महाराष्ट्र के नगर निगम चुनावों ने यह साफ कर दिया है कि राजनीति में भ्रम, विभाजन और भावनात्मक अपील अब ज्यादा दूर तक नहीं चलती। देश के सबसे ताकतवर नगर निकाय बीएमसी समेत 29 नगर निगमों में बीजेपी के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन की बंपर जीत केवल चुनावी सफलता नहीं, बल्कि विपक्ष के लिए सीधी चेतावनी है। यह जनादेश बताता है कि शहरी मतदाता अब स्थिरता, निर्णायक नेतृत्व और सत्ता में स्पष्टता चाहता है।
बीएमसी की 227 सीटों में से महायुति द्वारा 118 सीटें जीतना साधारण उपलब्धि नहीं है। यह बहुमत के आंकड़े से आगे जाकर दिया गया भरोसा है। नौ साल बाद हुए इन चुनावों में जनता ने किसी प्रयोग या सहानुभूति को नहीं, बल्कि सत्ता संभालने की क्षमता को वोट दिया है। मुंबई जैसे महानगर में जहां प्रशासनिक दक्षता रोजमर्रा की ज़िंदगी से सीधे जुड़ी होती है, वहां मतदाता ने साफ संदेश दिया है कि उसे अस्थिर राजनीति मंजूर नहीं।
सबसे बड़ा राजनीतिक झटका शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट और एमएनएस के गठबंधन को लगा है। कभी मुंबई की राजनीति का पर्याय रही शिवसेना आज अपनी ही टूट-फूट का शिकार नजर आई। उद्धव ठाकरे गुट के लिए यह हार केवल सीटों की नहीं, बल्कि विश्वसनीयता की भी हार है। जनता ने साफ कर दिया है कि अतीत की विरासत, भावनात्मक भाषण और सत्ता से बाहर बैठकर किए गए आरोप अब वोट में तब्दील नहीं होते।
एमएनएस की भूमिका भी एक बार फिर सीमित दायरे में सिमटकर रह गई। तेज तेवर और आक्रामक राजनीति का शोर तो सुनाई दिया, लेकिन मतपेटी तक पहुंचते-पहुंचते वह असरहीन साबित हुआ। यह संकेत है कि शहरी मतदाता अब केवल मुद्दों और नतीजों की राजनीति समझता है।
46 से 50 प्रतिशत के बीच दर्ज हुई वोटिंग यह बताती है कि शहरी जनता उदासीन नहीं है, बल्कि वह चुनाव में हिस्सा लेकर सत्ता को आईना दिखाना जानती है। 2,516 उम्मीदवारों की भीड़ के बावजूद महायुति का स्पष्ट बहुमत यह दर्शाता है कि मतदाता भ्रमित नहीं था। उसने चुनकर फैसला दिया।
बीएमसी पर नियंत्रण का अर्थ केवल नगर निगम की सत्ता नहीं, बल्कि मुंबई की आर्थिक और प्रशासनिक नब्ज पर पकड़ है। इस जीत के बाद महायुति के कंधों पर जिम्मेदारी भी उतनी ही भारी है। यदि विकास, पारदर्शिता और सुशासन के वादे जमीन पर नहीं उतरे, तो यही शहरी मतदाता अगले चुनाव में उतनी ही सख्ती से हिसाब भी चुकता करेगा।
कुल मिलाकर, बीएमसी चुनाव परिणाम एक स्पष्ट संदेश हैं राजनीति में अब बहाने नहीं, परिणाम चाहिए। जो सत्ता संभालने की तैयारी में नहीं, जनता उसे सत्ता सौंपने के मूड में भी नहीं है। मुंबई ने फैसला सुना दिया है, अब बाकी महाराष्ट्र और देश उसकी गूंज सुनेगा।
- संपादक
