सच का आईना : कौन दोस्त और कौन दुश्मन

-रिश्तों की भीड़ में पहचानना होगा अपना कौन, पर उससे पहले खुद से पूछना होगा, हम दूसरों के लिए क्या हैं?

विनोद कुमार झा

आज इंसान के आसपास लोगों की कमी नहीं है, लेकिन भरोसे के रिश्ते कम होते जा रहे हैं। मोबाइल की स्क्रीन पर सैकड़ों संपर्क हैं, सोशल मीडिया पर हजारों परिचित हैं, शुभकामनाओं के संदेशों की भरमार है, लेकिन जब जीवन में कोई कठिन मोड़ आता है तो आसपास खड़े लोगों में से कितने वास्तव में हमारे साथ खड़े रहते हैं, यह सवाल भीतर तक झकझोर देता है। सुख में साथ चलने वाले बहुत मिल जाते हैं, मगर दुख में हाथ थामने वाला ही रिश्ते की असली पहचान बनता है। यही वह समय है जब जिंदगी हमें सच का आईना दिखाती है और बताती है कि कौन अपना है, कौन केवल परिचित है और कौन स्वार्थ की वजह से हमारे करीब है।

मनुष्य का जीवन रिश्तों से बना है। परिवार, मित्र, पड़ोसी, सहकर्मी और समाज इन सभी के बीच रहकर ही उसका व्यक्तित्व आकार लेता है। लेकिन रिश्ते केवल खून, परिचय या साथ रहने से मजबूत नहीं होते। रिश्तों की असली नींव विश्वास, सम्मान, संवेदना और जिम्मेदारी पर टिकी होती है। जो व्यक्ति हमारे सुख में प्रसन्न होता है, हमारे दुख में बेचैन होता है, हमारी गलती पर हमें समझाता है और आवश्यकता पड़ने पर बिना किसी स्वार्थ के साथ खड़ा होता है, उसके साथ बने रिश्ते की कीमत शब्दों में नहीं आंकी जा सकती।

आज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हम संबंधों को अक्सर सुविधा के तराजू पर तौलने लगे हैं। जहां लाभ दिखाई देता है, वहां अपनापन बढ़ जाता है और जहां स्वार्थ पूरा नहीं होता, वहां रिश्ते में दूरी आने लगती है। कई बार दोस्ती भी जरूरत के हिसाब से होने लगती है। काम पड़ा तो फोन, काम निकल गया तो दूरी। किसी के पास पद है तो उसके आसपास भीड़, पद चला गया तो वही भीड़ गायब। सफलता के समय बधाई देने वालों की कतार और असफलता के समय समझाने वाला भी मुश्किल से मिलना यह हमारे बदलते सामाजिक व्यवहार की तस्वीर है।

लेकिन हर चमक दोस्ती की निशानी नहीं होती और हर दूरी दुश्मनी का प्रमाण नहीं होती। कई बार कोई व्यक्ति हमारे सामने हमारी गलतियां गिना देता है और हमें उसकी बात बुरी लगती है। हम उसे अपना विरोधी समझ लेते हैं। मगर यदि उसकी बात के पीछे हमारी भलाई की भावना है तो हमें उस कड़वी बात पर भी विचार करना चाहिए। दूसरी ओर, जो व्यक्ति हमारी हर गलत बात पर भी वाहवाही करता है, हमारी कमियों पर पर्दा डालता है और हमें यह विश्वास दिलाता रहता है कि हम कभी गलत हो ही नहीं सकते, जरूरी नहीं कि वह हमारा सच्चा मित्र हो।

सच्ची मित्रता में चापलूसी नहीं, सच बोलने का साहस होता है। सच्चा मित्र वह नहीं जो हर परिस्थिति में हमारी हां में हां मिलाए, बल्कि वह है जो गलत रास्ते पर जाने से पहले हमें रोक दे। वह हमारे सामने हमारी कमियां बताने का साहस रखता है और हमारी अनुपस्थिति में भी हमारे सम्मान की रक्षा करता है। ऐसा व्यक्ति कभी-कभी कठोर दिखाई दे सकता है, लेकिन उसके भीतर संबंध को बचाने की ईमानदार कोशिश होती है।

