प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस और सोमनाथ के संबोधन ने एक साथ दो महत्वपूर्ण विमर्शों को सामने रखा एक ओर वैश्विक अनिश्चितता के दौर में भारत की आर्थिक-राजनीतिक स्थिरता, और दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वाभिमान, सांस्कृतिक चेतना व ऐतिहासिक सत्य के पुनर्पाठ की आवश्यकता। ये दोनों विषय आज के भारत की दिशा और दशा को परिभाषित करते हैं। आज जब विश्व आर्थिक मंदी, भू-राजनीतिक तनाव और तकनीकी अस्थिरताओं से जूझ रहा है, तब भारत एक अपेक्षाकृत स्थिर, भरोसेमंद और अवसरों से भरे गंतव्य के रूप में उभर रहा है। प्रधानमंत्री का यह कहना कि दुनिया की उम्मीदें भारत से बढ़ रही हैं, केवल राजनीतिक वक्तव्य नहीं, बल्कि नीतिगत निरंतरता, मजबूत शासन और सुधार-केंद्रित विकास मॉडल का प्रतिबिंब है। यूपीआई का विश्व का अग्रणी रियल-टाइम डिजिटल भुगतान मंच बनना, मोबाइल डेटा उपभोग में भारत का शीर्ष पर होना और निवेश के प्रति अनुकूल माहौल ये सभी संकेत भारत की संरचनात्मक मजबूती को दर्शाते हैं।
आईएमएफ सहित अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा भारत को वैश्विक विकास का इंजन कहा जाना इस विश्वास को और पुष्ट करता है कि सुधार, प्रदर्शन और परिवर्तन की त्रिवेणी पर आगे बढ़ता भारत निवेशकों के लिए दीर्घकालिक भरोसे का केंद्र है।सोमनाथ के संदर्भ में प्रधानमंत्री का संदेश केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए चेतावनी और प्रेरणा दोनों है। उन्होंने रेखांकित किया कि तलवारों के युग के बाद भी भारत के विरुद्ध षड्यंत्र समाप्त नहीं हुए हैं—उनके स्वरूप बदले हैं। ऐसे में राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक चेतना अनिवार्य हो जाती है।
सोमनाथ मंदिर का इतिहास विनाश की कथा भर नहीं, बल्कि पुनर्निर्माण, धैर्य और विजय का प्रतीक है। 1951 में सरदार पटेल द्वारा पुनर्निर्माण का संकल्प और उसके मार्ग में आई बाधाएँ बताती हैं कि स्वतंत्र भारत में भी सांस्कृतिक स्वाभिमान के प्रश्न आसान नहीं रहे। आज 75 वर्षों बाद उसी पुनर्निर्माण की विरासत हमें आत्मावलोकन का अवसर देती है। प्रधानमंत्री ने यह प्रश्न भी उठाया कि क्यों वीर हमीरजी गोहिल और वेगडाजी भील जैसे योद्धाओं को वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। इतिहास के कुछ अध्यायों को या तो दबाया गया या विकृत किया गया यह स्वीकारोक्ति आज की पीढ़ी के लिए महत्वपूर्ण है। नफरत, अत्याचार और आतंक के सच्चे इतिहास को छिपाकर किसी समाज का स्वस्थ भविष्य नहीं रचा जा सकता।
सोमनाथ के नाम में निहित ‘सोम’ अमृत का प्रतीकात्मक उल्लेख यह बताता है कि भारत की सभ्यता ने विष पीकर भी अमर रहने का संदेश दिया है। यही भारतीय चेतना की मूल शक्ति है। वाइब्रेंट गुजरात का मंच और सोमनाथ की भूमि दोनों मिलकर यह संदेश देते हैं कि भारत का भविष्य केवल आर्थिक आंकड़ों से नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, सांस्कृतिक गौरव और ऐतिहासिक सत्य के साथ जुड़ा है। निवेश, नवाचार और तकनीक के साथ-साथ यदि राष्ट्रीय चेतना सशक्त होती है, तो भारत न केवल वैश्विक विकास का इंजन बनेगा, बल्कि मूल्यों और सभ्यतागत आत्मबल का भी मार्गदर्शक होगा।आज आवश्यकता है कि हम विकास की गति को तेज रखते हुए, एकजुटता, सत्य और स्वाभिमान की उस ज्योति को भी प्रज्वलित रखें जो भारत को हर अनिश्चितता में निश्चितता प्रदान करती है।
- संपादक
