विनोद कुमार झा
आज के दौर में जब परिवार, रिश्तों और सामाजिक जिम्मेदारियों की बातें बड़े-बड़े मंचों से की जाती हैं, वहीं कभी-कभी सामने आने वाली कोई खबर इन दावों और हमारी सामाजिक संवेदनाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर देती है। कुछ दिन पहले रिम्स अस्पताल में लावारिस शव के अंतिम संस्कार से जुड़ी खबर भी ऐसी ही है। संभव है, बहुत से लोगों की नजर इस खबर पर महज एक सामान्य समाचार के रूप में गई हो, लेकिन यदि इसके पीछे छिपी मानवीय कहानी पर ठहरकर विचार किया जाए तो यह हमारे बदलते पारिवारिक रिश्तों, संवेदनाओं और सामाजिक जिम्मेदारियों का ऐसा आईना दिखाई देती है, जो भीतर तक झकझोर देता है। जिस व्यक्ति के शव को आज पहचान के अभाव में ‘लावारिस’ कहा गया, वह कभी किसी का बेटा रहा होगा, किसी का पिता, किसी का भाई, किसी का पति या किसी परिवार का अभिन्न हिस्सा। उसने भी जीवन में रिश्ते बनाए होंगे, जिम्मेदारियां निभाई होंगी, सुख-दुख देखे होंगे और अपने परिवार के लिए न जाने कितने छोटे-बड़े काम किए होंगे। मगर जीवन के अंतिम पड़ाव पर वही व्यक्ति इस दुनिया से इस तरह विदा हुआ कि उसके शव को अपना कहने वाला कोई सामने नहीं आया।
यह सवाल केवल उस एक शव का नहीं है। सवाल यह है कि आखिर वह कौन-सी सामाजिक परिस्थिति है, जिसमें एक इंसान अपने जीवन की अंतिम यात्रा में भी अपनों का इंतजार करता रह जाता है? क्या रिश्ते केवल तब तक रिश्ते हैं, जब तक उनसे कोई लाभ जुड़ा हुआ है? क्या परिवार की परिभाषा केवल एक छत के नीचे रहने वाले लोगों तक सीमित हो गई है? और क्या आधुनिक जीवन की भागदौड़ ने हमारे भीतर से वह संवेदना भी छीन ली है, जो कभी किसी अनजान व्यक्ति के दुख में भी आंखें नम कर देती थी?
जिस व्यक्ति को आज हम ‘लावारिस’ कह रहे हैं, वह जन्म से लावारिस नहीं था। वह भी कभी किसी मां की गोद में पला होगा। किसी पिता ने उसके भविष्य के सपने देखे होंगे। किसी भाई-बहन के साथ उसका बचपन बीता होगा। संभव है कि उसने किसी के लिए अपनी इच्छाओं का त्याग किया हो। हो सकता है उसने परिवार के लिए वर्षों मेहनत की हो, बच्चों की फीस भरी हो, किसी बीमार सदस्य की रात-रात भर सेवा की हो, किसी रिश्तेदार की मदद की हो या अपने हिस्से की खुशियां किसी और के नाम कर दी हों। लेकिन परिस्थितियां बदलीं, रिश्ते बदले और समय ने ऐसी करवट ली कि अंत में उसकी पहचान केवल एक ‘लावारिस शव’ बनकर रह गई।
मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जीवनभर वह अपनों को जोड़ने में लगा रहता है, लेकिन कभी-कभी अंतिम समय में वही अपने उससे दूर हो जाते हैं। आर्थिक परेशानियां, संपत्ति के विवाद, वैचारिक मतभेद, पारिवारिक कलह, अकेलापन, पलायन, वृद्धावस्था और टूटते पारिवारिक संबंध इसके पीछे अनेक कारण हो सकते हैं। हर मामले की अपनी परिस्थितियां होती हैं और किसी एक घटना के आधार पर किसी परिवार या समाज को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन ऐसी खबरें हमें यह सोचने के लिए जरूर मजबूर करती हैं कि कहीं हमारी सामाजिक व्यवस्था संवेदनशीलता के उस स्तर से तो दूर नहीं होती जा रही, जहां इंसान को इंसान समझना सबसे बड़ी जिम्मेदारी हुआ करती थी।
