होली का रंग ससुराल में...

 - रिश्तों, परंपराओं और अपनत्व की रंगभरी कहानी

विनोद कुमार झा 

फाल्गुन का महीना आते ही हवा में जैसे कोई अदृश्य खुशबू घुल जाती है। सरसों के खेतों की पीली चादर, आम-मंजरियों की भीनी महक और दूर से आती ढोलक की थाप सब मिलकर बता देते हैं कि होली आने वाली है। यह केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि मन के कोनों में जमी उदासी को धोकर रिश्तों में नई चमक भर देने का अवसर है। परंतु शादी के बाद पहली होली का अनुभव कुछ अलग ही होता है, विशेषकर तब जब वह ससुराल में मनाई जानी हो।

यह कहानी है नेहा की एक साधारण, शिक्षित और संवेदनशील युवती, जिसकी शादी पिछले वर्ष एक संयुक्त परिवार में हुई थी। मायके में वह तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ी थी। होली के दिन घर की छत पर रंगों की टोकरी, रसोई में मां की व्यस्तता और आंगन में पापा की ठहाकों की गूंज उसके बचपन की अमिट स्मृतियां थीं। सहेलियों के साथ पिचकारी युद्ध, भाई की शरारतें और शाम को थककर एक-दूसरे के चेहरे पहचानने की कोशिश यही उसकी होली थी।

लेकिन इस बार सब कुछ अलग था। शादी के बाद पहली होली ससुराल में मनाई जानी थी। मन में उत्सुकता भी थी और एक अनकही झिझक भी। क्या ससुराल वाले उसे खुलकर रंग लगाएंगे? क्या वह वहां अपनेपन से हंस सकेगी? या फिर औपचारिकता की चादर ओढ़े बस परंपरा निभा लेगी?

होली से दो दिन पहले ही ससुराल में तैयारियां शुरू हो गई थीं। आंगन में गोबर से चौक बनाया गया, दीवारों पर रंगीन कागज की झालरें सजीं और रसोई में पकवानों की लंबी सूची तैयार हुई। सास ने नेहा को पास बिठाकर कहा, “बेटी, पहली होली हर लड़की के जीवन में खास होती है। तुम बस मुस्कुराती रहना, बाकी सब हम संभाल लेंगे।” इन शब्दों में जो स्नेह था, उसने नेहा के मन की आशंका को थोड़ा हल्का कर दिया।

होलिका दहन की शाम पूरा परिवार एकत्र हुआ। मोहल्ले की महिलाएं पारंपरिक गीत गा रही थीं “होली आई रे कन्हाई…” अग्नि की लपटें आसमान को छूने लगीं। नेहा ने अग्नि की परिक्रमा करते हुए मन ही मन प्रार्थना की कि उसके जीवन में भी यह अग्नि पुराने संकोचों और भय को जला दे। ससुर ने उसके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया“सदा खुश रहो।” उस क्षण उसे लगा कि यह घर केवल औपचारिक संबंधों का नहीं, बल्कि सच्चे स्नेह का आधार है।

अगली सुबह सूरज जैसे थोड़ी जल्दी ही निकल आया। देवर की शरारती आवाज ने नेहा को चौंका दिया “भाभी, बाहर आइए, होली शुरू हो गई!” वह अभी तैयार भी नहीं हुई थी कि हल्का-सा गुलाल उसके गालों पर लग चुका था। पहले तो वह सकुचाई, फिर मुस्कुरा दी। देखते ही देखते पूरा आंगन रंगों से भर गया। जेठानी ने हंसी-हंसी में उसके चेहरे पर अबीर लगाया और बोली, “अब तो हमारी बहू पूरी तरह रंग में रंग गई।”

ससुराल की होली में एक अलग ही लय थी। यहां रंगों के साथ-साथ लोकगीतों की परंपरा भी जीवित थी। ढोलक की थाप पर महिलाएं फाग गा रही थीं, पुरुष एक-दूसरे को गले लगा रहे थे। पड़ोसी भी बिना बुलाए आ जाते और कहते “नई बहू की होली देखने आए हैं।” नेहा के लिए यह सब नया था, लेकिन अनजान नहीं। उसे महसूस हुआ कि रंग चाहे नए हों, पर भावनाएं वही हैं जो मायके में थीं।

दोपहर तक नेहा थककर चूर हो गई थी, पर मन संतोष से भरा था। सास ने उसके हाथ में मिठाई थमाते हुए कहा, “आज तुमने हमारे घर की रौनक बढ़ा दी।” यह सुनते ही उसकी आंखें भर आईं। उसे एहसास हुआ कि रिश्तों का असली रंग विश्वास और अपनत्व में छिपा होता है।

शाम को जब उसने मायके फोन किया, तो मां ने उत्सुकता से पूछा, “कैसी रही पहली होली?” नेहा ने हल्की हंसी के साथ जवाब दिया, “मां, लगा ही नहीं कि मैं मायके से दूर हूं। यहां भी सबने इतना प्यार दिया कि रंगों के साथ मन भी भीग गया।”

समाज में अक्सर यह धारणा रही है कि लड़की के लिए मायका ही उसका असली घर होता है और ससुराल एक नई, अनजानी दुनिया। परंतु जब दोनों घरों के लोग प्रेम और सम्मान से भरे हों, तो यह विभाजन स्वतः मिट जाता है। होली का त्योहार इसी पुल का काम करता है जो दो परिवारों, दो संस्कृतियों और दो पीढ़ियों को एक सूत्र में बांध देता है।

नेहा की पहली होली ने उसे सिखाया कि नए रिश्तों को अपनाने में पहल दोनों ओर से होनी चाहिए। यदि ससुराल उसे बेटी की तरह अपनाए और बहू मन खोलकर उस अपनत्व को स्वीकार करे, तो हर त्योहार एक नई शुरुआत बन सकता है। रंगों का यह उत्सव केवल चेहरे नहीं रंगता, बल्कि दिलों में भी नई आभा भर देता है।

फाल्गुन की उस शाम, जब आंगन में रंग सूख चुके थे और हवा में अबीर की हल्की सुगंध बाकी थी, नेहा ने महसूस किया कि उसके जीवन का एक नया अध्याय रंगों से सजा हुआ है। अब उसके लिए होली का अर्थ केवल बचपन की शरारतें नहीं, बल्कि रिश्तों की गहराई और नए घर की जिम्मेदारियां भी हैं।

सच तो यह है कि होली का असली रंग वहीं खिलता है, जहां मन खुला हो और रिश्तों में स्नेह की नमी हो। चाहे वह मायका हो या ससुराल जब अपनापन साथ हो, तो हर आंगन रंगों से भर उठता है। और यही है “होली का रंग ससुराल में” जहां रंग केवल चेहरे पर नहीं, दिलों पर भी चढ़ते हैं और देर तक उतरते नहीं।

Post a Comment

Previous Post Next Post