-जवानी निरर्थक नहीं, सार्थक करें
विनोद कुमार झा
शहर के उस पुराने मोहल्ले में शाम होते ही चौराहे पर युवाओं की भीड़ लग जाती थी। किसी के हाथ में मोबाइल था, किसी के कान में ईयरफोन और किसी की जुबान पर दुनिया बदल देने वाली बातें। लेकिन दुनिया बदलने के लिए उठने वाला हाथ किसी का नहीं था।
चौराहे के सामने एक विशाल पीपल का पेड़ था। गर्मी हो, सर्दी हो या बरसात उसकी शाखाओं पर हजारों पत्ते हवा के झोंकों के साथ झूलते रहते। हवा जिधर चलती, पत्ते उधर ही हिलने लगते।
एक दिन मोहल्ले के बुजुर्ग मास्टर दीनानाथ ने चौराहे पर बैठे युवाओं को देखते हुए कहा, “तुम लोग भी इन पत्तों जैसे हो गए हो।” युवाओं में से रोहन ने हंसते हुए पूछा, “मास्टर जी, हम पत्ते कैसे हो गए?”
मास्टर जी ने पीपल की ओर इशारा किया। “हवा चलती है तो पत्ते झूमते हैं। हवा रुकती है तो पत्ते शांत हो जाते हैं। उनका अपना कोई रास्ता नहीं होता। जिस दिशा में झोंका ले जाए, वे उसी दिशा में बहते हैं। आज तुम्हारी जवानी भी कुछ ऐसी ही हो गई है।” रोहन मुस्कुराया, “लेकिन हम तो आजाद हैं।”
मास्टर जी ने गंभीर होकर कहा, “आजादी और दिशाहीनता में बहुत बड़ा अंतर होता है, बेटा। आजादी वह है जिसमें इंसान अपना रास्ता खुद चुनता है। दिशाहीनता वह है जिसमें दूसरे तय करते हैं कि तुम्हें किस दिशा में जाना है।”
चौराहे पर कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया। सपनों से भरी आंखें, लेकिन लक्ष्य गायब। रोहन पढ़ा-लिखा युवक था। कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर चुका था। उसके अंदर प्रतिभा थी, ऊर्जा थी और बड़े-बड़े सपने भी थे। लेकिन एक समस्या थी वह सपनों को लक्ष्य में बदलना नहीं जानता था।
सुबह देर तक सोना, दिनभर मोबाइल चलाना, सोशल मीडिया पर बहस करना, दोस्तों के साथ चौराहे पर बैठना और शाम को यह शिकायत करना कि “देश में युवाओं के लिए अवसर ही नहीं हैं” उसकी दिनचर्या बन चुकी थी।
उसका मित्र अमित भी कुछ अलग नहीं था। एक दिन अमित ने कहा, “यार, जिंदगी में कुछ बड़ा करना है। ”रोहन ने पूछा, “तो कर क्यों नहीं रहे?”
अमित ने हंसते हुए जवाब दिया, “अभी उम्र ही क्या हुई है? पहले थोड़ा मजा कर लेते हैं। काम तो पूरी जिंदगी करना ही है।” पास बैठे मास्टर दीनानाथ ने उनकी बात सुन ली।
उन्होंने कहा, “यही तो सबसे बड़ा भ्रम है। जवानी को लोग जीवन की तैयारी समझकर गंवा देते हैं, जबकि जवानी ही जीवन को बनाने का सबसे बड़ा अवसर होती है।” अमित ने कहा, “मास्टर जी, अभी बहुत समय है।”
मास्टर जी बोले, “समय कभी खत्म होने की सूचना देकर नहीं जाता।” यह बात रोहन के मन में कहीं गहरे उतर गई।
कुछ ही दिनों बाद मोहल्ले में एक घटना हुई। मोहल्ले के पास रहने वाले रिक्शाचालक रामू की बेटी सुनीता पढ़ाई में बहुत अच्छी थी। आर्थिक स्थिति कमजोर थी, लेकिन उसकी आंखों में डॉक्टर बनने का सपना था।
एक दिन सुनीता स्कूल से लौट रही थी। रास्ते में उसकी किताबें गिर गईं। रोहन वहां से गुजर रहा था। उसने किताबें उठाकर उसे दीं। किताबों पर लिखा था “जीव विज्ञान”, “रसायन विज्ञान” और “भौतिक विज्ञान।” रोहन ने पूछा, “इतनी मेहनत क्यों करती हो?” सुनीता ने मुस्कुराकर कहा, “क्योंकि मैं अपने पिता की जिंदगी बदलना चाहती हूं।” रोहन चुप हो गया।
