सरसों के खेत में मचलते मन ...

 विनोद कुमार झा

- प्रेम, स्मृति और समाज के बीच झूलती मानवीय चेतना
- बसंत की पीली धूप में गूंथा एक गांव, एक प्रेम और एक सवाल

जब रिश्ते डिजिटल हो गए हों, यादें स्क्रीन में कैद हो गई हों और संवेदनाएं धीरे-धीरे सूख रही हों, तब भी कहीं दूर किसी गांव में सरसों के खेत आज भी प्रेम की भाषा बोलते हैं। यह कहानी सिर्फ दो दिलों की नहीं, बल्कि स्मृति और समाज के बीच झूलती मनुष्य की चेतना की है।

बसंत का मौसम आते ही सरसों के पीले फूल केवल खेत नहीं सजाते, वे बीते हुए प्रेम, अधूरी चाहतों और अनसुलझे सवालों को भी जगा देते हैं। यहां प्रेम कोई नाटकीय रोमांस नहीं, बल्कि मिट्टी में रची-बसी भावना है, जो समय के साथ बदलती है, पर मिटती नहीं।

यह कहानी राधा और मोहन की है, पर साथ ही हर उस दिल की भी है, जिसने कभी प्रेम किया, खोया और फिर भी जीना सीखा।

बसंत की हल्की हवा चली तो दूर-दूर तक फैले सरसों के खेत सोने का सागर बन गए। पीले फूलों की कतारें लहरातीं, झूमतीं और मानो आपस में कोई अनकही कहानी कह रही थीं। धूप की किरणें उन पर पड़तीं तो हर पंखुड़ी चमक उठती, जैसे किसी प्रेमी की आंखों में तैरती चमक।

खेत के बीचों-बीच एक पुरानी पगडंडी थी, जिस पर कभी राधा और मोहन साथ चला करते थे। आज भी वह पगडंडी उन्हें पहचानती थी। हवा जब सरसों को सहलाती तो फूल धीमे-धीमे फुसफुसाते, “प्रेम कभी मरता नहीं। यह मिट्टी में भी सांस लेता है, हवा में भी धड़कता है और यादों में तो सदा जीवित रहता है।”

फूल आपस में बतियाते। एक कहता, “देखो, वही रास्ता है जहां मोहन ने राधा का हाथ थामा था।” दूसरा जवाब देता, “और वहीं राधा ने आंखें झुका ली थीं, मानो पूरा आकाश उसमें उतर आया हो।”

यह कहानी किसी फिल्मी रोमांस जैसी नहीं, बल्कि गांवों की मिट्टी में पनपे उस प्रेम की है, जो समाज की मर्यादाओं से टकराता भी है और उनसे समझौता भी करता है।

हवा के झोंके के साथ पीले फूल लहराते और जैसे प्रेम की पुरानी धुन गुनगुनाते, “साथ थे, साथ हैं और साथ रहेंगे। शरीर भले मिट जाए, पर प्रेम अमर है।”

दूर से राधा खेत के किनारे खड़ी दिखी। अब वह वही चंचल लड़की नहीं रही। उसके चेहरे पर ठहराव था, पर आंखों में गहराई। उसने सरसों के फूलों को छुआ तो लगा जैसे मोहन की उंगलियां उसे छू रही हों।

उसे वही बसंत याद आया, वही खेत, वही हंसी और वही वादे। मोहन ने कहा था, “अगर कभी बिछड़ भी गए तो इन सरसों के फूलों में मुझे ढूंढ लेना।” आज मोहन देह रूप में नहीं था।

हवा जैसे उसकी आवाज बनकर बोली, “अनुभव करो, मैं यहीं हूं।” राधा की आंखें भर आईं। तभी उसे अपने भीतर दूसरी आवाज सुनाई दी उसकी चेतना, उसका विवेक और उसका समाज: “समाज है, लोकलाज है, मर्यादा है, परंपरा है और प्रतिष्ठा है।”

