दो मार्च को प्रदोष काल में जलेगी होलिका...

 -होलिका दहन का शुभ मुहूर्त सायं 06:39 बजे से रात्रि 01:00 बजे तक 

विनोद कुमार झा 

फाल्गुन की मादक हवाओं के साथ जब सरसों के खेत पीले होकर मुस्कुराते हैं और आम के पेड़ों पर बौर की खुशबू फैलती है, तब पूरे देश में एक ही नाम गूंजता है होली। रंगों, उमंगों और प्रेम से सराबोर यह पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की जीवंत पहचान है। हिंदू धर्म में होली का विशेष महत्व है, क्योंकि यह बुराई पर अच्छाई की विजय, सामाजिक समरसता और आपसी प्रेम का संदेश देती है।

गांव की चौपाल से लेकर महानगरों की ऊंची इमारतों तक, हर जगह एक ही उत्साह दिखाई देता है। दूरदराज महानगरों में काम करने वाले लोग अपने घर लौटने की तैयारी में जुट जाते हैं। रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर टिकट की होड़, बाजारों में रंग-गुलाल और पिचकारियों की खरीदारी, मिठाइयों की दुकानों पर उमड़ती भीड़ ये सब इस बात के प्रमाण हैं कि होली केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि परिवार के साथ मिलने का बहाना भी है।

हिंदू धर्म में होली का महत्व

हिंदू शास्त्रों के अनुसार होली फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है। यह ऋतु परिवर्तन का भी संकेत है शीत ऋतु के विदा होने और वसंत के आगमन का उत्सव। धार्मिक दृष्टि से यह पर्व मन, वचन और कर्म की शुद्धि का प्रतीक है। होलिका दहन के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर की नकारात्मक प्रवृत्तियों अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष और क्रोध को अग्नि में समर्पित करता है।

अगले दिन रंगोत्सव मनाया जाता है, जिसमें लोग एक-दूसरे को रंग लगाकर गिले-शिकवे भुला देते हैं। यह परंपरा सामाजिक समरसता को मजबूत करती है और प्रेम के बंधन को प्रगाढ़ बनाती है।

पौराणिक कथाएं और आस्था का आधार

होली से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा भक्त प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु की है। कथा के अनुसार, असुर राजा हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्लाद को भगवान विष्णु की भक्ति से रोकने के लिए अनेक प्रयास किए। अंततः उसने अपनी बहन होलिका की सहायता से प्रह्लाद को अग्नि में जलाने की योजना बनाई। होलिका को वरदान था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी, लेकिन ईश्वर की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गए और होलिका दहन हो गई। तभी से होलिका दहन बुराई के अंत और भक्ति की विजय का प्रतीक माना जाता है।

ब्रज क्षेत्र में होली का संबंध श्रीकृष्ण और राधा की प्रेम-लीला से भी जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण ने राधा और गोपियों के साथ रंग खेलकर प्रेम और उल्लास का संदेश दिया। आज भी मथुरा-वृंदावन की होली विश्व प्रसिद्ध है, जहां लठमार होली और फूलों की होली जैसे अनोखे आयोजन होते हैं।

प्रेमी-प्रेमिका के मनमोहक दृश्य

होली प्रेम का भी पर्व है। युवा दिलों के लिए यह दिन विशेष मायने रखता है। रंगों के बहाने मन की बात कहने का अवसर मिलता है। गुलाल का हल्का स्पर्श, आंखों में झलकती मुस्कान और ढोल की थाप पर थिरकते कदम यह सब मिलकर प्रेम के मनमोहक दृश्य रचते हैं।

गांवों में जहां परंपरागत लोकगीतों की गूंज होती है, वहीं शहरों में आधुनिक संगीत की धुन पर रंगों की बारिश होती है। लेकिन हर जगह भाव एक ही होता है अपनों के साथ खुशियां बांटना।

होलिका दहन: शुभ मुहूर्त और धार्मिक मान्यता

विभिन्न पंचांगों के अनुसार इस वर्ष फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि सोमवार, 2 मार्च 2026 को सायं 05:57 बजे समाप्त हो रही है। इसके पश्चात पूर्णिमा तिथि प्रदोष काल में प्रारंभ होगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार 2 मार्च 2026 को सायं 06:39 बजे से रात्रि 01:00 बजे तक प्रदोष काल में होलिका दहन करना श्रेष्ठ रहेगा। क्योंकि 3 मार्च 2026 को पूर्णिमा तिथि प्रदोष काल से पूर्व ही समाप्त हो रही है और उसी दिन चंद्रग्रहण भी है। शास्त्रों के अनुसार ग्रहण काल में होलिका दहन करना शुभ नहीं माना गया है। अतः श्रद्धालुओं को प्रदोष काल में ही विधिवत पूजा-अर्चना कर होलिका दहन करना चाहिए।

होलिका दहन से पूर्व विधि-विधान से पूजन किया जाता है। कच्चे सूत से परिक्रमा, रोली-चावल से तिलक, नई फसल की बालियां अर्पित करना और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करना ये सभी परंपराएं इस पर्व को आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान करती हैं।

घर लौटते कदम और सामाजिक समरसता

होली के अवसर पर महानगरों से गांवों की ओर लौटते लोगों की भीड़ अपने आप में एक भावुक दृश्य प्रस्तुत करती है। प्रवासी श्रमिक हों या नौकरीपेशा युवा हर कोई अपने माता-पिता, भाई-बहनों और बचपन के दोस्तों के साथ रंग खेलने को आतुर रहता है। यह पर्व सामाजिक भेदभाव मिटाने का भी अवसर है। होली के रंग जाति, वर्ग और आर्थिक अंतर को ढक देते हैं। अमीर-गरीब, छोटे-बड़े सभी एक-दूसरे को गले लगाते हैं।

समय के साथ होली मनाने के तरीके बदल रहे हैं। अब रासायनिक रंगों के स्थान पर प्राकृतिक और हर्बल रंगों के उपयोग पर जोर दिया जा रहा है। जल संरक्षण का संदेश भी दिया जा रहा है, ताकि त्योहार की खुशी के साथ पर्यावरण की रक्षा भी सुनिश्चित हो सके।

 होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का उत्सव है जहां प्रेम, आस्था, परंपरा और सामाजिक एकता एक साथ दिखाई देते हैं। होलिका दहन की अग्नि हमें यह स्मरण कराती है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयां आएं, सत्य और भक्ति की विजय निश्चित है। इस होली, आइए हम भी अपने मन की कड़वाहट को जला दें और प्रेम के रंगों से जीवन को सराबोर कर दें।

रंगों का यह पर्व सभी के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाए। इसी मंगलकामना के साथ।

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