विनोद कुमार झा
भारतीय समाज में परिवार केवल साथ रहने की व्यवस्था नहीं, बल्कि संस्कारों, जिम्मेदारियों और पीढ़ियों के संवाद की सबसे मजबूत संस्था रहा है। माता-पिता और बुजुर्गों का सम्मान, पति-पत्नी के बीच संतुलन और बच्चों को नैतिक मूल्यों से जोड़ना यह कोई आधुनिक उपदेश नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से चली आ रही सामाजिक व्यवस्था का मूल है। इसके बावजूद आज यही व्यवस्था सबसे बड़े संकट से गुजर रही है। विडंबना यह है कि यह संकट बाहर से नहीं, भीतर से पैदा हो रहा है।
आदर्शों की सार्वजनिक घोषणाएँ, निजी जीवन में पराजय
आज समाज में शायद ही कोई परिवार होगा, जो यह न कहता हो कि उसका बेटा श्रवण कुमार जैसा है या मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आदर्शों पर चलता है। मंचों, सभाओं और धार्मिक आयोजनों में संस्कारों की दुहाई दी जाती है। लेकिन जैसे ही बेटा विवाह कर पुत्र से पति बनता है, वही आदर्श व्यवहारिक जीवन में बोझ लगने लगते हैं।
यह परिवर्तन केवल व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरी सामाजिक सोच का प्रतिबिंब है। विवाह के बाद पति का झुकाव धीरे-धीरे माता-पिता से हटकर पत्नी के परिवार और बाहरी सलाहों की ओर बढ़ता है। निर्णयों में माता-पिता की भूमिका सीमित होती जाती है और बुजुर्ग ‘अनावश्यक हस्तक्षेप’ का प्रतीक बना दिए जाते हैं।
बदलते रिश्ते या सुविधाजनक रिश्ते? : यह तर्क दिया जाता है कि समय बदल गया है, संयुक्त परिवार अब प्रासंगिक नहीं रहे। लेकिन प्रश्न यह नहीं है कि परिवार का स्वरूप बदला या नहीं, प्रश्न यह है कि क्या मूल्यों का क्षरण स्वीकार्य है? क्या माता-पिता का सम्मान केवल तब तक ही जरूरी है, जब तक वे आर्थिक या सामाजिक रूप से उपयोगी हों?
आज कई परिवारों में देखा जा रहा है कि पत्नी का सम्मान सही मायनों में सशक्तिकरण नहीं, बल्कि पति को उसके मूल दायित्वों से अलग करने का माध्यम बन रहा है। संतुलन की जगह पक्षधरता ने ले ली है। परिणामस्वरूप परिवार भीतर से टूट रहा है।
धर्मग्रंथों का सीमित उपयोग : रामायण, महाभारत और पुराणों का संदर्भ आज अक्सर प्रतीकात्मक रह गया है। राम का वनगमन मंचीय भाषणों तक सीमित है, श्रवण कुमार की सेवा पाठ्यपुस्तकों तक।
धर्म तब तक जीवित नहीं रहता, जब तक वह आचरण में न उतरे। केवल कथाएँ सुनाकर संस्कार नहीं दिए जा सकते। जब बच्चा देखता है कि उसके पिता अपने माता-पिता से संवाद नहीं रखते, तो वह यही सीखता है कि रिश्ते स्थायी नहीं, सुविधाजनक होते हैं।
सबसे बड़ा नुकसान: अगली पीढ़ी : इस सामाजिक बदलाव का सबसे गहरा असर बच्चों पर पड़ रहा है। वे न तो संयुक्त परिवार का स्नेह पाते हैं, न बुजुर्गों का अनुभव। उन्हें रिश्तों का संतुलन नहीं, बल्कि टकराव देखने को मिलता है। ऐसे में यह उम्मीद करना कि वही बच्चे आगे चलकर अपने माता-पिता के प्रति संवेदनशील होंगे एक भ्रम से अधिक कुछ नहीं। समाज यह भूल रहा है कि संस्कार विरासत में नहीं मिलते, वे वातावरण से बनते हैं।
समाधान कहाँ है? : समस्या का समाधान पत्नी को दोष देने या माता-पिता को आदर्श बना देने में नहीं है। समाधान संतुलन में है। पति का दायित्व है कि वह पत्नी के सम्मान और माता-पिता की मर्यादा के बीच सेतु बने, न कि किसी एक पक्ष का प्रतिनिधि।
परिवार तभी मजबूत रहेगा जब निर्णय संवाद से होंगे, त्याग एकतरफा नहीं होगा और सम्मान शर्तों पर आधारित नहीं रहेगा। पति-पत्नी और परिवार इन तीनों को अलग-अलग खाँचों में बाँटना ही आज की सबसे बड़ी सामाजिक भूल है। जब तक भारतीय समाज इस त्रिकोण को संतुलन के साथ नहीं समझेगा, तब तक परिवार की नींव कमजोर होती रहेगी।
आज आवश्यकता आत्ममंथन की है कि हम किसे आधुनिकता कह रहे हैं और किसे पिछड़ापन। क्योंकि यदि संस्कार ही पिछड़ापन हैं, तो भविष्य केवल सुविधाओं से नहीं,अकेलेपन से भरा होगा।
