आखिर समझाऊं किसे?

 -रिश्तों के बदलते अर्थ और मनुष्य के भीतर बढ़ती खामोशी

विनोद कुमार झा 

समझाऊं किसे?” यह केवल तीन शब्द नहीं हैं। यह उस व्यक्ति की पूरी मनःस्थिति है, जो बहुत कुछ कहना चाहता है, लेकिन उसे सुनने वाला कोई नहीं मिलता। यह उस पिता की आंखों में छिपा दर्द है, जिसने अपनी संतान के भविष्य के लिए पूरी जिंदगी लगा दी और बुढ़ापे में उसी संतान को अपने हिस्से का हिसाब करते देखा। यह उस मां की खामोशी है, जिसने बच्चों के लिए अपने हिस्से की खुशियां छोड़ दीं और एक दिन पाया कि बच्चों के पास उसके लिए समय ही नहीं है।

यह उस भाई की पीड़ा भी है, जो बचपन में एक रोटी आधी-आधी बांटकर खाने वाले भाई से आज संपत्ति का हिस्सा मांगते हुए आमने-सामने खड़ा है। और यह उस समाज का सवाल भी है, जहां रिश्ते तो बहुत हैं, लेकिन रिश्तों में अपनापन धीरे-धीरे कम होता जा रहा है।

आज मनुष्य के पास सब कुछ है मोबाइल है, इंटरनेट है, सोशल मीडिया है, हजारों संपर्क हैं, लेकिन मन की बात कहने के लिए एक अपना व्यक्ति तलाशना कठिन होता जा रहा है। हमारी उंगलियां स्क्रीन पर बहुत तेजी से चलती हैं, मगर दिल तक पहुंचने वाली बातचीत के लिए हमारे पास समय कम पड़ गया है। यही हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना है।

एक समय था जब परिवार बड़े होते थे और घर छोटे। एक ही आंगन में दादा-दादी, माता-पिता, चाचा-चाची और बच्चे रहते थे। जगह कम थी, मगर दिलों में जगह बहुत थी। एक थाली में कई लोग खाना खा लेते थे। एक चारपाई पर बच्चे सो जाते थे।एक रेडियो पूरे घर का मनोरंजन करता था। और किसी एक के घर में दुख होता था तो पूरा परिवार दुखी होता था।

आज घर बड़े हो गए हैं। कमरे बढ़ गए हैं। सुविधाएं बढ़ गई हैं लेकिन दिलों के बीच दूरी भी बढ़ गई है। अब एक ही घर में रहने वाले लोग कई बार एक-दूसरे से मोबाइल पर बात करते हैं, मगर सामने बैठकर मन की बात कहने का समय नहीं निकाल पाते। यह बदलाव केवल जीवनशैली का बदलाव नहीं है। यह रिश्तों की प्राथमिकताओं का बदलाव है।

एक पिता अपने बच्चे की उंगली पकड़कर उसे चलना सिखाता है। वही बच्चा बड़ा होकर पिता से पूछता है , “मेरे हिस्से में क्या आएगा?” समय का इससे बड़ा व्यंग्य शायद ही कोई हो।

जिस पिता ने कभी यह नहीं पूछा कि बच्चे ने मेरी जिंदगी में कितना खर्च किया, वही पिता बुढ़ापे में अपने ही बच्चों से सुनता है, “पिताजी, आपने हमारे लिए किया ही क्या है?”

यह वाक्य केवल कानों को नहीं चुभता। यह वर्षों की तपस्या को घायल करता है। माता-पिता अपनी जिंदगी का हिसाब नहीं रखते। वे यह नहीं गिनते कि बच्चे की पढ़ाई पर कितना खर्च हुआ। वे यह नहीं गिनते कि बीमारी में कितनी रातें जागकर गुजारीं। वे यह भी नहीं गिनते कि बच्चों की जरूरतों के लिए अपनी कितनी इच्छाएं कुर्बान कीं।

क्योंकि माता-पिता के लिए बच्चे निवेश नहीं होते। वे उनकी जिंदगी होते हैं लेकिन जब वही बच्चे रिश्तों को संपत्ति और सुविधा के तराजू पर तौलने लगते हैं, तब भीतर कहीं कुछ टूट जाता है। तब शायद पिता के मन से आवाज आती है  “समझाऊं किसे?”