आज संयुक्त परिवार तेजी से छोटे परिवारों में बदल रहे हैं। यह परिवर्तन अपने आप में गलत या सही नहीं कहा जा सकता, लेकिन इसके साथ सामाजिक जिम्मेदारियों का कमजोर होना चिंता का विषय जरूर है। पहले मोहल्ले में किसी बुजुर्ग के घर का दरवाजा कई लोगों के लिए अपना दरवाजा होता था। पड़ोसी केवल पड़ोसी नहीं होते थे, बल्कि सुख-दुख में खड़े होने वाले लोग होते थे। किसी घर में बीमारी हो तो आसपास के लोग मदद के लिए पहुंच जाते थे। किसी की मृत्यु हो जाए तो पूरा मोहल्ला परिवार बन जाता था। आज कई जगह एक ही इमारत में वर्षों रहने के बाद भी लोगों को एक-दूसरे का नाम तक मालूम नहीं होता।
तकनीक ने हमें एक-दूसरे से जोड़ने के लिए बहुत साधन दिए हैं, लेकिन विडंबना यह है कि कई बार इन्हीं साधनों के बीच वास्तविक मानवीय संपर्क कम होता जा रहा है। मोबाइल में सैकड़ों संपर्क हो सकते हैं, सामाजिक माध्यमों पर हजारों मित्र हो सकते हैं, लेकिन जरूरत के समय हाथ थामने वाला व्यक्ति कितने हैं, यह सवाल अधिक महत्वपूर्ण है।
ऐसे समय में रिम्स में मिले उस लावारिस शव को सामाजिक संगठनों द्वारा मुक्तिधाम तक पहुंचाना केवल अंतिम संस्कार की एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश भी है। जब किसी व्यक्ति का अपना कोई सामने नहीं आया, तब कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उसे अपना मान लिया। उन्होंने उसके जीवन की पूरी कहानी शायद न जानी हो, उसके परिवार का पता शायद न चला हो, उसके साथ बिताए वर्षों की यादें उनके पास न हों, लेकिन उन्होंने इतना जरूर समझा कि मृत व्यक्ति सम्मान का अधिकारी है।
यही समाज की असली ताकत है। रिश्ते केवल खून से नहीं बनते, रिश्ते संवेदना से भी बनते हैं। किसी अनजान व्यक्ति के अंतिम संस्कार में शामिल होना, किसी जरूरतमंद की सहायता करना, किसी अकेले बुजुर्ग का हाल पूछना, किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई में मदद करना, किसी बीमार व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाना या किसी दुखी परिवार के साथ कुछ पल खड़ा होना भी सामाजिक रिश्ते का ही एक रूप है।
हमें यह भी समझना होगा कि समाज केवल सरकार, प्रशासन या सामाजिक संस्थाओं से नहीं बनता। समाज हम सब मिलकर बनाते हैं। जिस तरह हम अपने परिवार की चिंता करते हैं, उसी तरह अपने आसपास रहने वाले लोगों के प्रति भी हमारी कुछ जिम्मेदारियां हैं। पड़ोस में रहने वाला बुजुर्ग यदि कई दिनों से दिखाई नहीं दे रहा है तो उसके दरवाजे पर दस्तक देना कोई बहुत बड़ा काम नहीं। आसपास कोई जरूरतमंद परिवार है तो अपनी क्षमता के अनुसार मदद करना कोई एहसान नहीं। किसी अकेले व्यक्ति से दो शब्द प्रेम से बोल देना भी कई बार उसके लिए बहुत बड़ी राहत बन सकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने बच्चों को केवल सफलता की दौड़ में आगे बढ़ना न सिखाएं, बल्कि उन्हें संवेदनशील इंसान बनना भी सिखाएं। उन्हें बताएं कि पैसा जरूरी है, लेकिन रिश्ते उससे बड़े हैं। करियर जरूरी है, लेकिन मानवता उससे छोटी नहीं। अपनी खुशियां जरूरी हैं, लेकिन किसी दूसरे के दुख को समझना भी जीवन का हिस्सा है।
