झूठी शान, दरवाज़े बैठे मेहमान…

 विनोद कुमार झा 

गांव सोनपुर की हवेली दूर से ही अपनी ऊँची दीवारों और रंगीन फाटक के कारण पहचान ली जाती थी। वह हवेली थी लाला रामप्रसाद की जो अपनी दौलत से ज्यादा अपनी शान का ढिंढोरा पीटने के लिए मशहूर थे। गांव में कोई भी समारोह हो, रामप्रसाद जी की पहली चिंता होती लोग क्या कहेंगे? उनकी पत्नी सरोज अक्सर समझातीं, “जीवन दिखावे से नहीं, अपनत्व से चलता है।” मगर रामप्रसाद के लिए शान ही सब कुछ थी।

एक दिन खबर फैली कि रामप्रसाद के बेटे अंशु की सगाई शहर के बड़े व्यापारी की बेटी से तय हो गई है। रामप्रसाद ने तय किया कि सगाई ऐसा आयोजन होगा कि पूरे जिले में चर्चा हो। शहर से सजावट वाले बुलाए गए, महंगे पकवानों की सूची बनी, बैंड-बाजे की व्यवस्था हुई। हवेली को दुल्हन की तरह सजाया गया। रामप्रसाद का सीना गर्व से चौड़ा था उन्हें बस लोगों की वाहवाही चाहिए थी।

सगाई के दिन दूर-दूर से मेहमान आने लगे। लेकिन रामप्रसाद हर किसी से यह पूछते “कौन गाड़ी से आया? कौन कितने तोहफे लाया?” जो साधारण कपड़ों में आया, उसे उन्होंने खास तवज्जो नहीं दी। गांव के बुजुर्ग शिक्षक हरिनारायण जी, जिन्होंने कभी रामप्रसाद को पढ़ाया था, भी सादे धोती-कुर्ते में पहुंचे। वे दरवाज़े पर खड़े रहे, पर किसी ने उन्हें भीतर बैठने को नहीं कहा। रामप्रसाद व्यस्त थे धनवान मेहमानों के स्वागत में।

दरवाज़े पर बैठे हरिनारायण जी ने मुस्कुराकर कहा, “बेटा, शान दीवारों से नहीं, व्यवहार से बनती है।” उनकी आवाज़ धीमी थी, मगर पास खड़े अंशु ने सुन ली। अंशु को शर्म महसूस हुई। उसने तुरंत गुरुजी को अंदर बुलाया, उनके चरण छुए और आदर से बिठाया। यह दृश्य कई लोगों ने देखा और फुसफुसाहट शुरू हो गई।

उधर, महंगे पकवानों की भरमार के बावजूद मेहमानों के बीच अपनापन नहीं था। लोग दिखावे की बातें कर रहे थे—किसका तोहफा महंगा, किसकी साड़ी की कीमत ज्यादा। सगाई की चमक में सच्ची खुशी कहीं खो गई थी। तभी अचानक बिजली चली गई। जनरेटर भी काम नहीं कर रहा था। कुछ देर में अफरा-तफरी मच गई। सजावट की रोशनी बुझ गई, बैंड रुक गया, और मेहमान दरवाज़े पर खड़े-खड़े ऊबने लगे।

ऐसे में हरिनारायण जी ने अंशु से कहा, “बेटा, दीपक जलाओ और सबको आँगन में बुलाओ। रोशनी बाहर नहीं, भीतर जलती है।” अंशु ने वैसा ही किया। छोटे-छोटे दीये जलाए गए। सब लोग आँगन में गोल बैठ गए। हरिनारायण जी ने पुराने दिनों की बातें सुनाईं कैसे गांव में एक थाली में सब मिलकर खाते थे, कैसे रिश्ते धन से नहीं, दिल से बनते थे।

धीरे-धीरे माहौल बदलने लगा। लोग खुलकर हँसने लगे। सादगी में जो अपनापन था, वह किसी झूमर की रोशनी से अधिक उजला था। रामप्रसाद चुपचाप यह सब देख रहे थे। उन्हें अहसास हुआ कि उनकी झूठी शान ने सच्चे मेहमानों को दरवाज़े पर बैठा दिया था। जिनसे जीवन में सबसे ज्यादा सीखा, उन्हीं को सम्मान देने में वे पीछे रह गए।

समारोह के अंत में रामप्रसाद ने सबके सामने हरिनारायण जी से क्षमा मांगी। उन्होंने कहा, “आज समझ आया कि मेहमान दरवाज़े पर नहीं, दिल में बैठते हैं। शान का दिखावा पलभर का होता है, पर सादगी और सम्मान जीवनभर साथ रहते हैं।”

उस दिन के बाद हवेली का फाटक उतना ऊँचा नहीं लगा क्योंकि उसके भीतर का अहंकार छोटा हो गया था। रामप्रसाद ने सीखा कि असली शान धन में नहीं, विनम्रता में है। और गांव में यह कहावत फिर से गूंजने लगी...

“झूठी शान दरवाज़े बैठे मेहमान,
सच्चा मान दिल में होता स्थान।”

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