीतते दिन के साथ इसका स्वरूप अधिक भयावह होता जा रहा है। मिसाइल हमले, सैन्य ठिकानों पर बमबारी, समुद्री टकराव और ऊर्जा आपूर्ति पर संकट ये सब संकेत दे रहे हैं कि यदि समय रहते इस संघर्ष को रोका नहीं गया तो यह एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय संकट का रूप ले सकता है।

इस युद्ध का ताजा और चिंताजनक पहलू समुद्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियां हैं। श्रीलंका के तट के पास एक ईरानी युद्धपोत को अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा टॉरपीडो से डुबो दिया जाना इस संघर्ष को एक नए स्तर पर ले जाता है। इस घटना में कई सैनिकों की मौत हुई और कई घायल हुए, जिन्हें श्रीलंका के शहर के अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस घटना ने न केवल क्षेत्रीय तनाव को बढ़ाया है बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। खाड़ी क्षेत्र में एक तेल टैंकर में हुए विस्फोट ने इस आशंका को और गहरा कर दिया है कि अब युद्ध केवल जमीन और आकाश तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समुद्र भी इसका प्रमुख मोर्चा बन चुका है।

दूसरी ओर, इजरायल की सेना ने लेबनान में ईरान समर्थित संगठन हेजबुललाह के दर्जनों ठिकानों पर हमला किया है। इसके साथ ही ईरान के भीतर लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल साइटों को निशाना बनाया गया है। यह संकेत देता है कि यह युद्ध अब केवल प्रतिशोधी कार्रवाई नहीं रहा बल्कि व्यवस्थित सैन्य रणनीति के तहत चलाया जा रहा व्यापक अभियान बन चुका है। ऐसे में यह खतरा भी बढ़ गया है कि अन्य क्षेत्रीय शक्तियां भी इस संघर्ष में खिंच सकती हैं।

इस युद्ध का सबसे गंभीर मानवीय पहलू नागरिकों पर पड़ने वाला प्रभाव है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय ने स्पष्ट कहा है कि इन हमलों की तत्काल जांच होनी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के सिद्धांतों जैसे भेदभाव, अनुपात और सावधानी का पालन किया गया है या नहीं। जब युद्ध के मैदानों में मिसाइलें और बम गिरते हैं तो उनका सबसे अधिक असर आम नागरिकों पर पड़ता है। आज गाजा, सूडान और मध्य पूर्व के कई अन्य क्षेत्रों में पहले से ही मानवीय संकट गहरा है और अब इस नए युद्ध ने राहत कार्यों को लगभग ठप कर दिया है।

इस संघर्ष का दूसरा बड़ा प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे रहा है। मध्य पूर्व दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख केंद्र है और यहां किसी भी प्रकार की अस्थिरता का सीधा असर तेल बाजारों पर पड़ता है। कतर के ऊर्जा मंत्री साद अल-काबी ने चेतावनी दी है कि यदि वर्तमान हालात जारी रहे तो खाड़ी क्षेत्र के कई ऊर्जा उत्पादक देशों को कुछ ही हफ्तों में तेल निर्यात रोकना पड़ सकता है। यदि ऐसा हुआ तो कच्चे तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। यह स्थिति वैश्विक महंगाई को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकती है और कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं को गंभीर संकट में डाल सकती है।

दरअसल, इस युद्ध के कारण सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक Strait of Hormuz भी प्रभावित हो रहा है। यह जलडमरूमध्य दुनिया के तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा संभालता है। यदि यहां जहाजों की आवाजाही बाधित होती है तो ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता और बढ़ेगी तथा वैश्विक सप्लाई चेन पर गहरा असर पड़ेगा।

भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। भारत की रिफाइनरियां पहले ही समुद्र में फंसे रूसी कच्चे तेल की खरीद बढ़ाने लगी हैं ताकि संभावित आपूर्ति संकट से बचा जा सके। केंद्र सरकार ने निर्यातकों की समस्याओं को हल करने के लिए एक अंतर-मंत्रालयी समूह का गठन किया है और यह लगातार शिपिंग कंपनियों तथा उद्योगों से बातचीत कर रहा है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल  ने भी स्पष्ट किया है कि सरकार निर्यातकों की मदद के लिए हर संभव नीतिगत कदम उठाएगी। यह कदम जरूरी भी है क्योंकि यदि समुद्री मार्गों में बाधा आती है तो भारत के व्यापार और निर्यात पर सीधा असर पड़ेगा।

भारत की राजनीति में भी इस मुद्दे को लेकर बहस शुरू हो चुकी है। विपक्षी दलों ने संसद में पश्चिम एशिया की स्थिति पर विस्तृत चर्चा की मांग की है। कांग्रेस नेता  ने सरकार से स्पष्ट रणनीति बताने की मांग करते हुए कहा है कि वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका और प्रतिष्ठा को मजबूत बनाने के लिए सक्रिय कूटनीति जरूरी है। असल प्रश्न यह है कि क्या दुनिया इस संघर्ष से कोई सबक लेगी। बीते वर्षों में हमने देखा है कि क्षेत्रीय युद्ध कितनी तेजी से वैश्विक संकट में बदल जाते हैं चाहे वह यूक्रेन का युद्ध हो या मध्य पूर्व का संघर्ष। यदि अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच यह टकराव लंबा खिंचता है तो यह केवल एक क्षेत्रीय युद्ध नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था को झकझोर देने वाला संकट बन सकता है।

ऐसे समय में अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र और प्रमुख वैश्विक शक्तियों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे तत्काल कूटनीतिक प्रयासों के माध्यम से इस युद्ध को रोकने की दिशा में काम करें। युद्ध का रास्ता हमेशा विनाश की ओर ले जाता है, जबकि संवाद ही स्थायी शांति का आधार बन सकता है। आज दुनिया जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां सबसे बड़ी जरूरत संयम और कूटनीति की है। यदि यह संघर्ष जल्द नहीं रुका तो इसके परिणाम केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि पूरी दुनिया को आर्थिक, मानवीय और राजनीतिक अस्थिरता के एक नए दौर में धकेल सकते हैं।

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