विनोद कुमार झा
जेठ की वह जलती हुई दोपहर थी। आसमान में सूरज मानो आग उगल रहा था और उसकी तपिश से धरती का हर कण झुलसता हुआ महसूस हो रहा था। खेतों की मेड़ें सूखकर फट चुकी थीं, पेड़ों की पत्तियाँ धूप की मार से थकी-सी झुक गई थीं और दूर-दूर तक फैले रास्तों पर जैसे सन्नाटा पसरा था। गाँव की गलियों में आमतौर पर खेलने-कूदने वाले बच्चे भी उस दिन अपने घरों में दुबके हुए थे। हवा भी जैसे कहीं छुपकर सो गई थी।
ऐसी ही तपती हुई दोपहर में अनुराग उस पुराने बरगद के पेड़ के नीचे खड़ा था, जो वर्षों से गाँव के बीचों-बीच खड़ा समय का साक्षी बना हुआ था। उसकी फैली हुई जड़ों और घनी छाँव ने न जाने कितनी कहानियों को जन्म दिया था। उस पेड़ के नीचे बैठकर कभी बुज़ुर्ग अपने पुराने किस्से सुनाते, कभी चरवाहे आराम करते और कभी गाँव के बच्चे अपने खेल की योजनाएँ बनाते।
लेकिन उस दिन अनुराग वहाँ किसी और वजह से खड़ा था।उसकी आँखों में एक बेचैनी थी, जैसे वह किसी का इंतज़ार कर रहा हो। पसीने की बूंदें उसके माथे से गिर रही थीं, मगर उसे इस तपिश की परवाह नहीं थी। उसके मन में एक ही सवाल बार-बार उठ रहा था, क्या नंदिनी आएगी?
वह घड़ी-घड़ी रास्ते की ओर देखता। हर बार जब दूर से धूल उड़ती दिखती, उसे लगता शायद वही आ रही है। लेकिन हर बार उम्मीद की जगह निराशा हाथ लगती। बरगद के पत्तों के बीच से छनकर आती धूप ज़मीन पर अजीब-सी आकृतियाँ बना रही थी। समय जैसे थम गया था। अनुराग ने धीरे से आँखें बंद कर लीं। उसके मन में पुरानी यादें तैरने लगीं।
नंदिनी… यह नाम आते ही उसके चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान आ गई। नंदिनी से उसकी मुलाकात कोई अचानक हुई घटना नहीं थी। वह बचपन से ही इस गाँव में रहती थी। अनुराग और नंदिनी साथ-साथ स्कूल जाते थे, साथ खेलते थे और कई बार साथ डाँट भी खाते थे। बचपन में उनके बीच बस दोस्ती थी निर्मल, सच्ची और बेफिक्र।लेकिन समय के साथ-साथ कुछ बदल गया था।
जब वे बड़े होने लगे, तो उनके बीच की बातें भी बदलने लगीं। अब वे हर बात पर हँसते तो थे, मगर उनकी हँसी में एक अजीब-सी झिझक भी शामिल हो गई थी। जब कभी उनकी नज़रें मिलतीं, तो दोनों ही जल्दी से दूसरी ओर देखने लगते।उन्हें खुद भी समझ नहीं आता था कि यह बदलाव कब और कैसे आया।
एक दिन शाम को जब वे दोनों नदी किनारे बैठे थे, नंदिनी ने अचानक कहा था, “तुम्हें नहीं लगता, बचपन बहुत जल्दी खत्म हो गया?”
