विनोद कुमार झा
संतान सप्तमी व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को किया जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से संतान की प्राप्ति, संतान की दीर्घायु और उनके उत्तम स्वास्थ्य के लिए किया जाता है। इस व्रत का महत्व स्कन्द पुराण एवं अन्य धर्म ग्रंथों में वर्णित है। इसे विशेष रूप से वे महिलाएँ करती हैं जो संतान की कामना करती हैं या अपने बच्चों के जीवन में सुख-समृद्धि चाहती हैं। इस दिन भगवान सूर्य, भगवान शिव, माता गौरी और संतान गोपाल की विशेष पूजा का विधान है।
व्रत की विधि इस प्रकार है :- प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें। एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर भगवान सूर्य, भगवान शिव-पार्वती और संतान गोपाल की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। कलश स्थापना करें, उसमें जल, आम्रपल्लव, सुपारी, रोली, अक्षत डालें। गंध, अक्षत, फूल, लाल चंदन, लाल वस्त्र, पुष्प, फल और नैवेद्य से पूजन करें।
सप्तमी तिथि का व्रत संतान की लंबी आयु, सुखी जीवन और निरोगी काया के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है।
व्रत का संकल्प लें :“मैं आज संतान सप्तमी व्रत का संकल्प करती हूँ। हे संतान दायिनी माता! हे भगवान सूर्य, शिव-पार्वती! मेरी संतान की रक्षा करें और मुझे सुखद संतान प्रदान करें।
व्रत के मंत्र इस प्रकार है : सूर्य मंत्र : ॐ घृणिः सूर्याय नमः। इस मंत्र का 7 या 21 बार जप करें और सूर्य को अर्घ्य दें।संतान गोपाल मंत्र : ॐ श्रीकृष्णाय गोपालाय नमः का जाप करें। शिव-पार्वती मंत्र : ॐ नमः शिवाय का 108 बार जप करने से अत्यधिक फल मिलता है। संतान सप्तमी व्रत कथा का श्रवण और पाठ करना अनिवार्य है।
पूजन सामग्री : कलश, गंगाजल, रोली, हल्दी, चावल (अक्षत), लाल कपड़ा, वस्त्र, सुपारी, नारियल, पुष्प (विशेषकर लाल फूल), बेलपत्र, दूर्वा, पांच या सात प्रकार के फल, नैवेद्य (मिठाई, पूड़ी, खीर),दीपक, घी या तिल का तेल का होना चाहिए। संतान गोपाल की प्रतिमा या चित्र, भगवान शिव-पार्वती और सूर्य भगवान का चित्र रखें। जल से भरा कलश (ऊपर आम्रपल्लव और नारियल रखें)।
संतान सप्तमी व्रत कथा : प्राचीन समय में अवंति नगरी नामक एक नगर था। वहाँ एक ब्राह्मण दंपति रहते थे। दोनों अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति के थे, लेकिन उनके संतान नहीं थी। पति-पत्नी दोनों संतान प्राप्ति के लिए बहुत चिंतित रहते और विभिन्न देवी-देवताओं की आराधना करते थे। वर्षों तक तप करने के बाद भी संतान सुख न मिलने पर वे अत्यंत दुखी हुए। एक दिन ब्राह्मण ने अपनी पत्नी से कहा –
"देवी! हमसे कौन सा पाप हुआ है जिसके कारण हमें संतान का सुख नहीं मिल पा रहा है?"
पत्नी ने कहा , "स्वामी! हमें अवश्य कोई ऐसा व्रत करना चाहिए जिससे हमें संतान प्राप्ति हो।"
इसी बीच एक दिन ब्राह्मण जंगल में ईंधन लेने गया। वहाँ उसने देखा कि कुछ महिलाएँ नदी किनारे व्रत कर रही हैं। वे महिलाएँ नदी में स्नान कर भगवान सूर्य और माता गौरी की पूजा कर रही थीं और कह रही थीं , "हे संतान दायिनी माता! हे शिव! हे पार्वती! हमें उत्तम संतान का सुख प्रदान करें।"
ब्राह्मण ने उनसे पूछा, "बहनों! आप कौन सा व्रत कर रही हैं और इसका क्या फल है?"
तब महिलाओं ने कहा ,"हम संतान सप्तमी का व्रत कर रही हैं। यह व्रत करने से संतानहीन को संतान प्राप्त होती है और संतानवान की संतान लंबी आयु और निरोगी होती है।"
ब्राह्मण यह सुनकर प्रसन्न हुआ और घर जाकर अपनी पत्नी को यह सब बताया। दोनों ने निश्चय किया कि वे भी भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को यह व्रत करेंगे।
निर्धारित तिथि पर दोनों ने प्रातःकाल स्नान किया, पवित्र होकर भगवान सूर्य, भगवान शिव-पार्वती और संतान गोपाल की पूजा की। व्रत का नियमपूर्वक पालन किया, कथा सुनी और दान-दक्षिणा दी। इस व्रत के प्रभाव से कुछ ही समय में ब्राह्मणी गर्भवती हुई और समय आने पर उसने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया।
उस दिन से यह व्रत लोक में प्रसिद्ध हो गया। जो भी नारी श्रद्धापूर्वक संतान सप्तमी का व्रत करती है, उसे सुंदर, योग्य और आज्ञाकारी संतान की प्राप्ति होती है। यदि संतान पहले से हो तो वह दीर्घायु, निरोगी और यशस्वी होता है।
व्रत का पारण: व्रत का पारण अगले दिन अष्टमी को करें।ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को भोजन कराएं, वस्त्र और दक्षिणा दें।स्वयं भोजन करके व्रत पूर्ण करें।
व्रत का विशेष महत्व : यह व्रत केवल संतान की प्राप्ति के लिए ही नहीं, बल्कि संतान की रक्षा, स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। जो महिलाएँ यह व्रत करती हैं, उनके घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है।