- अपने मन में महान होने का भ्रम पालना आसान है, पर समाज की नजरों में महान वही होता है जो सच्चाई और सेवा के रास्ते पर चलता है।
- दिखावा कुछ समय के लिए चमक सकता है, लेकिन सच्चे कर्म की रोशनी ही स्थायी होती है।
लेखक: विनोद कुमार झा
गांव के बीचों-बीच बनी पुरानी हवेली में रहने वाले रमेश बाबू अपने आप को बहुत महान समझते थे। उनके अनुसार वे समाजसेवी थे, धर्मात्मा थे, और लोगों के दुख-दर्द के साथी थे। चौपाल पर बैठकर वे अक्सर बड़े-बड़े उपदेश दिया करते “इंसान को हमेशा दूसरों की मदद करनी चाहिए, यही सच्चा धर्म है।” लोग उनकी बातें सुनते, सिर हिलाते और आगे बढ़ जाते। पर सच्चाई यह थी कि उनकी बातें जितनी ऊंची थीं, कर्म उतने ही खोखले।
रमेश बाबू हर त्योहार पर मंदिर में बड़ी-बड़ी घोषणाएँ करते। एक बार उन्होंने गांव के मंदिर में दान देने की घोषणा की और अपने नाम का पत्थर भी लगवा दिया। उस दिन पूरे गांव में चर्चा थी कि रमेश बाबू कितने उदार हैं। लेकिन किसी को यह नहीं पता था कि मंदिर के लिए दिया गया पैसा असल में गांव की सहकारी समिति से उधार लिया गया था, जिसे चुकाने की कोई योजना उनके पास नहीं थी। वे सिर्फ अपने नाम की चमक चाहते थे, न कि सच्ची सेवा।
उसी गांव में एक साधारण किसान रहता था श्यामलाल। वह ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था, न ही उसके पास बड़ी हवेली थी। पर उसके दिल में सच्ची करुणा थी। जब भी किसी के घर में बीमारी होती, वह बिना बुलाए पहुंच जाता। किसी की फसल खराब होती, तो अपने खेत से अनाज दे आता। उसने कभी इसका ढिंढोरा नहीं पीटा। गांव वाले उसे चुपचाप “सच्चा इंसान” कहते थे, लेकिन श्यामलाल को इससे कोई मतलब नहीं था।
एक दिन गांव में भारी बारिश हुई। कई कच्चे मकान गिर गए। लोग परेशान हो उठे। रमेश बाबू ने फिर चौपाल पर भाषण दिया “हम सबको मिलकर पीड़ितों की मदद करनी चाहिए।” उन्होंने राहत के लिए चंदा इकट्ठा करने की बात कही, पर खुद एक भी रुपया तुरंत नहीं दिया। वे इंतजार करते रहे कि पहले दूसरे लोग दें, ताकि वे बाद में थोड़ी सी राशि देकर भी बड़ा दिख सकें।
वहीं श्यामलाल ने बिना समय गंवाए अपने घर का एक कमरा उन परिवारों को दे दिया जिनका घर गिर गया था। उसने अपने जमा किए हुए पैसे निकालकर बच्चों के लिए कपड़े और दवाइयाँ खरीदीं। गांव के नौजवान उसके साथ खड़े हो गए। देखते ही देखते राहत का काम शुरू हो गया। लोगों ने पहली बार महसूस किया कि महानता शब्दों में नहीं, कर्मों में होती है।
कुछ दिनों बाद सहकारी समिति ने रमेश बाबू से उधार की रकम लौटाने को कहा। जब बात खुली तो गांव वालों को पता चला कि मंदिर के नाम पर लिया गया पैसा उन्होंने लौटाया ही नहीं था। उनकी छवि धूमिल हो गई। चौपाल पर अब उनके भाषण सुनने वाला कोई नहीं था। जो लोग पहले उनकी तारीफ करते थे, वे अब चुप रहने लगे।
रमेश बाबू को पहली बार एहसास हुआ कि अपने मन में खुद को महान समझ लेना आसान है, लेकिन हकीकत की कसौटी पर वही खरा उतरता है जो बिना दिखावे के दूसरों के लिए जीता है। उन्होंने श्यामलाल से मिलकर कहा, “मुझसे गलती हुई। मैंने नाम के लिए काम किया, तुमने दिल से।” श्यामलाल ने मुस्कुराकर कहा, “महान बनने की कोशिश मत कीजिए, बस अच्छा इंसान बनने की कोशिश कीजिए।”
समय के साथ रमेश बाबू ने सचमुच खुद को बदलने की ठानी। उन्होंने बिना प्रचार किए सहकारी समिति का कर्ज चुकाया और गांव के कामों में चुपचाप हाथ बंटाने लगे। अब वे चौपाल पर कम बोलते और ज्यादा करते थे। धीरे-धीरे लोगों का विश्वास लौटने लगा।
कहानी हमें यही सिखाती है कि अपने मन में महान होने का भ्रम पालना आसान है, पर समाज की नजरों में महान वही होता है जो सच्चाई और सेवा के रास्ते पर चलता है। दिखावा कुछ समय के लिए चमक सकता है, लेकिन सच्चे कर्म की रोशनी ही स्थायी होती है।
