विनोद कुमार झा
भारत में खेलों को लंबे समय तक केवल मनोरंजन या सीमित उपलब्धियों के दायरे में देखा जाता रहा, लेकिन बीते साढ़े ग्यारह वर्षों में यह तस्वीर तेजी से बदली है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 72वीं सीनियर राष्ट्रीय वालीबॉल चैंपियनशिप के उद्घाटन अवसर पर दिए गए संबोधन ने स्पष्ट कर दिया कि आज खेल भारत के विकास एजेंडे का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। खेल अब सिर्फ मैदान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि राष्ट्र निर्माण, युवा सशक्तिकरण और वैश्विक पहचान का सशक्त माध्यम बन रहे हैं।
प्रधानमंत्री का यह कहना कि पिछले एक दशक में भारत ने 20 से अधिक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय खेल टूर्नामेंट आयोजित किए हैं, देश की बदली हुई सोच को दर्शाता है। फीफा अंडर-17 विश्व कप, हॉकी विश्व कप जैसे आयोजनों ने न केवल भारत की आयोजन क्षमता को विश्व मंच पर स्थापित किया, बल्कि युवाओं में खेलों के प्रति आत्मविश्वास भी बढ़ाया। 2030 के राष्ट्रमंडल खेलों और 2036 के ओलंपिक की मेजबानी की तैयारी की बात यह संकेत देती है कि भारत अब सिर्फ प्रतिभागी नहीं, बल्कि वैश्विक खेल नेतृत्व की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
प्रधानमंत्री द्वारा उल्लेखित ‘रिफॉर्म एक्सप्रेस’ की अवधारणा खेलों पर भी सटीक बैठती है। खेल इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार, योजनाओं का मिशन मोड में संचालन, खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रशिक्षण और पारदर्शी चयन प्रक्रिया—ये सभी सुधार एक नए खेल पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण कर रहे हैं। इसका सबसे बड़ा लाभ यह हुआ है कि आज अधिक से अधिक खिलाड़ियों को खेलने, निखरने और आगे बढ़ने के अवसर मिल रहे हैं।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का वक्तव्य इस परिवर्तन की जमीनी तस्वीर प्रस्तुत करता है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में खेलों को नई दृष्टि और संसाधन मिलना, यह दर्शाता है कि खेल अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहे। ग्राम पंचायत से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक प्रतियोगिताओं का विस्तार, आधुनिक स्टेडियमों का निर्माण और युवाओं में अनुशासन व टीम-स्पिरिट का विकास ये सभी पहल ‘न्यू स्पोर्ट्स कल्चर’ की पहचान हैं। परिणामस्वरूप, यूपी समेत देश के खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पहले से कहीं अधिक भागीदारी और सफलता हासिल कर रहे हैं।
आज खेल केवल पदक जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण, सामाजिक समरसता और राष्ट्र की सॉफ्ट पावर को मजबूत करने का साधन बन चुके हैं। फिट भारत, अनुशासित युवा और आत्मविश्वासी राष्ट्र की कल्पना खेलों के बिना अधूरी है। प्रधानमंत्री का ‘खेल शक्ति ही राष्ट्र शक्ति’ का संदेश इसी व्यापक दृष्टि को रेखांकित करता है।
आवश्यकता इस बात की है कि यह सुधार निरंतरता के साथ आगे बढ़ें, ताकि प्रतिभा को अवसर, अवसर को मंच और मंच को वैश्विक पहचान मिल सके। यदि यही दिशा बनी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत न केवल खेलों की मेजबानी करेगा, बल्कि खेल महाशक्ति के रूप में दुनिया के सामने खड़ा होगा।