कई बार हम सोचते हैं कि समाज को बदलने के लिए बहुत बड़ा काम करना पड़ेगा। वास्तव में बदलाव छोटे-छोटे व्यवहारों से शुरू होता है। किसी बुजुर्ग का हाल पूछने से, किसी जरूरतमंद को भोजन देने से, रक्तदान करने से, किसी दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने से, किसी अनाथ बच्चे की मदद करने से या किसी अकेले व्यक्ति को यह एहसास कराने से कि वह अकेला नहीं है।
और सबसे जरूरी बात यह कि हमें अपने परिवार के बुजुर्गों को केवल जिम्मेदारी नहीं, अनुभव और आशीर्वाद का स्रोत समझना होगा। जिन हाथों ने कभी हमें चलना सिखाया, वही हाथ जब उम्र के कारण कांपने लगें तो उन्हें सहारा देना हमारी जिम्मेदारी है। माता-पिता की जरूरत केवल आर्थिक सहायता नहीं होती। उन्हें समय चाहिए, बातचीत चाहिए और यह भरोसा चाहिए कि उनके अपने लोग उनके साथ हैं।
लावारिस शव की खबर इसलिए विचलित करती है क्योंकि मृत्यु के बाद व्यक्ति के पास न शिकायत रहती है, न अपेक्षा। उसके पास केवल एक सवाल छोड़ जाने की क्षमता होती है—क्या जीवनभर जिन रिश्तों को हम अपना समझते रहे, वे अंतिम समय तक हमारे साथ रहेंगे?
इस सवाल का उत्तर हर व्यक्ति को अपने भीतर तलाशना होगा।आज हम अपने आसपास देखें। हमारे घर में कोई बुजुर्ग अकेला तो नहीं? हमारे पड़ोस में कोई ऐसा व्यक्ति तो नहीं जो लंबे समय से किसी से बात नहीं कर पाया? हमारे परिचितों में कोई आर्थिक या मानसिक परेशानी से गुजर रहा हो और हम उससे अनजान बने हुए हों? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे पास किसी के लिए पांच मिनट का समय नहीं, लेकिन घंटों आभासी दुनिया में बिताने के लिए समय है?
समाज तभी मजबूत होगा जब व्यक्ति केवल ‘मैं’ से निकलकर ‘हम’ की ओर बढ़ेगा। परिवार तभी मजबूत होगा जब अधिकारों के साथ जिम्मेदारियां भी याद रखी जाएंगी। और रिश्ते तभी जीवित रहेंगे जब उनमें स्वार्थ से अधिक संवेदना होगी।
जिस व्यक्ति को अस्पताल के रिकॉर्ड में ‘लावारिस’ लिखना पड़ा, वह अपने जीवन में किसी का अपना जरूर रहा होगा। उसकी कहानी हम नहीं जानते, लेकिन उसकी अंतिम यात्रा हमें बहुत कुछ सिखा सकती है। सामाजिक संगठनों ने उसे मुक्तिधाम तक पहुंचाकर यह साबित किया कि खून का रिश्ता न सही, मानवता का रिश्ता आज भी जिंदा है।
जरूरत केवल इतनी है कि हम उस मानवता को अंतिम यात्रा तक सीमित न रखें। जीते जी किसी का हाथ थामना, किसी की परेशानी सुनना, किसी के अकेलेपन को समझना और जरूरत के समय उसके साथ खड़ा होना ही सच्चे अर्थों में समाज के लिए काम करना है। क्योंकि अंत में इंसान अपने साथ धन-दौलत, पद और प्रतिष्ठा नहीं ले जाता। पीछे रह जाती हैं तो केवल उसकी यादें, उसके कर्म और लोगों के दिलों में उसके लिए बची हुई जगह।
इसलिए आज से यह संकल्प होना चाहिए कि हम केवल अपने परिवार के लिए नहीं, अपने समाज के लिए भी जिएंगे। अपने आसपास के लोगों की खबर लेंगे, जरूरतमंद की सहायता करेंगे और यह कोशिश करेंगे कि हमारे शहर, मोहल्ले और गांव में कोई व्यक्ति इतना अकेला न हो जाए कि मृत्यु के बाद उसकी पहचान केवल ‘लावारिस’ बनकर रह जाए।
क्योंकि किसी इंसान की अंतिम पहचान उसका लावारिस शव नहीं, बल्कि उसके जीवन में बांटी गई मानवता होनी चाहिए।
- लेखक स्वतंत्र एवं सामाजिक विश्लेषक
