-हमारी जिम्मेदारी केवल अपने परिवार तक नहीं, बल्कि समाज, देश, प्रकृति, पशु-पक्षियों, बुजुर्गों और आने वाली पीढ़ियों तक फैली है
विनोद कुमार झा
रक्षाबंधन आते ही मन में भाई की कलाई पर राखी बांधती बहन और बहन की रक्षा का संकल्प लेता भाई दिखाई देता है। राखी का धागा प्रेम, विश्वास और सुरक्षा का प्रतीक है। सदियों से यह पर्व भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को मजबूती देता आया है। लेकिन क्या रक्षाबंधन का अर्थ केवल इतना ही है कि भाई अपनी बहन की रक्षा करे? शायद नहीं।
वास्तव में रक्षाबंधन का संदेश इससे कहीं व्यापक और गहरा है। यह पर्व हमें रक्षा के व्यापक दायित्व का बोध कराता है। हमें अपने परिवार की रक्षा के साथ समाज की रक्षा, देश की रक्षा, प्रकृति की रक्षा, पशु-पक्षियों की रक्षा, बुजुर्गों के सम्मान और सुरक्षा, बच्चों के भविष्य तथा स्वयं के चरित्र और जीवन की रक्षा का संकल्प भी लेना चाहिए। आज जरूरत है कि राखी के धागे को केवल कलाई तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसके संदेश को अपने व्यवहार और जीवन में उतारा जाए।
भाई-बहन का रिश्ता केवल सुरक्षा का रिश्ता नहीं, बल्कि समानता, सम्मान और विश्वास का रिश्ता है। यदि हम सचमुच अपनी बहनों की रक्षा करना चाहते हैं तो उन्हें भयमुक्त वातावरण देना होगा। उनकी शिक्षा, स्वतंत्रता, निर्णय लेने के अधिकार और सम्मान की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है।
महिलाओं के प्रति हिंसा, छेड़छाड़, दहेज, घरेलू हिंसा, भेदभाव और असमानता जैसी समस्याएं केवल कानून से खत्म नहीं होंगी। समाज को अपनी सोच बदलनी होगी। जिस घर में बेटी को बराबरी का अधिकार मिलता है, वहीं से वास्तविक रक्षाबंधन की शुरुआत होती है।
समाज की रक्षा कौन करेगा?
आज समाज अनेक जटिल समस्याओं से जूझ रहा है। जातीय भेदभाव, सामाजिक वैमनस्य, हिंसा, नफरत, साइबर अपराध, अफवाहें, भ्रष्टाचार और बढ़ती असंवेदनशीलता हमारे सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर रहे हैं।
रक्षाबंधन पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम समाज में नफरत फैलाने वाली बातों को आगे नहीं बढ़ाएंगे। बिना सत्यापन के अफवाहें सोशल मीडिया पर साझा नहीं करेंगे। किसी कमजोर, गरीब या असहाय व्यक्ति का मजाक नहीं उड़ाएंगे। जरूरतमंद की सहायता करेंगे और गलत के खिलाफ आवाज उठाएंगे। समाज की रक्षा केवल पुलिस या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है। एक जिम्मेदार नागरिक भी समाज का प्रहरी होता है।
देश की रक्षा केवल सीमा पर नहीं होती : देश की रक्षा का नाम लेते ही हमारे मन में सीमा पर तैनात सैनिकों की तस्वीर उभरती है। निश्चित रूप से सैनिक राष्ट्र की सुरक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान देते हैं। लेकिन राष्ट्र की रक्षा की जिम्मेदारी नागरिकों की भी है।
ईमानदारी से अपना काम करना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना, कानून का सम्मान करना, मतदान के अधिकार का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना, करों का उचित भुगतान करना, भ्रष्टाचार को बढ़ावा न देना और देश की एकता एवं अखंडता बनाए रखना भी राष्ट्र सेवा है। देश केवल सीमा से नहीं बनता। देश उसके नागरिकों की सोच, चरित्र और जिम्मेदारी से बनता है।
प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा भी जरूरी : आज पर्यावरण संकट मानव सभ्यता के सामने बड़ी चुनौती है। पेड़ों की कटाई, प्रदूषण, जल संकट, प्लास्टिक कचरा और प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर खतरा बन रहे हैं।