रिश्ते तब नहीं टूटते, जब झगड़ा होता है, रिश्ते किसी एक दिन नहीं टूटते। वे धीरे-धीरे कमजोर होते हैं। पहले बातचीत कम होती है। फिर मिलने की इच्छा कम होती है। फिर छोटी-छोटी बातें मन में जमा होने लगती हैं फिर शिकायतें शुरू होती हैं  फिर तुलना, फिर अपेक्षा और अंत में स्वार्थ। जब स्वार्थ रिश्ते के बीच बैठ जाता है, तब प्रेम धीरे-धीरे किनारे हो जाता है।

भाई सोचता है, “उसे मुझसे ज्यादा मिला।”

बहन सोचती है, “मेरी कोई सुनता ही नहीं।”

बेटा सोचता है,  “मुझे मेरा अधिकार चाहिए।”

माता-पिता सोचते हैं, “हमने बच्चों को इतना दिया, फिर भी वे हमें समझ नहीं पाए।” हर व्यक्ति अपने स्थान पर स्वयं को सही मानता है। यही रिश्तों का सबसे बड़ा संकट है। सबको अपनी बात दिखाई देती है, दूसरे का दर्द नहीं।

समझाने वाला भी आखिर कब तक समझाए? हम अक्सर चाहते हैं कि सामने वाला हमारी भावनाओं को समझे। हम चाहते हैं कि वह हमारे त्याग को पहचाने। हम चाहते हैं कि वह हमारी चुप्पी का अर्थ समझे। लेकिन जीवन का एक सच यह भी है कि हर व्यक्ति आपकी तरह नहीं सोचता। आपके लिए जो प्रेम है, उसके लिए वह जिम्मेदारी हो सकती है। आपके लिए जो त्याग है, उसके लिए वह सामान्य बात हो सकती है। आपके लिए जो रिश्ता है, उसके लिए वह केवल एक सामाजिक संबंध हो सकता है। और यहीं से मनुष्य थकने लगता है।

वह बार-बार समझाता है। बार-बार अपनी बात रखता है। बार-बार उम्मीद करता है। फिर एक दिन अचानक चुप हो जाता है।उसकी चुप्पी को लोग अहंकार समझ लेते हैं। जबकि वह अहंकार नहीं, थकान होती है। बहुत कुछ समझाते-समझाते पैदा हुई थकान।

जीवन की परिपक्वता शायद यही है कि हम यह समझ जाएं कि हर बात का जवाब देना आवश्यक नहीं। हर आरोप का उत्तर नहीं देना। हर आलोचना का प्रतिवाद नहीं करना। हर व्यक्ति को अपनी सच्चाई साबित करने की कोशिश नहीं करना।कभी-कभी समय को बोलने देना चाहिए। क्योंकि समय वह शिक्षक है, जो बिना शब्दों के बहुत कुछ समझा देता है।

आज जिसे आपकी बात समझ नहीं आ रही, हो सकता है कल वही व्यक्ति उसी परिस्थिति से गुजरकर आपकी पीड़ा को समझे। आज जिसे आपकी चुप्पी कमजोरी लग रही है, संभव है कल वही चुप्पी उसे आपकी मजबूरी समझ आए। इसलिए हर रिश्ते में आखिरी शब्द बोलना जरूरी नहीं। कभी-कभी आखिरी शब्द समय के लिए छोड़ देना चाहिए।

बच्चों को संपत्ति नहीं, संस्कार चाहिए। हम अपने बच्चों के लिए बहुत कुछ जोड़ते हैं। मकान, जमीन, व्यवसाय, बैंक बैलेंस लेकिन क्या हमने उन्हें यह सिखाया कि इन सब चीजों से ऊपर भी कुछ होता है? क्या हमने उन्हें बताया कि भाई का हिस्सा केवल जमीन में नहीं, मां की गोद में भी होता है?

