श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेष : आधी रात के अंधकार में उतरा था प्रकाश, जब जन्मे थे योगेश्वर श्रीकृष्ण

 विनोद कुमार झा ( राधे राधे) 

“जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब भगवान किसी न किसी रूप में इस धरती पर अवतरित होते हैं।” भगवान श्रीकृष्ण का जन्म केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक घटना नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक चेतना का वह दिव्य क्षण है, जिसने संसार को प्रेम, धर्म, कर्म, नीति, भक्ति और जीवन-दर्शन का अद्भुत संदेश दिया।

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और मध्यरात्रि का वह पावन क्षण जब मथुरा की कारागार में देवकी और वसुदेव के पुत्र के रूप में भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लिया सनातन परंपरा में आज भी अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ स्मरण किया जाता है। मंदिरों में घंटियां बजती हैं, शंखनाद होता है, भक्त उपवास रखते हैं और रात्रि के मध्य भगवान के जन्म का उत्सव मनाया जाता है।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी हमें यह विश्वास दिलाती है कि अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, प्रकाश का जन्म निश्चित है।

जब पृथ्वी ने पुकारा, तब अवतरित हुए भगवान 

द्वापर युग में पृथ्वी पर अधर्म बढ़ने लगा था। अत्याचारी कंस ने मथुरा में भय का वातावरण बना रखा था। अपनी बहन देवकी के विवाह के अवसर पर जब आकाशवाणी हुई कि देवकी की आठवीं संतान ही कंस के विनाश का कारण बनेगी, तब कंस भयभीत हो उठा।

उसने देवकी और उनके पति वसुदेव को कारागार में डाल दिया। देवकी की संतानों को कंस एक-एक करके मृत्यु के घाट उतारता गया। लेकिन नियति ने जिस अवतार की भूमिका तैयार की थी, उसे कोई अत्याचारी रोक नहीं सकता था।

भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं गीता में अपने अवतार का उद्देश्य बताते हुए कहा :-

“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥”

“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥”

अर्थात जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूं। साधु पुरुषों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में अवतार लेता हूं।

भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की वह दिव्य रात्रि : भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में हुआ माना जाता है। जन्माष्टमी के पर्व में रोहिणी नक्षत्र का विशेष महत्व है। ज्योतिषीय और धार्मिक परंपराओं में श्रीकृष्ण के जन्मकाल को अत्यंत दिव्य माना गया है।

कथा के अनुसार उस समय मथुरा नगरी में रात का अंधकार था, लेकिन कारागार के भीतर एक अद्भुत दिव्य प्रकाश फैल गया। देवकी और वसुदेव ने देखा कि उनके सामने स्वयं भगवान विष्णु का दिव्य स्वरूप प्रकट है।

भगवान के हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित थे। मुकुट और दिव्य आभूषणों से अलंकृत उनका स्वरूप देखकर माता देवकी और पिता वसुदेव भाव-विभोर हो गए।

श्रीमद्भागवत में भगवान के प्राकट्य का वर्णन अत्यंत सुंदर ढंग से मिलता है:-

तमद्भुतं बालकमम्बुजेक्षणं

चतुर्भुजं शङ्खगदाद्युदायुधम्।

श्रीवत्सलक्ष्मं गलशोभिकौस्तुभं

पीताम्बरं सान्द्रपयोदसौभगम्॥”

अर्थात कमल के समान नेत्रों वाले, चार भुजाओं में शंख, गदा आदि धारण किए हुए, वक्षस्थल पर श्रीवत्स चिह्न और कौस्तुभ मणि धारण किए, पीतांबर पहने हुए भगवान का अद्भुत दिव्य स्वरूप प्रकट हुआ।

देवकी-वसुदेव के सामने प्रकट हुआ दिव्य स्वरूप : भगवान ने देवकी और वसुदेव को उनके पूर्व जन्मों का स्मरण कराया और बताया कि वे उनके पुत्र के रूप में अवतरित हुए हैं।

माता देवकी ने भगवान से प्रार्थना की कि वे अपना दिव्य चतुर्भुज स्वरूप छिपाकर सामान्य बालक का रूप धारण कर लें, क्योंकि यदि कंस को उनके जन्म का पता चल गया तो वह उन्हें भी मारने का प्रयास करेगा। भगवान ने माता-पिता को आश्वस्त किया और देखते ही देखते चार भुजाओं वाला दिव्य स्वरूप एक सुंदर नवजात शिशु में परिवर्तित हो गया। यही वह क्षण था जब परमात्मा ने स्वयं को एक साधारण बालक के रूप में संसार के सामने प्रस्तुत किया।