इस रक्षाबंधन पर पेड़ को राखी बांधने की परंपरा को केवल प्रतीकात्मक आयोजन न बनाकर जीवनशैली का हिस्सा बनाया जा सकता है। एक पेड़ लगाना, उसकी देखभाल करना, पानी बचाना, प्लास्टिक का कम इस्तेमाल करना और आसपास स्वच्छता बनाए रखना भी प्रकृति की रक्षा है। अगर प्रकृति सुरक्षित नहीं रहेगी तो मनुष्य की सुरक्षा भी संभव नहीं होगी।
पशु-पक्षियों की रक्षा का संकल्प : रक्षा का दायरा केवल मनुष्यों तक क्यों सीमित हो? हमारे आसपास रहने वाले पशु-पक्षी भी जीवन के उतने ही अधिकारी हैं। गर्मी में पक्षियों के लिए पानी रखना, घायल पशु की सहायता करना, जानवरों के प्रति क्रूरता न करना और उन्हें अनावश्यक रूप से परेशान न करना छोटी बातें लग सकती हैं, लेकिन यही संवेदनशील समाज की पहचान हैं। एक मूक प्राणी अपनी पीड़ा शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता। इसलिए उसकी रक्षा करना हमारी मानवीय जिम्मेदारी है।
बुजुर्गों की रक्षा यानी अनुभव और संस्कारों की रक्षा : आधुनिक जीवन की भागदौड़ में बुजुर्गों का अकेलापन एक गंभीर सामाजिक समस्या बनता जा रहा है। वृद्ध माता-पिता और परिवार के वरिष्ठ सदस्यों को केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि समय, सम्मान और अपनापन भी चाहिए। रक्षाबंधन हमें यह याद दिलाने का अवसर देता है कि जिस पीढ़ी ने हमें जीवन, संस्कार और पहचान दी, उसके प्रति हमारी भी जिम्मेदारी है। बुजुर्गों की दवाइयों का ध्यान रखना, उनसे बातचीत करना, उनकी जरूरतों को समझना और उन्हें परिवार पर बोझ न समझना यह भी रक्षा है।
माता - पिता की रक्षा यानी मातृत्व का सम्मान : 'मां' केवल एक शब्द नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। इसलिए मां की रक्षा का अर्थ केवल शारीरिक सुरक्षा नहीं, बल्कि उसके सम्मान, स्वास्थ्य, अधिकार और भावनाओं की रक्षा भी है। आज आवश्यकता है कि बेटा और बेटी दोनों मां के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझें। घर के काम, बुजुर्गों की देखभाल और परिवार की जिम्मेदारियां केवल महिलाओं की जिम्मेदारी मानने वाली सोच बदलनी होगी। मां की आंखों में चिंता नहीं, विश्वास और सम्मान दिखाई दे यही सच्ची रक्षा है।
युवा पीढ़ी पहले अपनी रक्षा करे : रक्षाबंधन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश आज की युवा पीढ़ी के लिए भी है दूसरों की रक्षा करने से पहले स्वयं की रक्षा करना सीखें। नशा आज युवाओं के भविष्य के सामने बड़ी चुनौती है। शराब, तंबाकू, नशीले पदार्थों और अन्य व्यसनों से बचना स्वयं के जीवन की रक्षा है। इसके साथ ही ऑनलाइन लत, गलत संगत, हिंसक प्रवृत्तियों और गैर-जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार से बचना भी जरूरी है।
युवा यदि अपनी ऊर्जा को शिक्षा, कौशल, खेल, रोजगार, विज्ञान, कला, सामाजिक सेवा और राष्ट्र निर्माण में लगाएंगे तो वे स्वयं के साथ पूरे समाज का भविष्य सुरक्षित करेंगे। जिस युवा के हाथ में नशे की बोतल नहीं, बल्कि किताब, हुनर और जिम्मेदारी होगी, वही मजबूत समाज की नींव रखेगा।
डिजिटल दुनिया में भी रक्षा जरूरी : आज रक्षा का एक नया क्षेत्र डिजिटल दुनिया है। साइबर अपराध, ऑनलाइन ठगी, फर्जी खबरें, निजी जानकारी की चोरी और सोशल मीडिया पर मानसिक उत्पीड़न जैसी समस्याएं तेजी से सामने आ रही हैं। हमें अपने बच्चों और बुजुर्गों को डिजिटल सुरक्षा के बारे में जागरूक करना होगा। अनजान लिंक पर क्लिक न करना, ओटीपी और पासवर्ड किसी से साझा न करना, संदिग्ध संदेशों से सावधान रहना और सोशल मीडिया पर किसी की निजता का सम्मान करना भी आज की जिम्मेदारी है।