क्या हमने उन्हें बताया कि बहन की कीमत उसके हिस्से की संपत्ति से नहीं होती? क्या हमने उन्हें बताया कि बुजुर्ग माता-पिता किसी घर की जिम्मेदारी नहीं, उस घर की जड़ होते हैं?हम बच्चों को भविष्य सुरक्षित करने की शिक्षा देते हैं। लेकिन उन्हें रिश्ते सुरक्षित रखने की शिक्षा देना भी उतना ही जरूरी है।क्योंकि बैंक बैलेंस जीवन को सुविधा दे सकता है, लेकिन परिवार जीवन को अर्थ देता है।

उम्र के अंतिम पड़ाव पर माता-पिता को केवल दवाइयों की जरूरत नहीं होती। उन्हें किसी के दो शब्द चाहिए,  “पिताजी, आप कैसे हैं?” “मां, खाना खाया?” “आज कहीं चलें?” ये छोटे-छोटे वाक्य उनके लिए बहुत बड़े सहारे होते हैं। बुजुर्गों को हमेशा पैसे की जरूरत नहीं होती। 

उन्हें यह एहसास चाहिए कि वे अभी भी परिवार के लिए महत्वपूर्ण हैं। उनकी बातें पुरानी हो सकती हैं, लेकिन उनका अनुभव पुराना नहीं होता। उनके हाथ कांप सकते हैं, लेकिन उनकी दुआओं में आज भी ताकत होती है। उनकी चाल धीमी हो सकती है, लेकिन उन्होंने जिस रास्ते पर हमें चलना सिखाया, वह रास्ता आज भी हमारी जिंदगी का आधार है।

संपत्ति बांटने से पहले प्यार मत बांटिए:  संपत्ति का बंटवारा हो सकता है। जमीन के टुकड़े किए जा सकते हैं। मकान के हिस्से हो सकते हैं। पैसा बांटा जा सकता है लेकिन क्या बचपन बांटा जा सकता है? क्या मां की गोद बांटी जा सकती है? क्या पिता का त्याग बांटा जा सकता है? क्या भाई के साथ बिताया बचपन बांटा जा सकता है?

नहीं। इसलिए संपत्ति का हिस्सा लेते समय यह जरूर सोचिए कि कहीं उस हिस्से के साथ आप अपने रिश्ते का हिस्सा तो नहीं खो रहे। क्योंकि कई बार कुछ लाख या कुछ करोड़ पाने की खुशी बहुत छोटी होती है, लेकिन अपने भाई, बहन या माता-पिता को खोने का दुख जीवन भर रहता है।

कभी खुद से भी पूछिए—गलती किसकी है? हर कहानी में दोषी केवल दूसरा व्यक्ति नहीं होता। कभी हमें भी अपने भीतर झांकना चाहिए। क्या हमने बहुत अपेक्षाएं पाल ली थीं?

क्या हमने बच्चों को जरूरत से ज्यादा सुविधाएं देकर उन्हें जिम्मेदार बनाना भूल गए? क्या हमने अपने भाई से कभी खुलकर बात नहीं की? क्या हमने अपनी शिकायतें जमा होने दीं? क्या हमने माफी मांगने में अपनी प्रतिष्ठा को बीच में आने दिया? क्या हमने रिश्ते से ज्यादा अपनी बात को महत्व दिया?

