विनोद कुमार झा
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव तथा उनके परिवार के सदस्यों के खिलाफ ‘जमीन के बदले नौकरी’ मामले में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट द्वारा आरोप तय करने के निर्देश भारतीय राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए एक गंभीर और विचारणीय क्षण है। अदालत की यह टिप्पणी कि यह घोटाला एक “आपराधिक सिंडिकेट” की तरह संचालित किया गया, केवल किसी एक मामले की कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि सत्ता के दुरुपयोग, परिवारवाद और संस्थागत भ्रष्टाचार पर तीखा प्रहार है।
यह मामला उस दौर से जुड़ा है जब 2004 से 2009 के बीच लालू प्रसाद यादव केंद्र में रेल मंत्री थे। आरोप है कि रेलवे में ग्रुप-डी की नौकरियों के बदले उम्मीदवारों या उनके परिजनों से जमीन ली गई, जिसे बाद में लालू परिवार के सदस्यों के नाम या उनसे जुड़ी संस्थाओं को हस्तांतरित किया गया। भर्ती प्रक्रिया में न तो विज्ञापन जारी किए गए और न ही पारदर्शी चयन प्रक्रिया अपनाई गई। यहां तक कि ऐसे लोगों को भी नौकरी देने के आरोप हैं जो न्यूनतम योग्यता के मानकों पर खरे नहीं उतरते थे। यह सब प्रशासनिक तंत्र के सुनियोजित दुरुपयोग की ओर इशारा करता है।
अदालत द्वारा प्रथम दृष्टया साजिश, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आरोप तय करने का आदेश यह दर्शाता है कि जांच एजेंसियों द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों को न्यायालय ने गंभीर माना है। यह भी उल्लेखनीय है कि जहां एक ओर 52 आरोपियों को आरोपमुक्त किया गया जिनमें कई रेलवे अधिकारी शामिल हैं वहीं दूसरी ओर लालू प्रसाद, राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव, तेज प्रताप यादव, मीसा भारती सहित परिवार के अन्य सदस्यों पर आरोप तय किए जाने का रास्ता साफ हुआ है। इससे यह संकेत मिलता है कि अदालत ने विवेकपूर्ण ढंग से तथ्यों और भूमिकाओं का आकलन किया है।
राजनीतिक दृष्टि से यह मामला केवल एक परिवार या एक दल तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक संस्कृति पर सवाल उठाता है, जिसमें सत्ता को निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति पनपती रही है। वर्षों से भारतीय राजनीति में यह आरोप लगता रहा है कि सरकारी नौकरियां, ठेके और संसाधन सत्ता में बैठे लोगों के लिए लाभ कमाने का जरिया बन जाते हैं। ‘जमीन के बदले नौकरी’ मामला इस आरोप का एक ठोस उदाहरण बनकर उभरा है। वहीं, यह भी सच है कि लालू प्रसाद यादव और उनका दल इस पूरे मामले को राजनीतिक प्रतिशोध करार देते रहे हैं। भारतीय लोकतंत्र में जांच एजेंसियों की निष्पक्षता पर बहस कोई नई नहीं है। ऐसे में अंतिम सत्य न्यायिक प्रक्रिया के पूर्ण होने के बाद ही सामने आएगा। आरोप तय होना दोष सिद्धि नहीं है, लेकिन यह भी महज औपचारिकता नहीं मानी जा सकती। यह एक ऐसा चरण है जहां अब सबूतों की कसौटी पर आरोपों की वास्तविकता परखी जाएगी।
इस मामले का सामाजिक और नैतिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। बेरोजगारी से जूझ रहे युवाओं के सपनों के साथ कथित सौदेबाजी, सार्वजनिक विश्वास को गहरी चोट पहुंचाती है। सरकारी नौकरी को योग्यता और पारदर्शिता के बजाय निजी लाभ का साधन बनाना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। यदि ऐसे आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल कानूनी अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास के साथ विश्वासघात भी होगा। यह मामला भारतीय न्यायपालिका के लिए भी एक परीक्षा है कि क्या वह राजनीतिक दबावों से ऊपर उठकर निष्पक्ष और समयबद्ध न्याय दे पाती है। साथ ही, यह राजनीति में नैतिकता और जवाबदेही की बहस को एक बार फिर केंद्र में ले आया है। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि चाहे आरोपी कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, कानून के सामने सब बराबर हों। 29 जनवरी को होने वाली अगली सुनवाई केवल इस मामले की प्रक्रिया का अगला पड़ाव नहीं होगी, बल्कि यह संदेश भी देगी कि भारत का लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था सत्ता के दुरुपयोग पर कितनी सख्ती से अंकुश लगाने में सक्षम है। जनता की निगाहें अब इस पर टिकी हैं कि यह मामला राजनीति के शोर से ऊपर उठकर न्याय के निष्पक्ष रास्ते पर कैसे आगे बढ़ता है।