जीवन की कठिन परिस्थितियां रिश्तों की सबसे बड़ी परीक्षा होती हैं। बीमारी, आर्थिक संकट, बेरोजगारी, पारिवारिक परेशानी, असफलता या मानसिक तनाव के समय व्यक्ति को केवल सलाह की जरूरत नहीं होती, उसे यह एहसास चाहिए कि कोई उसके साथ है। ऐसे समय में यदि कोई व्यक्ति हमारी बात सुनने के लिए कुछ पल निकाल ले, हमारी परेशानी को समझने का प्रयास करे और अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग करे, तो वह हमारे जीवन में बहुत बड़ा स्थान बना लेता है। संकट के समय साथ खड़े होने वाला व्यक्ति ही यह साबित करता है कि संबंध केवल शब्दों का नहीं, संवेदना का है।

यही संवेदना समाज की भी सबसे बड़ी जरूरत है। हम अक्सर सामाजिक समस्याओं पर लंबी चर्चाएं करते हैं। हम गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई, अपराध, नशाखोरी, बुजुर्गों की उपेक्षा, बच्चों की समस्याओं और सामाजिक असमानता पर बात करते हैं, लेकिन जब इन्हीं समस्याओं से जूझता कोई व्यक्ति हमारे सामने आता है तो हम अक्सर उससे मुंह मोड़ लेते हैं। सड़क पर घायल व्यक्ति को देखकर आगे बढ़ जाना, किसी भूखे को देखकर नजरें फेर लेना, अकेले बुजुर्ग की आवाज को अनसुना कर देना या किसी परेशान व्यक्ति को यह कहकर टाल देना कि ‘यह मेरी समस्या नहीं है’ क्या यही समाज की संवेदना है?

समाज केवल सरकारों और संस्थाओं से नहीं बनता। समाज हमसे बनता है। हमारे छोटे-छोटे व्यवहार समाज का चरित्र तय करते हैं। किसी बुजुर्ग का हाल पूछ लेना, किसी जरूरतमंद बच्चे की पढ़ाई में सहायता करना, किसी बीमार पड़ोसी के घर जाकर उसकी कुशलक्षेम पूछ लेना, किसी निराश व्यक्ति की बात ध्यान से सुन लेना या किसी अनजान व्यक्ति की मुश्किल घड़ी में यथासंभव सहायता कर देना, ये छोटे दिखाई देने वाले काम समाज के भीतर विश्वास और इंसानियत को मजबूत करते हैं।

आज संवेदनाओं की सबसे अधिक जरूरत शायद इसलिए है क्योंकि तकनीक ने हमें एक-दूसरे से जोड़ते हुए भी कहीं न कहीं भावनात्मक रूप से दूर कर दिया है। किसी के जन्मदिन पर एक संदेश भेजना आसान है, लेकिन उसके जीवन में चल रही परेशानी को समझने के लिए समय निकालना कठिन। किसी की उपलब्धि पर एक इमोजी भेजना आसान है, लेकिन उसकी असफलता के बाद उसके पास बैठना कठिन। किसी की तस्वीर देखकर प्रतिक्रिया देना आसान है, लेकिन उसके चेहरे के पीछे छिपे दर्द को पढ़ना कठिन। यही अंतर वास्तविक संबंध और औपचारिक संपर्क के बीच है।