हर हवा का झोंका अतीत को छूता था और हर लहराती डाली किसी बिछड़े प्रेमी की याद दिलाती थी।

राधा ने सरसों के खेत की ओर देखते हुए धीरे से कहा,
“मोहन, प्रेम तुम्हारा मेरे भीतर रहेगा, पर मुझे आगे बढ़ना होगा। पीछे मुड़कर जीना, समाज मुझे नहीं देगा।”

सरसों के फूल फिर लहराए, मानो वे भी समझ रहे हों।

राधा ने मिट्टी को छुआ, माथे से लगाया और बोली,
“तुम मेरे अतीत हो, मेरी शक्ति हो, पर मेरा वर्तमान और भविष्य भी मुझे पुकार रहा है।”

वह आज उसी खेत के किनारे खड़ी थी, जहां कभी मोहन के साथ उसने सपने बुने थे। चेहरा शांत था, पर आंखों में स्मृतियों की हलचल। मोहन अब उसके साथ नहीं था, पर उसकी यादें इस मिट्टी में रची-बसी थीं।

लेकिन यह कहानी सिर्फ प्रेम की नहीं, समाज की भी है। गांव की परंपराएं, लोकलाज, मर्यादा और प्रतिष्ठा राधा के चारों ओर अदृश्य दीवारें खड़ी कर देती हैं। समाज उसे शोक में डूबे रहने की अनुमति देता है, पर अतीत में अटके रहने की नहीं।

उसी क्षण हल्की हवा चली। पीले फूल झूमे, जैसे कह रहे हों,
“प्रेम रोकता नहीं, वह पंख देता है।”

राधा ने आंचल संभाला और पगडंडी पर आगे बढ़ चली—पीछे नहीं, बल्कि नए जीवन की ओर। पर उसके भीतर कहीं मोहन की स्मृति जीवित रही, ठीक वैसे ही जैसे सरसों के खेत में बसी अमर सुगंध।

इस कथा में सरसों का खेत केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि केंद्रीय प्रतीक बन जाता है।

  • पीला रंग – जीवन और ऊर्जा का प्रतीक
  • लहराते फूल – समय की गति का संकेत
  • खुला आकाश – स्वतंत्रता और भविष्य का बोध

राधा जानती थी कि मोहन उसकी स्मृति में सदा रहेगा, पर जीवन को वहीं रोक देना न खुद के साथ न्याय होगा और न समाज के साथ। इसलिए वह सरसों की मिट्टी को छूकर प्रण लेती है कि वह आगे बढ़ेगी, पीछे नहीं।

यहीं यह कहानी व्यापक अर्थ ले लेती है। सरसों का खेत प्रेम, यादों, संघर्ष और पुनर्जन्म का प्रतीक बन जाता है। पीले फूल मानो संदेश देते हैं,
“प्रेम जंजीर नहीं, पंख है।”

आज जब गांवों में रिश्ते टूट रहे हैं, शहरों में संवेदनाएं सूख रही हैं और स्मृतियां डिजिटल फाइलों में कैद हो रही हैं, तब सरसों के ये खेत हमें याद दिलाते हैं कि प्रेम सिर्फ दो व्यक्तियों का मामला नहीं, बल्कि संस्कृति का हिस्सा है।

राधा का आगे बढ़ना हार नहीं, बल्कि परिपक्वता है। मोहन की याद मिटना नहीं, बल्कि अमर होना है। और सरसों के खेत तो बस लहराते रहेंगे पीले, उजले, मौन पर हर दिल की भाषा में बोलते हुए।

सूरज ढलने लगा। खेत सुनहरे से लालिमा में बदल गया। सरसों के फूल मानो अंतिम स्वर में कह रहे थे,
“प्रेम न कल मरा था, न आज मरेगा और न कल मरेगा। वह बस रूप बदलता है।” पगडंडी पर दूर जाती राधा के कदमों में अब डर नहीं, बल्कि साहस था यादों की गुदगुदी के साथ भविष्य की पुकार।

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