खुल गए कारागार के द्वार : भगवान श्रीकृष्ण के जन्म लेते ही प्रकृति जैसे उनकी सेवा में लग गई। कारागार के पहरेदार गहरी नींद में सो गए। वसुदेव के हाथों की बेड़ियां खुल गईं। कारागार के द्वार अपने आप खुल गए। बाहर यमुना उफान पर थीं। चारों ओर घना अंधकार था और मूसलाधार वर्षा हो रही थी।

वसुदेव ने नवजात कृष्ण को टोकरी में रखा और उन्हें लेकर गोकुल की ओर चल पड़े। कहा जाता है कि जब वसुदेव यमुना पार कर रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण की रक्षा के लिए शेषनाग ने अपना फन फैलाकर उनके ऊपर छत्र बना दिया।

यह दृश्य भारतीय भक्ति परंपरा की सबसे सुंदर कल्पनाओं में से एक है, एक पिता की गोद में स्वयं परमात्मा, सिर पर शेषनाग की छाया और मार्ग दिखाती हुई दिव्य प्रकृति।

यशोदा के आंगन में पहुंचे नंदलाल : वसुदेव गोकुल पहुंचे। वहां नंद बाबा के घर माता यशोदा ने एक कन्या को जन्म दिया था। भगवान की योगमाया की व्यवस्था से वहां किसी को कुछ पता नहीं चला। वसुदेव ने श्रीकृष्ण को यशोदा के पास सुला दिया और उस कन्या को लेकर मथुरा की कारागार में लौट आए।

जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म का समाचार मिला, तो वह उस बालिका को मारने के लिए आगे बढ़ा। लेकिन वह कन्या उसके हाथ से छूटकर आकाश में दिव्य रूप में प्रकट हुई और बोली:- “हे कंस! मुझे मारने से क्या लाभ? तेरा काल तो कहीं और जन्म ले चुका है।” इस प्रकार श्रीकृष्ण गोकुल में नंदलाल बनकर पले और संसार के लिए प्रेम, आनंद और भक्ति के प्रतीक बन गए।

माखन चुराने वाला बालक और हृदय चुराने वाला भगवान :  श्रीकृष्ण की बाल-लीलाएं केवल मनोरंजन की कथाएं नहीं हैं। उनके भीतर गहरे आध्यात्मिक संकेत छिपे हैं।

माता यशोदा का माखन चुराते कृष्ण, गोपियों की मटकी फोड़ते कृष्ण, गायों को चराते कृष्ण, बांसुरी बजाते कृष्ण इन सभी लीलाओं में भक्त को परम आनंद की अनुभूति होती है। कृष्ण का माखन चुराना भक्तों की दृष्टि से एक सुंदर प्रतीक है।

दूध से दही, दही से मंथन और मंथन से माखन। इसी प्रकार मनुष्य के भीतर भी जब साधना, प्रेम और भक्ति का मंथन होता है, तब उसके हृदय से निर्मल प्रेम का “माखन” निकलता है। श्रीकृष्ण उसी निर्मल हृदय को अपना निवास बनाते हैं। इसलिए भक्त कहते हैं , कृष्ण माखन नहीं चुराते, कृष्ण तो मन चुराते हैं।

पूतना से लेकर कंस तक, अधर्म का अंत : बाल्यकाल से ही श्रीकृष्ण ने अनेक लीलाएं कीं। पूतना का उद्धार, शकटासुर का वध, त्रिणावर्त का अंत, वत्सासुर, बकासुर और अघासुर जैसे असुरों का विनाश इन सभी प्रसंगों में एक संदेश छिपा है कि अधर्म चाहे किसी भी रूप में सामने आए, अंततः सत्य की विजय होती है।

कालिया नाग के फण पर नृत्य करते श्रीकृष्ण की लीला भी अत्यंत प्रसिद्ध है। यमुना के जल को विषैला बना चुके कालिया नाग के फण पर भगवान ने नृत्य किया और उसे अहंकार त्यागने का संदेश दिया।

यह लीला आज भी मनुष्य को बताती है कि अहंकार कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, प्रेम और धर्म के सामने उसे झुकना ही पड़ता है।