हमें यह समझना होगा कि हर रिश्ता बराबर नहीं होता और हर व्यक्ति पर एक जैसा विश्वास भी नहीं किया जा सकता। जीवन में विवेक की आवश्यकता है। यदि कोई व्यक्ति बार-बार विश्वास तोड़ता है, अपमान करता है, स्वार्थ के लिए संबंधों का इस्तेमाल करता है या दूसरे के अधिकारों की अनदेखी करता है तो उससे दूरी बनाना आत्मसम्मान की रक्षा हो सकती है। संवेदना का अर्थ यह नहीं कि हम हर अन्याय को सहते रहें। दूसरों का सम्मान करना जरूरी है, लेकिन अपने सम्मान की रक्षा करना भी उतना ही जरूरी है।

सामाजिक जीवन में एक और गंभीर चुनौती है, पीठ पीछे किसी के बारे में गलत बातें करना और बिना सत्यापन के अफवाहों को आगे बढ़ाना। किसी व्यक्ति की छवि खराब करना, उसकी निजी बातों को सार्वजनिक करना या किसी अपुष्ट सूचना को सच मानकर प्रचारित करना केवल एक व्यक्ति को नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि पूरे सामाजिक वातावरण को विषाक्त करता है। सोशल मीडिया के दौर में हमारी जिम्मेदारी और बढ़ गई है। एक गलत संदेश कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकता है। इसलिए किसी खबर या आरोप को आगे बढ़ाने से पहले उसकी सत्यता पर विचार करना भी सामाजिक जिम्मेदारी है।

हमें अपने बच्चों को भी यही संस्कार देने होंगे। उन्हें केवल प्रतियोगिता और सफलता का पाठ पढ़ाना पर्याप्त नहीं है। उन्हें यह सिखाना होगा कि कमजोर का मजाक उड़ाना बहादुरी नहीं, जरूरतमंद की मदद करना कमजोरी नहीं और किसी की गलती पर उसे अपमानित करना श्रेष्ठता नहीं है। बच्चों को यह भी समझाना होगा कि दोस्ती का अर्थ केवल साथ खेलना या मनोरंजन करना नहीं है। दोस्ती का अर्थ एक-दूसरे की सुरक्षा, सम्मान और भलाई की चिंता करना भी है।

हमारे पड़ोस और आसपास के लोगों के साथ संबंध भी समाज की मजबूत कड़ी हैं। आज कई शहरों में लोग एक ही इमारत में वर्षों से रहते हैं, लेकिन एक-दूसरे के सुख-दुख से अनजान रहते हैं। हमारे दरवाजे पास हैं, लेकिन दिलों के बीच दूरी बढ़ती जा रही है। यह दूरी कम करने के लिए बड़े आयोजनों की नहीं, छोटे प्रयासों की जरूरत है। किसी पड़ोसी की बीमारी में हाल पूछना, किसी बुजुर्ग की जरूरत में मदद करना, किसी परिवार के संकट में उसके साथ खड़ा होना, यही सामाजिक जीवन की वास्तविक गर्माहट है।

मतभेद भी समाज का हिस्सा हैं। हर व्यक्ति की सोच एक जैसी नहीं हो सकती। परिवार में, समाज में और सार्वजनिक जीवन में विचारों का अलग होना स्वाभाविक है। समस्या तब पैदा होती है जब हम विचारों के मतभेद को व्यक्तिगत दुश्मनी में बदल देते हैं। किसी की राय से असहमत होना उसका अपमान करने का अधिकार नहीं देता। सभ्य समाज की पहचान यही है कि वहां असहमति के बावजूद संवाद बना रहता है और व्यक्ति के सम्मान को विचारों के संघर्ष से अलग रखा जाता है।

रिश्ते टूटने में वर्षों नहीं लगते। कभी एक गलत शब्द, कभी एक झूठ, कभी एक विश्वासघात और कभी लगातार की गई उपेक्षा रिश्तों में ऐसी दरार पैदा कर देती है जिसे भरना मुश्किल हो जाता है। इसलिए संवाद जरूरी है। गलती हो तो माफी मांगने में संकोच नहीं होना चाहिए और सामने वाले की गलती पर जहां संभव हो, वहां क्षमा का रास्ता अपनाना चाहिए। लेकिन क्षमा का अर्थ अन्याय को स्वीकार करना नहीं है। रिश्तों में प्रेम के साथ विवेक, विश्वास के साथ सावधानी और संवेदना के साथ आत्मसम्मान भी जरूरी है।

