प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा भगवान बुद्ध के पवित्र पिपरहवा अवशेषों की अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर दिया गया वक्तव्य केवल एक औपचारिक भाषण नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत चेतना और वैश्विक दायित्व का सशक्त उद्घोष है। यह वक्तव्य उस ऐतिहासिक अन्याय की भी याद दिलाता है, जिसमें औपनिवेशिक काल के दौरान भारत की अमूल्य धरोहरें देश से बाहर ले जाई गईं, और उस आत्मविश्वास का भी प्रतीक है, जिसके बल पर आज भारत अपनी विरासत को पुनः सम्मानपूर्वक वापस ला रहा है।
भगवान बुद्ध का ज्ञान किसी एक देश, जाति या संप्रदाय तक सीमित नहीं है। करुणा, अहिंसा, मध्यम मार्ग और मानव कल्याण का उनका संदेश पूरी मानवता के लिए है। प्रधानमंत्री का यह कथन कि “बुद्ध सभी के हैं और सभी को जोड़ते हैं”, आज के विखंडित और संघर्षग्रस्त विश्व में अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है। जब दुनिया वैचारिक ध्रुवीकरण, युद्ध और असहिष्णुता से जूझ रही है, तब बुद्ध का मार्ग संवाद, शांति और सह-अस्तित्व का रास्ता दिखाता है।
पिपरहवा अवशेषों का महत्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक भी है। 1898 में कपिलवस्तु क्षेत्र में हुई खुदाई में मिले ये अवशेष बौद्ध धर्म के आरंभिक काल के ठोस पुरातात्विक साक्ष्य हैं। ब्रिटिश काल में इनका भारत से बाहर जाना औपनिवेशिक मानसिकता का उदाहरण था, जहाँ इन्हें आस्था की वस्तु नहीं, बल्कि ‘एंटीक’ समझा गया। 125 वर्षों बाद इनका भारत लौटना इस बात का प्रतीक है कि अब भारत अपनी विरासत को लेकर सजग, सक्षम और संकल्पबद्ध है।
इन अवशेषों की वैश्विक यात्रा और विभिन्न देशों में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ यह दर्शाती है कि बुद्ध का प्रभाव सीमाओं से परे है। थाईलैंड, मंगोलिया, रूस जैसे देशों में लाखों लोगों का दर्शन के लिए उमड़ना भारत की उस ‘सॉफ्ट पावर’ को रेखांकित करता है, जो हथियारों या दबाव से नहीं, बल्कि संस्कृति और मूल्यों से विश्व को जोड़ती है। भारतीय प्रतिनिधियों को छूने की श्रद्धा यह संकेत देती है कि भारत को आज भी बुद्ध की भूमि के रूप में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। प्रधानमंत्री द्वारा गोदरेज समूह के योगदान को रेखांकित करना यह भी दर्शाता है कि राष्ट्रीय विरासत की रक्षा में निजी क्षेत्र की सकारात्मक भूमिका कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है। यह साझेदारी भविष्य में अन्य बिखरी हुई भारतीय धरोहरों की वापसी का मार्ग भी प्रशस्त कर सकती है। अंततः, बुद्ध के अवशेषों की वापसी केवल अतीत की क्षतिपूर्ति नहीं, बल्कि भविष्य की जिम्मेदारी भी है। यह भारत से अपेक्षा करता है कि वह बुद्ध के संदेश को केवल प्रदर्शनी तक सीमित न रखे, बल्कि अपने आचरण, नीतियों और वैश्विक भूमिका में भी उसे उतारे। यदि भारत सचमुच बुद्ध की भूमि है, तो उसे शांति, करुणा और मानवता का प्रकाशस्तंभ बनकर विश्व का मार्गदर्शन करना होगा। यही इस ऐतिहासिक घटना का वास्तविक अर्थ और उद्देश्य है।
- संपादक
