कानून के राज पर पथराव की चुनौती

 विनोद कुमार झा

दिल्ली के तुर्कमान गेट इलाके में अतिक्रमण हटाने गई एमसीडी और पुलिस टीम पर हुआ पथराव केवल एक स्थानीय कानून-व्यवस्था की घटना नहीं है, बल्कि यह शहरी प्रशासन, न्यायिक आदेशों के पालन और सामाजिक जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। दिल्ली हाई कोर्ट के स्पष्ट निर्देश पर की जा रही कार्रवाई के दौरान जिस तरह संगठित भीड़ ने हिंसा का रास्ता अपनाया, वह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत है। अतिक्रमण हटाने की यह कार्रवाई लगभग 50 वर्षों बाद हो रही थी। वर्ष 1976 में आपातकाल के दौर की ध्वस्तीकरण कार्रवाई की स्मृतियां आज भी लोगों के मन में जीवित हैं, लेकिन वर्तमान कार्रवाई उस दौर से भिन्न थी। यह किसी राजनीतिक या प्रशासनिक मनमर्जी का परिणाम नहीं, बल्कि न्यायालय के आदेश का पालन थी। इसके बावजूद, रात के अंधेरे में करीब 300 लोगों की भीड़ का इकट्ठा होना, बैरिकेड तोड़ना, पुलिसकर्मियों पर पत्थर बरसाना और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, यह दर्शाता है कि कुछ तत्व जानबूझकर माहौल को बिगाड़ना चाहते थे।

इस हिंसा में चांदनी महल थाने के एसएचओ सहित पांच पुलिसकर्मी घायल हुए। यह तथ्य अपने आप में बताता है कि भीड़ कितनी उग्र थी। पुलिस को आंसू गैस के गोले छोड़ने और लाठीचार्ज जैसे कठोर कदम उठाने पड़े, जो किसी भी प्रशासन के लिए अंतिम विकल्प होते हैं। बावजूद इसके, टीम ने 30 से अधिक बुलडोजरों की मदद से 36,427 वर्ग मीटर सरकारी जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराया, जो यह दर्शाता है कि प्रशासन कानून के पालन को लेकर दृढ़ था। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे गंभीर प्रश्न उकसावे की भूमिका को लेकर है। कार्रवाई से ठीक पहले एक प्रभावशाली धार्मिक व्यक्ति और सांसद द्वारा बैठक किए जाने, और उसके कुछ ही घंटों बाद हिंसा भड़कने की आशंका, मामले को और संवेदनशील बना देती है। यदि जांच में यह सिद्ध होता है कि किसी ने जानबूझकर लोगों को भड़काया, तो यह न केवल कानून का उल्लंघन होगा, बल्कि सामाजिक सौहार्द पर भी सीधा हमला माना जाएगा। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, लेकिन हिंसा और दंगे के लिए उकसाना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं हो सकता।

यह भी चिंता का विषय है कि धार्मिक भावनाओं और अफवाहों का सहारा लेकर लोगों को गुमराह किया जाता है। अतिक्रमण चाहे किसी भी नाम पर हो, वह अंततः कानून का उल्लंघन है। शहर की बढ़ती आबादी, अव्यवस्थित निर्माण और सार्वजनिक जमीन पर कब्जे दिल्ली जैसे महानगर को रहने लायक बनाए रखने में सबसे बड़ी बाधा हैं। यदि हर अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई को हिंसा से जोड़ दिया जाएगा, तो ‘स्वच्छ और सुव्यवस्थित दिल्ली’ का सपना कभी पूरा नहीं हो सकेगा।

इस घटना से स्पष्ट संदेश निकलता है कि कानून का राज किसी भी दबाव से ऊपर होना चाहिए। दोषियों की पहचान कर सख्त कार्रवाई जरूरी है, ताकि भविष्य में कोई भी न्यायिक आदेशों को चुनौती देने के लिए हिंसा का सहारा न ले। साथ ही, प्रशासन की यह जिम्मेदारी भी बनती है कि संवेदनशील इलाकों में संवाद, पारदर्शिता और समय रहते विश्वास-निर्माण के प्रयास किए जाएं। तुर्कमान गेट की घटना एक चेतावनी है यदि कानून के पालन और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन नहीं बना, तो शहरी अराजकता और गहरी हो सकती है। अब वक्त है कि समाज, राजनीति और प्रशासन, तीनों मिलकर यह स्पष्ट करें कि लोकतंत्र में विरोध का स्थान है, लेकिन पत्थर और हिंसा का नहीं।

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