अनुराग ने मुस्कुराकर कहा था, “शायद… लेकिन कुछ चीज़ें कभी खत्म नहीं होतीं।” नंदिनी ने उसकी ओर देखा था, जैसे उसके शब्दों के पीछे छिपा अर्थ समझने की कोशिश कर रही हो। उस दिन दोनों के बीच बहुत देर तक खामोशी रही थी। और फिर धीरे-धीरे उनके दिलों में एक अनकहा रिश्ता जन्म लेने लगा था। लेकिन जिंदगी हमेशा इतनी आसान नहीं होती।
कुछ महीनों पहले नंदिनी के पिता का ट्रांसफर शहर में हो गया था। परिवार को गाँव छोड़ना पड़ा। उस दिन जब नंदिनी जा रही थी, पूरा गाँव उसे विदा करने आया था। अनुराग भी वहाँ था, लेकिन वह कुछ कह नहीं पाया। बस दूर खड़ा उसे देखता रहा।
नंदिनी ने जाते-जाते एक बार उसकी ओर देखा था। उसकी आँखों में भी कुछ अनकहा था, लेकिन शब्द दोनों के पास नहीं थे। उसके बाद कई महीने बीत गए। गाँव की वही गलियाँ थीं, वही रास्ते थे, वही बरगद का पेड़ था लेकिन अनुराग के लिए सब कुछ बदल गया था।
कभी-कभी वह उस बरगद के नीचे बैठ जाता और सोचता कि अगर उस दिन उसने नंदिनी से अपने दिल की बात कह दी होती, तो शायद सब कुछ अलग होता। आज भी वह उसी सोच में डूबा हुआ था। तभी अचानक दूर से एक हल्की-सी हवा चली।
जेठ की उस तपती दोपहर में यह हवा किसी चमत्कार से कम नहीं थी। धूल के कण हवा में उड़ने लगे और बरगद के पत्ते सरसराने लगे। अनुराग ने चौंककर आँखें खोलीं। और तभी उसने उसे देखा। धूल भरे रास्ते से कोई उसकी ओर आ रहा था।
पहले तो उसे लगा कि शायद यह उसकी कल्पना है। लेकिन जैसे-जैसे वह आकृति करीब आती गई, उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा। वह नंदिनी थी।
नीले कॉटन के सूट में वह सचमुच किसी ठंडी फुहार जैसी लग रही थी। उसके चेहरे पर वही मासूम मुस्कान थी, जो हमेशा अनुराग के दिल को सुकून दे जाती थी। कुछ पल के लिए अनुराग को लगा जैसे समय सचमुच रुक गया हो। नंदिनी उसके सामने आकर ठहर गई। दोनों कुछ देर तक बस एक-दूसरे को देखते रहे। उनके बीच कोई शब्द नहीं था, फिर भी जैसे बहुत कुछ कहा जा चुका था।
नंदिनी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “तुम अभी भी यहाँ आते हो?” अनुराग ने धीरे से जवाब दिया, “कुछ जगहें छोड़ने से भी नहीं छूटतीं।” नंदिनी ने बरगद के पेड़ की ओर देखा।“यह पेड़ भी तो वैसा ही है… जैसे हमारा बचपन।”
अनुराग मुस्कुराया। “और शायद हमारी यादें भी।” दोनों पेड़ की छाँव में बैठ गए। हवा अब थोड़ी ठंडी हो गई थी। दूर कहीं बादल भी दिखाई देने लगे थे।
नंदिनी ने धीरे से कहा, “शहर में सब कुछ है रोशनी, भीड़, बड़े-बड़े रास्ते… लेकिन फिर भी कुछ खाली-सा लगता है।” अनुराग ने पूछा, “क्या?”
नंदिनी कुछ पल चुप रही। फिर बोली, “शायद… यह जगह।” अनुराग ने उसकी ओर देखा। नंदिनी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “और शायद… तुम भी।” उसके शब्द सुनकर अनुराग के दिल की धड़कन जैसे थम गई। वह कई महीनों से जो सुनना चाहता था, वह आज उसके सामने था।
अनुराग ने धीरे से कहा, “नंदिनी… तुम मेरे लिए सिर्फ बचपन की दोस्त नहीं हो। जब तुम गई थीं, तब मुझे एहसास हुआ कि मेरे जीवन की सबसे जरूरी चीज़ तुम हो।” नंदिनी की आँखों में हल्की-सी चमक आ गई। “मैं भी यही कहना चाहती थी,” उसने धीरे से कहा। उसी समय आसमान में बादल घिर आए। और फिर अचानक हल्की-हल्की बूंदें गिरने लगीं।
जेठ की उस तपती दोपहर में यह बारिश किसी चमत्कार जैसी थी। नंदिनी ने आसमान की ओर देखा और हँस पड़ी। “लगता है मौसम भी हमारी कहानी सुन रहा था।” अनुराग मुस्कुराया। बरगद के पत्तों से टपकती बारिश की बूंदें मिट्टी की खुशबू फैला रही थीं।
नंदिनी ने धीरे से कहा, “कहते हैं कि रेगिस्तान में जब फूल खिलते हैं, तो उनकी खुशबू सबसे ज्यादा गहरी होती है।” अनुराग ने उसकी ओर देखते हुए कहा, “और शायद हमारी कहानी भी उसी मरुस्थल की सबसे मीठी ठंडी बयार है।”दोनों चुपचाप बारिश को महसूस करते रहे। अब उनकी खामोशी में कोई अधूरापन नहीं था। क्योंकि उस तपती हुई दोपहर में, बरगद के उसी पेड़ के नीचे, वे एक-दूसरे के लिए सावन की पहली फुहार बन चुके थे।