सुनीता ने आगे कहा, “भैया, मेरे पास सुविधाएं कम हैं, लेकिन समय मेरे पास उतना ही है जितना बड़े घर के बच्चों के पास। इसलिए मैं समय को बर्बाद नहीं करना चाहती।”
यह सुनकर रोहन के पास कोई जवाब नहीं था। उसे पहली बार लगा कि जिसे वह ‘समय काटना’ समझ रहा था, कोई दूसरा उसी समय से अपना भविष्य बना रहा है।
अगली सुबह रोहन अकेला पीपल के पेड़ के नीचे बैठा था। हवा चल रही थी। पत्ते झूम रहे थे।
उसने सोचा, “क्या मैं भी ऐसा ही हूं? जिस दिन सोशल मीडिया में कोई नया मुद्दा आया, उसी पर बहस। जिस दोस्त ने कोई नया शौक शुरू किया, उसी के पीछे चल पड़ा। कोई कुछ कहता है तो मैं दिशा बदल देता हूं।”
उसी समय मास्टर दीनानाथ वहां आ गए। उन्होंने पूछा, “क्या सोच रहे हो?” रोहन ने कहा, “मास्टर जी, मुझे लगता है कि मैं भी हवा के झोंके में झूलते पत्ते जैसा हो गया हूं।”
मास्टर जी मुस्कुराए और बोले, “यह समझ जाना ही बदलाव की पहली सीढ़ी है।” रोहन ने पूछा, “लेकिन पत्ता पेड़ से जुड़ा रहता है। क्या वह भी बेकार है?”
मास्टर जी बोले, “नहीं। पत्ता बेकार नहीं होता। वह पेड़ के लिए भोजन बनाता है, हवा को शुद्ध करता है, छाया देता है। समस्या पत्ता होने में नहीं, अपनी भूमिका भूल जाने में है।”
फिर उन्होंने कहा, “युवा होना भी एक जिम्मेदारी है। जवानी केवल ताकत का नाम नहीं है। यह विचार, साहस, श्रम और निर्माण की उम्र है।”
उस दिन रोहन ने अपने जीवन में एक छोटा-सा बदलाव करने का निर्णय लिया। उसने कोई बड़ा भाषण नहीं दिया। कोई घोषणा नहीं की।
बस अपनी डायरी में लिखा, “मैं अपनी जवानी को शिकायतों में नहीं, प्रयासों में खर्च करूंगा।” उसने सुबह उठना शुरू किया।
हर दिन कुछ घंटे प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में लगाने लगा। साथ ही उसने अपने मोहल्ले के बच्चों को शाम को पढ़ाना शुरू किया। पहले दिन केवल दो बच्चे आए। दूसरे दिन तीन। एक सप्ताह बाद सात। एक महीने में बच्चों की संख्या बीस हो गई।
मोहल्ले के लोगों ने पूछना शुरू किया, “रोहन, तुम्हें इससे क्या मिलेगा?”
रोहन मुस्कुराकर कहता, “शायद पैसा नहीं, लेकिन किसी बच्चे का भविष्य मिल जाए तो उससे बड़ी कमाई क्या होगी?” लेकिन बदलाव की राह आसान नहीं थी।
अमित ने उसे चिढ़ाते हुए कहा, “तू तो मास्टर बन गया!” दूसरे दोस्तों ने कहा, “जिंदगी का मजा लेना छोड़ दिया क्या?”
रोहन ने जवाब दिया, “मजा मैं भी ले रहा हूं, बस अब मुझे अपने कल की कीमत पर आज का मजा नहीं चाहिए।” कुछ दोस्तों ने उसका मजाक उड़ाया। कुछ उससे दूर हो गए। लेकिन धीरे-धीरे उसकी मेहनत दिखाई देने लगी।
जिस मोहल्ले में शाम को युवा केवल चौराहे पर बैठकर बहस करते थे, उसी मोहल्ले में अब कुछ बच्चे पढ़ने लगे थे, कुछ युवाओं ने पुस्तकालय शुरू किया और कुछ ने रोजगार के लिए प्रशिक्षण लेना शुरू किया।
एक व्यक्ति का बदला हुआ जीवन धीरे-धीरे कई लोगों की दिशा बदल रहा था। एक साल बाद प्रतियोगी परीक्षा का परिणाम आया। रोहन का चयन नहीं हुआ। उसका मन टूट गया।
उसने सोचा, “शायद मास्टर जी गलत कहते थे। मेहनत करने से हमेशा सफलता नहीं मिलती।” वह फिर उसी पीपल के पेड़ के नीचे जा बैठा। कुछ देर बाद मास्टर दीनानाथ आए।
उन्होंने पूछा, “क्या हुआ?” रोहन ने कहा, “मैं हार गया।” मास्टर जी ने पीपल के पत्तों की ओर देखा और बोले, “पत्ते गिरते हैं तो पेड़ हार जाता है क्या?”
