नभ में जलते दीए...

 अंधकार के बीच उम्मीद, संघर्ष और मौन रोशनी की कहानी

विनोद कुमार झा

शाम का समय जैसे ही दिन और रात के बीच एक अदृश्य पुल बनाता है, आकाश अपने भीतर असंख्य दीयों को प्रज्ज्वलित कर लेता है। धीरे-धीरे उभरते तारे केवल खगोलीय पिंड नहीं होते, वे मनुष्य के जीवन में जलती उन आशाओं के प्रतीक होते हैं, जो तमाम अंधेरों के बावजूद बुझती नहीं हैं। नभ में जलते ये दीए हमें याद दिलाते हैं कि अंधकार चाहे जितना गहरा हो, रोशनी की एक छोटी-सी लौ भी उसे चुनौती दे सकती है।

भारतीय लोकजीवन में आकाश और तारों का विशेष स्थान रहा है। गांवों में आज भी बुजुर्ग बच्चों को यह कहते सुनाई दे जाते हैं कि हर तारा किसी न किसी की कहानी है। कोई तारा संघर्ष का प्रतीक है, कोई प्रतीक्षा का, तो कोई अधूरे सपनों का। रात के सन्नाटे में जब लोग अपने दिनभर की थकान के साथ आंगन या छत पर बैठते हैं, तब आकाश से झांकते ये दीए उनके मन को सांत्वना देते हैं। मानो वे कह रहे हों—थक जाओ, लेकिन उम्मीद मत छोड़ो।

यह प्रतीकात्मकता केवल भावनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारे सामाजिक यथार्थ से गहराई से जुड़ी हुई है। समाज के हर कोने में ऐसे लोग मिल जाते हैं, जिनका जीवन स्वयं एक जलता हुआ दीया है। सीमित साधनों में बच्चों को पढ़ाने वाला शिक्षक, अपने छोटे से खेत में नई तकनीक आजमाता किसान, शहर की चमक के बीच ईमानदारी से संघर्ष करता श्रमिक ये सभी नभ में जलते दीए हैं। वे न तो शोर मचाते हैं, न ही प्रशंसा की अपेक्षा रखते हैं, फिर भी उनका अस्तित्व अंधकार को कम करता रहता है।

आज के समय में, जब सूचनाओं की बाढ़ में नकारात्मकता तेजी से फैलती है, तब ऐसे दीयों की रोशनी और अधिक जरूरी हो जाती है। समाचारों में अपराध, अविश्वास और टूटन की खबरें छाई रहती हैं, जिससे मन में निराशा घर करने लगती है। ऐसे में ये मौन दीए हमें यह सिखाते हैं कि समाज केवल बड़ी घटनाओं से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे सत्कर्मों से बनता है। एक मुस्कान, एक मदद का हाथ, एक सच्चा निर्णय ये सभी छोटी-छोटी लौ हैं, जो मिलकर बड़े उजाले का निर्माण करती हैं।

भारतीय परंपरा में दीये का महत्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि दार्शनिक भी है। दीपावली पर घर-घर दीये जलाने की परंपरा इस विश्वास से जुड़ी है कि बाहरी उजाले के साथ-साथ भीतर का अंधकार भी दूर हो। जब हम दीप जलाते हैं, तो अनजाने में ही अपने भीतर की उम्मीद, धैर्य और करुणा को भी प्रज्ज्वलित करते हैं। यही परंपरा आकाश में चमकते तारों से हमें जोड़ती है, मानो प्रकृति स्वयं हमें जीवन का संदेश दे रही हो।

नभ में जलते दीए हमें यह भी सिखाते हैं कि चमकने के लिए हमेशा केंद्र में होना जरूरी नहीं। कई तारे ऐसे होते हैं, जो दूर-दराज़, लगभग अदृश्य से होते हैं, फिर भी वे आकाश की सुंदरता को पूर्ण करते हैं। ठीक वैसे ही समाज में अनेक लोग होते हैं, जिनका योगदान भले ही दिखाई न दे, पर उनके बिना संतुलन संभव नहीं। उनका मौन श्रम ही समाज की नींव को मजबूत करता है।

 क्या हमारे भीतर भी कोई दीया जल रहा है? क्या हम अपनी छोटी-सी रोशनी से किसी और के जीवन का अंधेरा कम कर पा रहे हैं? यदि हां, तो हम भी इस विशाल आकाश का हिस्सा हैं, जहां हर सच्ची कोशिश एक नए दीये को जन्म देती है। नभ में जलते ये दीए हमें यही सिखाते हैं कि जीवन की सार्थकता उजाला फैलाने में है चाहे वह उजाला कितना ही छोटा क्यों न हो।

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