गोवर्धन पर्वत और प्रकृति संरक्षण का संदेश : श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला केवल धार्मिक कथा नहीं, बल्कि प्रकृति और पर्यावरण के प्रति भारतीय दृष्टिकोण का प्रतीक भी है।

जब ब्रजवासियों ने इंद्र की पूजा करने की तैयारी की, तब कृष्ण ने उन्हें समझाया कि हमें अपने जीवन का आधार बनने वाली प्रकृति, गौ, पर्वत और वर्षा के प्राकृतिक चक्र के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए।

इंद्र के क्रोधित होकर मूसलाधार वर्षा करने पर श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया और समस्त ब्रजवासियों को उसके नीचे आश्रय दिया। इस लीला का संदेश है कि प्रकृति की रक्षा करना वास्तव में स्वयं जीवन की रक्षा करना है।

राधा-कृष्ण प्रेम का सर्वोच्च प्रतीक : श्रीकृष्ण और राधा का प्रेम सांसारिक प्रेम की सामान्य परिभाषा से बहुत ऊपर माना जाता है।

राधा का प्रेम समर्पण है।

कृष्ण का प्रेम विस्तार है।

राधा भक्ति हैं और कृष्ण भगवान।

बांसुरी की धुन सुनकर गोपियों का कृष्ण की ओर आकर्षित होना इस बात का प्रतीक माना जाता है कि जब परमात्मा की पुकार भीतर सुनाई देती है तो संसार की सारी मोह-माया छोटी लगने लगती है। राधा-कृष्ण का प्रेम हमें बताता है कि सच्ची भक्ति में अधिकार नहीं, समर्पण होता है।

मथुरा लौटे कृष्ण और कंस का अंत : समय बीता और कृष्ण तथा बलराम मथुरा पहुंचे। कंस ने अनेक योजनाएं बनाईं, लेकिन भगवान की लीला के सामने उसकी कोई योजना सफल नहीं हुई। अंततः श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया और मथुरा को अत्याचार से मुक्त कराया।

यह घटना केवल एक अत्याचारी राजा के अंत की कथा नहीं है। यह इस शाश्वत सत्य का प्रतीक है कि  सत्ता का अहंकार कितना भी बड़ा क्यों न हो, धर्म की शक्ति उससे बड़ी होती है।

महाभारत के कृष्ण रणभूमि में बने सारथी : श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व केवल बाल-लीलाओं तक सीमित नहीं है। वे एक ओर बांसुरी बजाने वाले नंदलाल हैं तो दूसरी ओर महाभारत के महान रणनीतिकार। वे द्वारकाधीश हैं तो दूसरी ओर अर्जुन के सारथी।

कुरुक्षेत्र की रणभूमि में जब अर्जुन मोह और विषाद से भर गए, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें कर्म, ज्ञान, योग और धर्म का उपदेश दिया।

भगवद्गीता का यह श्लोक संसार के सबसे प्रसिद्ध जीवन-संदेशों में से एक है :

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥”

अर्थात मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल पर नहीं। इसलिए कर्मफल को ही अपना उद्देश्य न बनाएं और कर्म न करने में भी आसक्त न हों। आज के तनावपूर्ण जीवन में श्रीकृष्ण का यह संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है।

श्रीकृष्ण का विराट स्वरूप : जब अर्जुन युद्धभूमि में श्रीकृष्ण से उनके विराट स्वरूप को देखने की इच्छा व्यक्त करते हैं, तब भगवान उन्हें दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं।

भगवान कहते हैं—

“न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा।

दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्॥”

अर्थात तुम मुझे इन सामान्य नेत्रों से नहीं देख सकते। मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि देता हूं; अब मेरे ईश्वरीय योग को देखो।

यह संदेश केवल अर्जुन के लिए नहीं है। मनुष्य आज भी बाहरी आंखों से संसार को देखता है, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण हमें अंतरदृष्टि विकसित करने का संदेश देते हैं।

श्रीकृष्ण कहते हैं मैं सबके हृदय में हूं : भगवान श्रीकृष्ण ने मनुष्य और परमात्मा के संबंध को अत्यंत सरल शब्दों में समझाया।

भगवद्गीता में भगवान कहते हैं :-

“ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥”

अर्थात हे अर्जुन! परमात्मा सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हैं।

यही श्रीकृष्ण का सबसे बड़ा संदेश है  ईश्वर को खोजने के लिए केवल बाहर देखने की आवश्यकता नहीं; सच्ची भक्ति से अपने भीतर झांकना भी आवश्यक है।

जन्माष्टमी पर क्यों रखा जाता है व्रत?