सबसे बड़ा सवाल फिर भी यही है कि कौन हमारा दोस्त है और कौन दुश्मन? शायद इसका उत्तर बाहर तलाशने से पहले हमें अपने भीतर तलाशना चाहिए। हम दूसरों से ईमानदारी की उम्मीद करते हैं, लेकिन क्या हम स्वयं ईमानदार हैं? हम चाहते हैं कि कोई हमारे दुख में हमारे साथ खड़ा हो, लेकिन क्या हम किसी दूसरे के दुख में उसके साथ खड़े होते हैं? हम चाहते हैं कि लोग हमारी अनुपस्थिति में हमारा सम्मान करें, लेकिन क्या हम दूसरों की अनुपस्थिति में उनका सम्मान बचाते हैं? हम चाहते हैं कि लोग हमारी गलतियों को समझें, लेकिन क्या हम दूसरों की गलतियों के प्रति सहनशील हैं? यही सवाल सच का असली आईना हैं।

किसी व्यक्ति की पहचान उसके पद, धन, प्रसिद्धि या सामाजिक प्रभाव से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि उसके आसपास रहने वाले लोग उसके व्यवहार से कैसा अनुभव करते हैं। यदि किसी के होने से दूसरे व्यक्ति को सुरक्षा मिलती है, सम्मान मिलता है, भरोसा मिलता है और कठिन समय में सहारा मिलता है, तो वह व्यक्ति समाज के लिए मूल्यवान है। इसके विपरीत यदि किसी की मौजूदगी से भय, अपमान, स्वार्थ और अविश्वास पैदा होता है तो हमें उसके व्यवहार पर विचार करना चाहिए।

जीवन में हर किसी को अपना बनाना संभव नहीं। हर विरोध करने वाला दुश्मन नहीं होता और हर मुस्कुराकर मिलने वाला दोस्त नहीं होता। इसलिए लोगों को उनके शब्दों से नहीं, उनके लगातार व्यवहार से पहचानना चाहिए। समय सबसे बड़ा परीक्षक है। जो रिश्ता समय, संकट और असहमति के बीच भी सम्मान बनाए रखता है, वही वास्तविक रिश्ता है।

और अंत में सबसे महत्वपूर्ण बात, हमें केवल यह जानने की कोशिश नहीं करनी चाहिए कि हमारे दोस्त कौन हैं और दुश्मन कौन। हमें यह भी तय करना चाहिए कि हम स्वयं दूसरों के लिए कौन हैं।

क्या हमारी वजह से किसी के चेहरे पर मुस्कान आती है? क्या हमारी वजह से किसी निराश व्यक्ति को उम्मीद मिलती है? क्या हमारी उपस्थिति किसी अकेले व्यक्ति को यह भरोसा देती है कि वह बिल्कुल अकेला नहीं है? क्या हम किसी कमजोर के पक्ष में खड़े होने का साहस रखते हैं? क्या हम किसी की अनुपस्थिति में उसके सम्मान की रक्षा करते हैं?

यदि इन सवालों के जवाब सकारात्मक हैं तो शायद हमें अपने आसपास दोस्त खोजने की उतनी जरूरत नहीं पड़ेगी। क्योंकि जो व्यक्ति दूसरों के लिए भरोसेमंद बन जाता है, उसके जीवन में रिश्तों की कमी नहीं रहती।

सच का आईना यही सिखाता है, दुनिया में कौन अपना है, यह पहचानना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि हम स्वयं किसी के लिए ‘अपने’ बन सकें। रिश्ते खून से बन सकते हैं, परिचय से बन सकते हैं, लेकिन उन्हें जीवित केवल संवेदना, विश्वास और इंसानियत रखती है।

Post a Comment

Previous Post Next Post