विनोद कुमार झा
केंद्र सरकार द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ को एआई टूल ‘ग्रोक’ के दुरुपयोग को लेकर जारी किया गया नोटिस डिजिटल युग में जवाबदेही की एक गंभीर याद दिलाता है। यह मामला केवल किसी एक प्लेटफॉर्म या एक एआई टूल तक सीमित नहीं है, बल्कि उस व्यापक चुनौती को उजागर करता है, जिसमें तकनीक की तेज़ रफ्तार के साथ कानून, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी तालमेल नहीं बिठा पा रहे हैं।
सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने अश्लील, आपत्तिजनक और गैरकानूनी फोटो-वीडियो के प्रसार पर कड़ी आपत्ति जताते हुए स्पष्ट किया है कि यह आईटी अधिनियम, 2000 और आईटी नियम-2021 का सीधा उल्लंघन है। नियमों के अनुसार, किसी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अवैध सामग्री की पहचान होते ही त्वरित कार्रवाई करना उसकी कानूनी जिम्मेदारी है। सरकार का आरोप है कि ‘एक्स’ इस दायित्व को निभाने में विफल रहा, जिसके कारण आपत्तिजनक कंटेंट का निर्माण और प्रसार हुआ।
सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव का यह बयान कि सोशल मीडिया कंपनियों को प्रकाशित सामग्री की जिम्मेदारी लेनी चाहिए, बेहद महत्वपूर्ण है। लंबे समय से यह बहस चल रही है कि क्या प्लेटफॉर्म केवल ‘माध्यम’ हैं या वे कंटेंट के ‘संपादक’ की भूमिका भी निभाते हैं। स्थायी समिति द्वारा कड़े कानून और स्पष्ट उत्तरदायित्व तय करने की सिफारिशें इस बात का संकेत हैं कि सरकार अब इस धुंधले क्षेत्र को स्पष्ट करना चाहती है। शिवसेना (यूबीटी) की राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी द्वारा इस मुद्दे पर हस्तक्षेप की मांग बताती है कि यह केवल तकनीकी या प्रशासनिक प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक चिंता का विषय भी बन चुका है। एआई के माध्यम से यदि अश्लील और गैरकानूनी सामग्री आसानी से तैयार होने लगे, तो उसका असर समाज के सबसे संवेदनशील वर्गों पर पड़ता है।
सरकार द्वारा ग्रोक एआई की तकनीकी और सुरक्षा व्यवस्था की तत्काल समीक्षा के निर्देश, 72 घंटे के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट सौंपने की समयसीमा और कानूनी संरक्षण समाप्त करने की चेतावनी यह दर्शाती है कि अब नरमी की गुंजाइश नहीं छोड़ी गई है। स्वयं ग्रोक द्वारा सार्वजनिक रूप से सुरक्षा चूक स्वीकार करना भी यह प्रमाणित करता है कि एआई सिस्टम अभी पूरी तरह सुरक्षित और उत्तरदायी नहीं हैं। यह प्रकरण एक स्पष्ट संदेश देता है तकनीक का विकास कानून और नैतिकता से ऊपर नहीं हो सकता। एआई और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को नवाचार के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारी निभानी ही होगी। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर समाज को मिलने वाली क्षति कहीं अधिक गहरी और स्थायी हो सकती है।
- संपादक
