राधा अष्टमी: भक्ति और प्रेम का दिव्य उत्सव

लेखक: विनोद कुमार झा

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधा अष्टमी का पर्व मनाया जाता है। यह दिन श्रीकृष्ण की परम प्रिय राधा रानी के जन्मोत्सव के रूप में पूरे भारतवर्ष में उल्लास और श्रद्धा से मनाया जाता है। श्रीमद्भागवत और पद्म पुराण के अनुसार राधा रानी को भक्ति की देवी माना गया है। उनका नाम स्मरण करने से मनुष्य के जीवन से पापों का नाश होता है और प्रेम, सौभाग्य तथा सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस वर्ष राधा अष्टमी का पावन पर्व 31 अगस्त 2025, रविवार  को मनाया जाएगा। मान्यता है कि इस दिन प्रातःकाल से दोपहर तक राधा रानी की पूजा करना विशेष फलदायी होता है।

राधा रानी का नाम कृष्ण भक्ति का पर्याय है। श्रीकृष्ण की पूजा राधा जी के बिना अधूरी मानी जाती है। शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि राधा केवल एक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि भक्ति और प्रेम की सर्वोच्च भावना हैं। इस दिन व्रत और पूजन करने से दांपत्य जीवन में प्रेम और सौहार्द बना रहता है।

 शास्त्रों में वर्णित कथा के अनुसार, व्रजभूमि के रावल गांव में वृषभानु गोप और उनकी पत्नी कीर्ति देवी को पुत्री राधा के रूप में परम सौभाग्य प्राप्त हुआ। जब राधा जी का जन्म हुआ, तब समस्त व्रजभूमि में आनंद की लहर दौड़ गई। जन्म के समय राधा का रूप अत्यंत अलौकिक और दिव्य था। किंतु विशेष बात यह थी कि राधा जी की आंखें जन्म के समय बंद थीं। सभी ने अनेक प्रयास किए, परंतु उन्होंने नेत्र नहीं खोले।

जब यह बात व्रज में फैल गई, तो वृषभानु जी को चिंता हुई। तभी नारद मुनि वहां आए और उन्होंने कहा  "हे वृषभानु! चिंता मत करो, यह बालिका कोई साधारण कन्या नहीं, यह स्वयं शक्ति स्वरूपा है। यह तभी नेत्र खोलेगी जब इसका प्रथम दर्शन श्रीकृष्ण करेंगे।" कुछ समय बाद नंद बाबा अपने बालक कृष्ण के साथ वृषभानु के घर आए। जैसे ही कृष्ण राधा के समीप आए और बाल रूप में हंसते हुए उनके पास खड़े हुए, राधा जी ने पहली बार अपनी नेत्रों को खोला। उनके प्रथम दर्शन श्रीकृष्ण के चरणों का हुआ। उसी क्षण से राधा और कृष्ण के प्रेम की अनोखी गाथा आरंभ हुई। यह प्रेम केवल लौकिक या सांसारिक नहीं था, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक था।

राधा जी का स्वरूप अत्यंत मोहक और अनुपम बताया गया है। वे कृपा और माधुर्य की साक्षात देवी हैं। राधा का नाम आते ही भक्ति का रस बहने लगता है। श्रीकृष्ण भी कहते हैं कि "मैं राधा के बिना अधूरा हूं।"राधा का प्रेम निस्वार्थ और शुद्ध है। उनके हृदय में केवल श्रीकृष्ण का वास था। यही कारण है कि राधा और कृष्ण को अलग नहीं किया जा सकता।

राधा अष्टमी केवल राधा जी का जन्मोत्सव नहीं है, बल्कि यह हमें प्रेम और भक्ति के सर्वोच्च रूप का स्मरण कराता है। यह बताता है कि सच्चा प्रेम किसी स्वार्थ के लिए नहीं होता, बल्कि वह आत्मा को परमात्मा से जोड़ने वाला सेतु है। राधा-कृष्ण का मिलन भक्ति और प्रेम की चरम सीमा का प्रतीक है।

इस दिन भक्तजन राधा जी की प्रतिमा या चित्र का विधिपूर्वक पूजन करते हैं। राधा नाम का जाप और श्रीकृष्ण के संग उनका स्मरण करने से मन को शांति और भक्ति की गहराई मिलती है। ऐसा कहा जाता है कि जो भी राधा अष्टमी के दिन उनका पूजन करता है, उसे श्रीकृष्ण की कृपा अवश्य प्राप्त होती है।

व्रत और पूजन विधि : राधा अष्टमी पर प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। राधा-कृष्ण की प्रतिमा को गंगा जल से स्नान कराएं और 16 श्रृंगार से सजाएं। गुलाबी या पीले फूल, तुलसीदल और पंचामृत का विशेष महत्व है। भक्तजन दिनभर उपवास रखते हैं और “राधे-राधे” नाम का जाप करते हैं। संध्या समय भजन-कीर्तन का आयोजन होता है।

ब्रजभूमि में इस दिन का उत्सव विशेष होता है। मथुरा, वृंदावन और बरसाना में भव्य मेले, रासलीला और झूलन उत्सव का आयोजन किया जाता है। हजारों भक्त राधा-कृष्ण के दर्शन के लिए उमड़ते हैं।

राधा अष्टमी का पर्व हमें यह सिखाता है कि सच्चा प्रेम त्याग, श्रद्धा और समर्पण से ही पूर्ण होता है। राधा रानी का स्मरण करने से मन में भक्ति जागृत होती है और जीवन में सकारात्मकता का संचार होता है।

राधे-राधे नाम का स्मरण ही जीवन को मधुर और पवित्र बना देता है।”

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