विनोद कुमार झा
हिंदू पंचांग के अनुसार माघ मास की अमावस्या को मौनी अमावस्या कहा जाता है। यह तिथि आत्मशुद्धि, संयम और साधना का प्रतीक मानी जाती है। ‘मौन’ का अर्थ केवल वाणी का संयम नहीं, बल्कि मन, इंद्रियों और विचारों का भी नियंत्रण है। शास्त्रों में वर्णित है कि इस दिन मौन व्रत, तीर्थ-स्नान, दान और ध्यान से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। प्रयागराज, हरिद्वार, काशी और नासिक जैसे तीर्थों में इस दिन स्नान का विशेष महत्व है। मौनी अमावस्या से जुड़ी कई पौराणिक कथाएँ आज भी जनमानस में प्रचलित हैं, जो इसके आध्यात्मिक महत्त्व को रेखांकित करती हैं।
मनु महाराज और मौन की साधना की कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, सृष्टि के प्रथम मानव मनु महाराज ने माघ अमावस्या के दिन मौन व्रत धारण कर कठोर तप किया था। उन्होंने वाणी और मन दोनों पर नियंत्रण रखकर ब्रह्म का ध्यान किया। उनकी इस साधना से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें जीवन के गूढ़ रहस्य बताए और धर्मपूर्वक शासन का आशीर्वाद दिया। तभी से इस अमावस्या को ‘मौनी’ कहा जाने लगा। यह कथा बताती है कि मौन आत्मज्ञान का द्वार खोलता है।
गंगा स्नान और पापक्षय की परंपरा की कथा
एक अन्य कथा के अनुसार, देवताओं और ऋषियों ने माघ अमावस्या के दिन गंगा स्नान कर अपने तप को पूर्ण किया। माना जाता है कि इस दिन गंगा में स्नान करने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट होते हैं। प्रयागराज के संगम पर देवताओं का अवतरण माना गया है, जहाँ वे अमृत-स्नान करते हैं। इसी विश्वास के कारण मौनी अमावस्या पर करोड़ों श्रद्धालु पवित्र नदियों में आस्था की डुबकी लगाते हैं।
राजा हरिश्चंद्र और सत्य का मौन की कथा
राजा हरिश्चंद्र की कथा भी मौनी अमावस्या से जोड़ी जाती है। कहा जाता है कि सत्य और धर्म की रक्षा हेतु उन्होंने इस दिन मौन व्रत रखकर अपने कर्तव्यों का निर्वाह किया। मौन रहकर भी उन्होंने सत्य का मार्ग नहीं छोड़ा। उनकी परीक्षा कठिन थी, पर अंततः देवताओं ने उनकी सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर उन्हें पुनः राज्य और सम्मान प्रदान किया। यह कथा सिखाती है कि मौन धैर्य और सत्य की शक्ति को बढ़ाता है।
ऋषियों का मौन और ब्रह्मज्ञान की कथा
शास्त्रों में वर्णित है कि अनेक ऋषि-मुनि मौनी अमावस्या के दिन दीर्घ मौन साधना करते थे। उनका विश्वास था कि मौन से मन की चंचलता शांत होती है और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति सरल होती है। ऋषि दत्तात्रेय और महर्षि पतंजलि के आश्रमों में इस दिन मौन का विशेष विधान था। इसी परंपरा के कारण आज भी साधु-संत इस तिथि को मौन व्रत को सर्वोच्च मानते हैं।
दान और करुणा का फल की कथा
एक लोककथा के अनुसार, एक निर्धन ब्राह्मण ने मौनी अमावस्या पर मौन रखकर अन्न और वस्त्र का दान किया। उसके इस निःस्वार्थ कर्म से प्रसन्न होकर देवी लक्ष्मी ने उसके घर में स्थायी समृद्धि का वास किया। तभी से इस दिन दान अन्न, वस्त्र, तिल और कंबल का विशेष महत्व माना गया है।
मौनी अमावस्या केवल एक तिथि नहीं, बल्कि आत्मसंयम, करुणा और आध्यात्मिक उन्नयन का पर्व है। पौराणिक कथाएँ हमें सिखाती हैं कि मौन के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर की शक्ति को पहचान सकता है। स्नान, दान, ध्यान और मौन इन चारों का समन्वय इस दिन को विशेष बनाता है। आज के भागदौड़ भरे जीवन में मौनी अमावस्या का संदेश और भी प्रासंगिक है कम बोलें, अधिक सोचें और धर्म के मार्ग पर चलें।