इन सवालों के जवाब आसान नहीं हैं। लेकिन रिश्ते बचाने के लिए कभी-कभी अपने भीतर की अदालत में भी पेश होना पड़ता है।

मौन हमेशा कमजोरी नहीं होता। कई लोग कहते हैं  “वह अब पहले जैसा बात नहीं करता।” लेकिन शायद वे यह नहीं देखते कि उसने पहले कितना समझाया था। हर मौन के पीछे एक कहानी होती है। किसी का मौन नाराजगी है।

किसी का मौन दर्द। किसी का मौन निराशा और किसी का मौन यह स्वीकार कर लेना कि “अब जिसे समझाना था, समझा चुका हूं।” यह स्थिति बहुत खतरनाक होती है। क्योंकि जब कोई व्यक्ति बहस करना छोड़ देता है, तो जरूरी नहीं कि समस्या खत्म हो गई हो। हो सकता है उसने उम्मीद करना छोड़ दिया हो।

समय रहते लौट आइए, रिश्तों की सबसे खूबसूरत बात यह है कि जब तक सांस है, तब तक सुधार की संभावना है। अगर भाई से मनमुटाव है तो एक फोन कर लीजिए। अगर माता-पिता से नाराजगी है तो उनके पास बैठ जाइए। अगर बेटे-बेटी से दूरी है तो उन्हें गले लगा लीजिए। किसी को यह मत सोचने दीजिए कि पहल करने से आपकी हार हो जाएगी। रिश्तों में पहल करने वाला हारता नहीं। वह रिश्ता बचाता है और कभी-कभी एक छोटी-सी पहल वर्षों की दूरी मिटा देती है।

आखिर में... जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर जब इंसान पीछे मुड़कर देखता है तो उसे अपने घर की कीमत समझ आती है।उसे याद आता है कि बचपन में पिता की डांट कितनी जरूरी थी। मां की आवाज कितनी प्यारी थी। भाई की लड़ाई कितनी मासूम थी। बहन की शिकायतों में कितना अपनापन था। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इसलिए रिश्तों को उस समय मत बचाइए जब वे टूटने के कगार पर पहुंच जाएं।

उन्हें आज ही संभालिए। आज ही किसी अपने को फोन कीजिए। आज ही किसी से कहिए  “जो हुआ, उसे छोड़ देते हैं।” आज ही किसी बुजुर्ग के पास बैठकर कुछ देर उनकी बात सुन लीजिए।

आज ही अपने भाई से कह दीजिए  “तेरा हिस्सा जमीन में नहीं, मेरे दिल में है।” और अगर कभी जिंदगी आपको ऐसी परिस्थिति में खड़ा कर दे, जहां आपके पास कहने के लिए बहुत कुछ हो और सुनने वाला कोई न हो, तो परेशान मत होइए।

चुपचाप अपने मन से कहिए  “हर किसी को समझाना मेरी जिम्मेदारी नहीं है। मैं अपना सत्य जानता हूं। समय अपना काम करेगा।” क्योंकि जिंदगी में हर सवाल का जवाब तुरंत नहीं मिलता।

कुछ जवाब वर्षों बाद मिलते हैं। कुछ जवाब परिस्थितियां देती हैं और कुछ जवाब केवल समय देता है। तब शायद “समझाऊं किसे” का उत्तर भी मिल जाता है। जिसे अपना समझते हैं, उसे समझाने से पहले उसे समझने की कोशिश कीजिए।

शायद आधी दूरियां वहीं खत्म हो जाएं क्योंकि अंततः मनुष्य संपत्ति लेकर नहीं जाता। वह अपने साथ केवल रिश्तों की गर्माहट, अपनों की यादें और अपने कर्मों का संतोष लेकर जाता है।

इसलिए जब तक समय है  रिश्तों को बचा लीजिए। कल शायद समय हो, लेकिन सामने वाला न हो और तब कहने के लिए बहुत कुछ होगा... मगर सुनने वाला कोई नहीं फिर आप मन ही मन सोचेंगे  समझाऊं किसे?

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