बच्चों के भविष्य की रक्षा : बच्चे देश का भविष्य हैं। उनकी सुरक्षा केवल स्कूल की चारदीवारी तक सीमित नहीं हो सकती। उन्हें सुरक्षित वातावरण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, पौष्टिक भोजन, खेल, संस्कार और सही मार्गदर्शन मिलना जरूरी है। बाल श्रम, बाल शोषण, हिंसा और ऑनलाइन खतरों से बच्चों को बचाना पूरे समाज की जिम्मेदारी है। यदि हम बच्चों का वर्तमान सुरक्षित करेंगे, तभी देश का भविष्य सुरक्षित होगा।
कमजोर और जरूरतमंद की रक्षा : समाज की असली परीक्षा इस बात से होती है कि वह अपने कमजोर वर्ग के साथ कैसा व्यवहार करता है। गरीब, दिव्यांग, अनाथ, बेसहारा, अकेली महिला, वृद्ध और जरूरतमंद व्यक्ति हमारे समाज का हिस्सा हैं। उनके प्रति संवेदनशील होना केवल दया नहीं, बल्कि सामाजिक कर्तव्य है।
रक्षाबंधन पर यदि एक परिवार अपने उत्सव के साथ किसी जरूरतमंद परिवार की मदद करने का संकल्प ले, तो राखी का पर्व और भी सार्थक हो सकता है।
अपनी अंतरात्मा की भी रक्षा करें : रक्षा की सबसे बड़ी लड़ाई बाहर नहीं, भीतर होती है। हमें अपने भीतर के लालच, अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या और हिंसा से भी रक्षा करनी होगी। ईमानदारी की रक्षा करनी होगी। रिश्तों में विश्वास की रक्षा करनी होगी। इंसानियत की रक्षा करनी होगी। अपने चरित्र की रक्षा करनी होगी।
क्योंकि जब व्यक्ति का चरित्र मजबूत होता है, तभी परिवार मजबूत होता है; परिवार मजबूत होता है तो समाज मजबूत होता है और मजबूत समाज ही मजबूत राष्ट्र का निर्माण करता है।
इस रक्षाबंधन पर लें व्यापक संकल्प : इस बार राखी बांधते समय केवल यह संकल्प न लें कि भाई बहन की रक्षा करेगा। बल्कि परिवार के सभी सदस्य मिलकर कुछ व्यापक संकल्प लें:-
- बहन के सम्मान की रक्षा करेंगे।
- बुजुर्गों के सम्मान और सुरक्षा की रक्षा करेंगे।
- मां के अधिकार और सम्मान की रक्षा करेंगे।
- बच्चों के भविष्य की रक्षा करेंगे।
- पशु-पक्षियों के जीवन की रक्षा करेंगे।
- पेड़-पौधों और जल-संसाधनों की रक्षा करेंगे।
- समाज में भाईचारे और सद्भाव की रक्षा करेंगे।
- देश की एकता और अखंडता की रक्षा करेंगे।
- युवा अपने जीवन और भविष्य की रक्षा करेंगे।
- नशे से दूर रहेंगे और दूसरों को भी जागरूक करेंगे।
- झूठ, अफवाह और नफरत को फैलने से रोकेंगे।
- और सबसे बढ़कर मानवता की रक्षा करेंगे।
राखी का धागा रिश्ते से जिम्मेदारी तक : रक्षाबंधन की राखी बहुत छोटी होती है, लेकिन उसका संदेश बहुत बड़ा है। यह धागा हमें बताता है कि रिश्ते केवल अधिकारों से नहीं, जिम्मेदारियों से मजबूत होते हैं। भाई बहन की रक्षा करे, बहन भाई के सुख-दुख में साथ खड़ी रहे यह इस पर्व की खूबसूरत परंपरा है। लेकिन आज समय की मांग है कि इस परंपरा को और व्यापक बनाया जाए।
राखी की डोर कलाई से निकलकर समाज तक पहुंचे, परिवार से निकलकर राष्ट्र तक पहुंचे और मनुष्य से निकलकर प्रकृति तथा समस्त जीव-जगत तक पहुंचे तभी रक्षाबंधन का वास्तविक अर्थ सार्थक होगा।
इस रक्षाबंधन पर हम केवल राखी न बांधें, बल्कि जिम्मेदारी बांधें, संवेदना बांटें, प्रेम बांटें और सुरक्षा का संकल्प बांधें।क्योंकि रक्षा का सबसे बड़ा अर्थ किसी एक व्यक्ति को बचाना नहीं, बल्कि ऐसा समाज बनाना है जहां हर व्यक्ति स्वयं को सुरक्षित, सम्मानित और जिम्मेदार महसूस करे।
यही रक्षाबंधन का व्यापक संदेश है:- रक्षा केवल रिश्तों की नहीं, रक्षा संस्कारों की भी हो। रक्षा केवल परिवार की नहीं, रक्षा समाज और देश की भी हो। रक्षा केवल मनुष्य की नहीं, रक्षा प्रकृति और समस्त जीव-जगत की भी हो। और सबसे पहले रक्षा अपने विवेक, चरित्र और भविष्य की हो। तभी कलाई पर बंधा एक छोटा-सा धागा वास्तव में पूरे समाज को जोड़ने वाली मजबूत डोर बन सकेगा।
(- लेखक स्वतंत्र एवं सामाजिक विश्लेषक)
