- आकाश बड़ा है, परिंदे छोटे; खुशी का आसमान आकार से नहीं, उड़ान से बनता है
लेखक: विनोद कुमार झा
सुबह की धूप जब नीम की पत्तियों पर ठिठकती है, तब आकाश में पहली तान गूँजती है। यह तान किसी एक परिंदे की नहीं होती, यह सामूहिक राग होता है, जिसमें चिड़ियों की फुदकन, गौरैयों की चहचहाहट और कबूतरों की मंथर उड़ान मिलकर दिन का स्वागत करती है। जैसे ही शहर की नींद टूटती है, परिंदों की अठखेलियां शुरू हो जाती हैं, कभी तारों पर झूला, कभी छज्जों पर दौड़, कभी हवा में कलाबाज़ी।
गांव के पुराने पीपल के नीचे हर सुबह एक छोटा-सा मेला लगता है। शाखाओं पर बैठे बुलबुल, मैना और तोते आपस में बतियाते हैं। कोई पंख संवारता है, कोई धूप सेंकता है, तो कोई बच्चों की तरह आँख-मिचौली खेलता है। हवा के झोंकों के साथ वे ऐसे तैरते हैं मानो नीला आकाश उनका खेल का मैदान हो। पास की नाली के किनारे बैठी गौरैया पानी में चोंच डुबोकर छलकाती है, और उसकी छींटें सूरज की किरणों में चमक उठती हैं जैसे काँच के टुकड़े नहीं, बल्कि हँसी के कण हों।
इसी पीपल के नीचे, रोज़ की तरह, बूढ़े मास्टरजी अपनी लकड़ी की बेंच पर बैठते हैं। रिटायरमेंट के बाद उनके दिन किताबों और परिंदों में बँट गए हैं। वे कहते हैं, “इनकी अठखेलियों में जीवन का पाठ छुपा है।” कभी कोई चिड़िया अचानक उड़ भरती है तो वे मुस्कराकर कहते हैं, “डर को ऐसे ही पछाड़ना चाहिए।” कभी दो परिंदे आपस में दाना बाँटते दिखते हैं तो उनका चेहरा और मुलायम हो जाता, “साझा करने से ही आकाश बड़ा लगता है।”
दोपहर के वक्त जब धूप तीखी होती है, तब परिंदों का खेल और शरारती हो उठता है। छतों पर सूखती चादरों के बीच से वे तीर की तरह निकलते हैं, कपड़ों को छूकर हवा में गोते लगाते हैं। बच्चे तालियाँ बजाते हैं, और परिंदे मानो चुनौती स्वीकार कर लेते हैं एक के बाद एक कलाबाज़ियाँ। किसी-किसी दिन अचानक बारिश आ जाती है। तब आकाश में परिंदों की टोली बादलों के साथ लुकाछिपी खेलती है। बूंदों के बीच उड़ते पंखों पर जब पानी के मोती टिकते हैं, तो लगता है जैसे इंद्रधनुष ने अपनी छोटी-छोटी कड़ियाँ परिंदों को दे दी हों।
शाम ढलते-ढलते अठखेलियों का रंग बदल जाता है। अब यह शोर-शराबा नहीं, बल्कि तालमेल का खेल होता है। दूर-दूर से लौटते झुंड एक लय में उड़ते हैं, कोई आगे, कोई पीछे, कोई ऊपर, कोई नीचे। बिजली के तारों पर बैठते ही फिर से चहचहाहट शुरू दिन भर के किस्से, हवा की खबरें, नए दानों की खोज। मास्टरजी अक्सर कहते हैं, “देखो, ये कभी अकेले नहीं लौटते। थकान भी साझा होती है।”
पर हर खेल में खतरे भी होते हैं। कभी-कभी पतंगों की डोरें हवा में फँस जाती हैं। एक दिन एक नन्ही चिड़िया की उड़ान अचानक रुक गई। बच्चे दौड़े, मास्टरजी उठे, और सावधानी से डोर काटकर उसे आज़ाद किया गया। चिड़िया ने जैसे धन्यवाद में पंख फड़फड़ाए और आकाश की ओर उड़ गई। उस दिन परिंदों की अठखेलियां थोड़ी देर थमी रहीं, मानो सबने राहत की साँस ली हो। फिर, धीरे-धीरे, चहचहाहट लौट आई।
रात के करीब आते ही आकाश का रंग गाढ़ा हो जाता है। पेड़ों पर बसेरों की तैयारी शुरू हो जाती है। आख़िरी खेल होता है, चाँद के साथ। कुछ परिंदे चाँद के सामने से उड़ते हैं, उनकी परछाइयाँ सफ़ेद गोलाई पर नाचती हैं। यह खेल बहुत छोटा होता है, पर सबसे सुंदर। जैसे दिन भर की शरारतों का सलीके से समापन।
परिंदों की अठखेलियां केवल उनका खेल नहीं, यह मनुष्य के लिए भी संदेश हैं। उड़ना सीखने का साहस, गिरकर फिर उठने की जिद, साथ चलने की समझ और प्रकृति से दोस्ती का पाठ। मास्टरजी जब घर लौटते हैं, तो उनके कदम हल्के होते हैं। वे जानते हैं, अगले दिन फिर वही खेल होगा, नई धूप, नई हवा, नई अठखेलियां।
और हम? अगर कभी सुबह की तान सुनकर ठिठक जाएँ, छज्जों पर उड़ती परछाइयों को देखकर मुस्करा दें, तो समझिए, हम भी उस खेल का हिस्सा बन गए हैं। आकाश बड़ा है, परिंदे छोटे; फिर भी उनकी अठखेलियां हमें बताती हैं कि खुशी का आसमान आकार से नहीं, उड़ान से बनता है।