जन्माष्टमी का व्रत केवल भूखा रहने का नाम नहीं है। इसका उद्देश्य शरीर के साथ-साथ मन को भी अनुशासित करना है।भक्त दिनभर उपवास रखते हैं, भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं, गीता और श्रीमद्भागवत का पाठ करते हैं और मध्यरात्रि में भगवान का जन्मोत्सव मनाते हैं।

मंदिरों में भगवान का अभिषेक किया जाता है। पंचामृत से स्नान कराया जाता है। माखन-मिश्री का भोग लगाया जाता है। झूले में बाल गोपाल को विराजमान किया जाता है। लेकिन जन्माष्टमी का वास्तविक व्रत तभी सार्थक है जब हम अपने भीतर के क्रोध का उपवास करें, अहंकार का उपवास करें, लोभ का उपवास करें, ईर्ष्या का उपवास करें और अपने हृदय में प्रेम को जन्म दें।

आधी रात का महत्व : श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में हुआ। धार्मिक दृष्टि से यह समय अत्यंत प्रतीकात्मक है। जब संसार सो रहा था, तब भगवान का प्रकाश प्रकट हुआ। यह हमें जीवन का एक गहरा संदेश देता है कि  जब मनुष्य के जीवन में सबसे अधिक अंधकार होता है, उसी समय भीतर से प्रकाश का जन्म हो सकता है।

दुख, निराशा, संघर्ष और कठिनाइयां जीवन का अंत नहीं हैं। कभी-कभी वही परिस्थितियां उस प्रकाश के जन्म का कारण बनती हैं, जिसे संसार बाद में श्रीकृष्ण के रूप में पहचानता है।

श्रीकृष्ण की बांसुरी का रहस्य : भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी भारतीय संस्कृति में प्रेम और आत्मसमर्पण का प्रतीक है। बांसुरी के भीतर अपना कोई स्वर नहीं होता। जब कृष्ण उसमें प्राण फूंकते हैं, तब वह मधुर संगीत बन जाती है।

भक्तों के लिए यह एक बड़ा आध्यात्मिक संदेश है कि  जब मनुष्य अपने अहंकार को खाली कर देता है, तब परमात्मा उसके जीवन को अपनी इच्छा के अनुसार मधुर बना सकते हैं।बांसुरी हमें सिखाती है कि भीतर से खाली होना कमजोरी नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण की अवस्था हो सकती है।

श्रीकृष्ण की मुस्कान में छिपा जीवन-दर्शन : श्रीकृष्ण के चेहरे पर सदैव मुस्कान दिखाई देती है। उन्होंने जीवन में संघर्ष देखे। जन्म से ही संकटों का सामना किया। अत्याचारी कंस से लेकर महाभारत के युद्ध तक अनेक कठिन परिस्थितियां सामने आईं। फिर भी उनके चेहरे की मुस्कान बनी रही।

क्यों?

क्योंकि कृष्ण हमें सिखाते हैं कि परिस्थितियां हमारे हाथ में नहीं होतीं, लेकिन परिस्थितियों के प्रति हमारा दृष्टिकोण हमारे हाथ में होता है। यही कारण है कि श्रीकृष्ण भारतीय जीवन-दर्शन में आनंद, संतुलन और कर्म के प्रतीक हैं।

आज के युग में श्रीकृष्ण की प्रासंगिकता : आज मनुष्य के पास साधन बहुत हैं, लेकिन शांति कम है। तकनीक आगे बढ़ रही है, लेकिन मनुष्य भीतर से तनावग्रस्त है। ऐसे समय में श्रीकृष्ण का संदेश हमें संतुलन सिखाता है।

वे कहते हैं, कर्म करो, लेकिन फल की चिंता में मत डूबो।

वे कहते हैं, धर्म का साथ दो, चाहे परिस्थिति कितनी भी कठिन क्यों न हो।

वे सिखाते हैं कि प्रेम करो, लेकिन आसक्ति में स्वयं को मत खोओ।

वे बताते हैं कि ज्ञान आवश्यक है, लेकिन ज्ञान के साथ विनम्रता भी जरूरी है।

वे यह भी सिखाते हैं कि जीवन में युद्ध आए तो उससे भागो नहीं; सत्य और धर्म के पक्ष में खड़े होकर अपना कर्तव्य निभाओ।