रोहन चुप रहा। “ऋतु बदलती है, पत्ते झड़ते हैं। फिर नए पत्ते आते हैं। जीवन में असफलता भी ऐसी ही होती है। वह अंत नहीं, अगली शुरुआत की तैयारी होती है।”
रोहन ने पूछा, “तो मुझे फिर कोशिश करनी चाहिए?”
मास्टर जी बोले, “अगर सपना तुम्हारा है, तो कोशिश भी तुम्हारी होनी चाहिए। दूसरों की तालियों के लिए नहीं, अपने भीतर की आवाज के लिए।”
समय बीतता गया। रोहन ने परीक्षा की तैयारी जारी रखी। साथ ही उसने बच्चों को पढ़ाना नहीं छोड़ा। तीसरे प्रयास में उसका चयन हो गया। मोहल्ले में खुशी की लहर दौड़ गई। लेकिन सबसे ज्यादा खुश सुनीता थी। वह अब मेडिकल कॉलेज में पढ़ रही थी।
उसने रोहन से कहा, “भैया, आपने मुझे किताबें उठाकर दी थीं। उस दिन आपने सिर्फ मेरी किताबें नहीं उठाईं थीं, मेरा आत्मविश्वास भी उठाया था।” रोहन की आंखें नम हो गईं।
उसने कहा, “नहीं सुनीता, तुम्हारी मेहनत ने तुम्हें यहां तक पहुंचाया है।” उसी शाम रोहन फिर पीपल के पेड़ के नीचे गया।हवा चल रही थी। पत्ते फिर झूम रहे थे। लेकिन इस बार उसे वे पत्ते दिशाहीन नहीं लगे।
उसे लगा हर पत्ता अपनी जगह रहकर भी पेड़ के जीवन में योगदान दे रहा है। तभी उसे मास्टर दीनानाथ की बात याद आई , “जवानी हवा में उड़ने के लिए नहीं, जीवन को दिशा देने के लिए मिली है।”
युवावस्था जीवन का वह पड़ाव है जिसमें शरीर में ऊर्जा होती है, मन में सपने होते हैं और भविष्य को बदलने की क्षमता होती है। लेकिन यही ऊर्जा यदि दिशा के बिना बहने लगे तो मनुष्य सचमुच हवा के झोंके में झूलते पत्ते की तरह हो जाता है।
आज युवाओं के सामने चुनौतियां बहुत हैं प्रतिस्पर्धा, बेरोजगारी, मानसिक दबाव, सोशल मीडिया का आकर्षण, दिखावे की संस्कृति और तुरंत सफलता पाने की बेचैनी। इन सबके बीच सबसे जरूरी है दिशा।
हर युवा के पास संसाधन समान नहीं हो सकते, लेकिन समय सबके पास 24 घंटे ही है। कोई इन्हीं घंटों में शिकायत लिखता है और कोई भविष्य। कोई दूसरों की सफलता गिनता है और कोई अपनी असफलताओं से सीखता है। कोई भीड़ का हिस्सा बन जाता है और कोई भीड़ से अलग अपनी राह बना लेता है।इसलिए सवाल यह नहीं कि हमारे पास कितना है।
सवाल यह है कि जो हमारे पास है, उसका हम कितना सार्थक उपयोग करते हैं। जवानी को केवल उम्र मत समझिए। जवानी एक अवसर है। जवानी एक जिम्मेदारी है। जवानी एक संकल्प है।
और सबसे बढ़कर, जवानी वह शक्ति है, जिससे व्यक्ति अपना जीवन ही नहीं, समाज और देश का भविष्य भी बदल सकता है। हवा के झोंके आते-जाते रहेंगे। पत्ते झूलते रहेंगे।पर इंसान को पत्ते की तरह केवल झूलना नहीं है। उसे जड़ की तरह मजबूत होना है, पेड़ की तरह खड़ा होना है और फल की तरह दूसरों के काम आना है।
जवानी निरर्थक न जाए इसे सार्थक करें।