जन्माष्टमी केवल उत्सव नहीं, आत्मजागरण है : जन्माष्टमी पर घर सजते हैं, मंदिरों में झांकियां सजती हैं, बच्चे कृष्ण और राधा का रूप धारण करते हैं, दही-हांडी के आयोजन होते हैं और भक्त भजन गाते हैं। लेकिन यदि इस दिन हम केवल बाहरी उत्सव मनाकर रह गए और अपने भीतर के कंस को नहीं पहचाना, तो जन्माष्टमी का वास्तविक अर्थ अधूरा रह जाएगा।

हमारे भीतर का कंस अहंकार है।

हमारे भीतर की पूतना छल है।

हमारे भीतर का कालिया विषैला क्रोध है।

हमारे भीतर का गोवर्धन विश्वास है।

हमारे भीतर की राधा निष्काम भक्ति है।

और हमारे हृदय में जन्म लेने वाला कृष्ण प्रेम, सत्य और धर्म का प्रकाश है। इसलिए इस जन्माष्टमी पर केवल भगवान की मूर्ति को झूला न झुलाएं, बल्कि अपने हृदय में भी प्रेम को जन्म दें।

जन्माष्टमी का सबसे बड़ा संदेश : भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हमें बताता है कि  अंधकार स्थायी नहीं होता। अधर्म स्थायी नहीं होता। अहंकार स्थायी नहीं होता। अन्याय स्थायी नहीं होता।स्थायी है तो केवल सत्य, प्रेम और धर्म। इसलिए जब जीवन में कठिन समय आए तो निराश होने के बजाय श्रीकृष्ण को याद करें।

जब मन अशांत हो तो गीता पढ़ें।

जब अहंकार बढ़े तो कृष्ण की बांसुरी को याद करें।

जब अन्याय दिखाई दे तो कृष्ण का धर्म याद करें।

जब कर्म कठिन लगे तो उनका उपदेश याद करें।

कर्मण्येवाधिकारस्ते...” और जब जीवन में अंधकार बहुत गहरा लगे तो उस जन्मरात्रि को याद करें, जब मथुरा की कारागार में आधी रात को भगवान श्रीकृष्ण का प्रकाश प्रकट हुआ था।

आइए, इस जन्माष्टमी अपने भीतर कृष्ण को जन्म दें और हम संकल्प लें कि 

हम किसी जरूरतमंद की सहायता करेंगे। हम माता-पिता का सम्मान करेंगे। हम गौ, पशु-पक्षी और प्रकृति के प्रति संवेदनशील रहेंगे। हम बच्चों को संस्कार देंगे। हम नशे और बुरी आदतों से दूर रहेंगे। हम सत्य का साथ देंगे। हम अपने कर्म को ईमानदारी से करेंगे। और सबसे महत्वपूर्ण हम अपने हृदय में प्रेम, करुणा और क्षमा को स्थान देंगे।

क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण का वास्तविक जन्मोत्सव तब होगा, जब हमारे भीतर का अंधकार समाप्त होकर प्रेम और धर्म का प्रकाश जन्म लेगा।

“नंद के घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की…” जब मध्यरात्रि में मंदिरों में घंटियां बजें, शंखनाद हो और भक्त एक स्वर में पुकारें  “नंद के घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की…” तो वह केवल उत्सव का उद्घोष न हो, बल्कि हमारे भीतर से भी एक आवाज उठे  हे कृष्ण! हमारे भीतर के अज्ञान को दूर करो। हमारे अहंकार को समाप्त करो। हमारे कर्म को पवित्र करो। हमारे मन में प्रेम भरो और हमें सत्य तथा धर्म के मार्ग पर चलने की शक्ति दो।

भगवान श्रीकृष्ण की मुस्कान हमारे जीवन में आनंद भर दे, उनकी बांसुरी हमारे भीतर प्रेम जगाए, उनकी गीता हमें सही मार्ग दिखाए और उनका धर्म हमारे कर्मों में दिखाई दे।

श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेव।

जय श्रीकृष्ण।

जय कन्हैया लाल की।

राधे-राधे।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं।

Post a Comment

Previous Post Next Post