-बेरोजगारी की पीड़ा, आश्वासनों का बोझ और युवाओं के टूटते भरोसे के बीच सबसे बड़ा सवाल, आखिर युवा पीढ़ी सरकार पर विश्वास कैसे कायम रखे?
विनोद कुमार झा
किसी घर का चिराग बुझ जाए तो अंधेरा केवल उस कमरे में नहीं होता, उसकी रोशनी पूरे परिवार के भविष्य को प्रभावित करती है। ठीक यही स्थिति आज उस युवा की है, जो वर्षों तक पढ़ता है, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है, आवेदन शुल्क भरता है, परीक्षा देता है, परिणाम की प्रतीक्षा करता है और अंततः नौकरी के बजाय एक और आश्वासन उसके हाथ आता है। उसकी उम्र बढ़ती जाती है, लेकिन रोजगार का इंतजार खत्म नहीं होता।
युवा देश की सबसे बड़ी ताकत कहे जाते हैं। भाषणों में उन्हें देश का भविष्य बताया जाता है, नीतियों में उन्हें विकास का इंजन कहा जाता है और चुनावी मंचों से उनके सपनों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने के वादे किए जाते हैं। लेकिन जब वही युवा रोजगार के सवाल पर दर-दर भटकता है तो उसके सामने सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है, आखिर उसके सपनों की जिम्मेदारी कौन लेगा?
इसी बेचैनी को यदि एक मुहावरे में कहा जाए तो लगता है “लुटिया ले गया चोर।” यहां चोर किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि उस व्यवस्था, उस निराशा और उस लगातार बढ़ती दूरी का प्रतीक है, जो युवा के सपनों और उसके वास्तविक जीवन के बीच पैदा हो गई है।
डिग्री हाथ में, नौकरी का इंतजार
आज लाखों युवा डिग्रियां लेकर निकल रहे हैं। किसी के पास स्नातक की डिग्री है, किसी के पास परास्नातक की, कोई तकनीकी शिक्षा प्राप्त कर चुका है तो कोई प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए वर्षों से तैयारी कर रहा है। लेकिन शिक्षा पूरी करने के बाद रोजगार मिलना अपने आप में एक अलग संघर्ष बन गया है।
एक युवा सुबह उठकर नौकरी की वेबसाइट देखता है, रोजगार समाचार देखता है, सरकारी भर्ती की सूचना तलाशता है। कोई परीक्षा का विज्ञापन आता है तो आवेदन करता है। फिर परीक्षा की तारीख का इंतजार। परीक्षा होती है तो परिणाम का इंतजार। परिणाम के बाद दस्तावेज सत्यापन का इंतजार। उसके बाद नियुक्ति पत्र का इंतजार। और कभी-कभी वर्षों का इंतजार।
इस पूरी प्रक्रिया में उसकी उम्र निकल जाती है, परिवार की आर्थिक क्षमता समाप्त होने लगती है और सबसे अधिक चोट उसके आत्मविश्वास पर पड़ती है। जिस युवा को कभी परिवार उम्मीद की नजर से देखता था, वही धीरे-धीरे घर के खर्च के लिए माता-पिता पर निर्भर होने लगता है। रिश्तेदार सवाल पूछते हैं, पड़ोसी तुलना करते हैं और समाज सफलता को केवल नौकरी के चश्मे से देखने लगता है।
बेरोजगारी केवल आर्थिक समस्या नहीं
बेरोजगारी का अर्थ केवल आय का न होना नहीं है। यह आत्मसम्मान, मानसिक संतुलन, पारिवारिक संबंधों और सामाजिक विश्वास से भी जुड़ा प्रश्न है। जब कोई युवा बार-बार असफल होता है, तो उसे केवल परीक्षा में असफलता नहीं मिलती। उसे लगता है कि शायद वह स्वयं ही असफल है। यही भावना सबसे खतरनाक है।
एक ओर उसके सामने महंगाई है, दूसरी ओर परिवार की अपेक्षाएं। तीसरी ओर सोशल मीडिया पर दूसरों की सफलता की चमक है। वह देखता है कि उसके साथ पढ़ने वाला कोई व्यक्ति नौकरी पा चुका है, कोई विदेश चला गया, कोई कारोबार कर रहा है और कोई अपने परिवार की जिम्मेदारी संभाल रहा है। ऐसे में उसका संघर्ष और अधिक भारी हो जाता है।
हमें यह समझना होगा कि बेरोजगार युवा निकम्मा नहीं होता। हो सकता है कि व्यवस्था ने उसके लिए पर्याप्त अवसर पैदा नहीं किए हों। हो सकता है कि भर्ती प्रक्रिया में देरी हुई हो। हो सकता है कि पद कम हों और आवेदक लाखों। हो सकता है कि परीक्षा और नियुक्ति के बीच वर्षों का अंतर हो। इस अंतर को समझना समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है।
आश्वासन पर आश्वासन कब तक?
चुनाव लोकतंत्र का उत्सव हैं। घोषणापत्र लोकतांत्रिक राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। राजनीतिक दल रोजगार, भर्ती, नए उद्योग, निवेश और स्वरोजगार के वादे करते हैं। जनता उनसे उम्मीद करती है और युवा इन घोषणाओं को अपने भविष्य से जोड़कर देखते हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब आश्वासन परिणाम का विकल्प बन जाता है।
युवा को भाषण नहीं, अवसर चाहिए। उसे केवल यह सुनना पर्याप्त नहीं कि “नौकरियां आएंगी।” उसे यह जानना है कि कितनी नौकरियां आएंगी, कब आएंगी, किन क्षेत्रों में आएंगी और भर्ती की प्रक्रिया कितने समय में पूरी होगी।
उसे यह भी जानना है कि जिस परीक्षा का विज्ञापन आज निकला है, उसकी नियुक्ति कब तक होगी। किसी भी सरकार की सफलता का मूल्यांकन केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि उन घोषणाओं के जमीन पर उतरने से होना चाहिए।
सरकार पर विश्वास कैसे कायम रहे?
यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र में सरकार और जनता के बीच सबसे मजबूत रिश्ता विश्वास का होता है। जनता सरकार को अपना प्रतिनिधि चुनती है। सरकार से अपेक्षा करती है कि वह उसके जीवन को बेहतर बनाएगी।
युवा इस विश्वास का सबसे बड़ा हिस्सा है। यदि एक युवा बार-बार भर्ती परीक्षाओं में शामिल होता है और प्रक्रिया में अनिश्चितता देखता है, यदि वह आवेदन शुल्क देता है लेकिन परीक्षा समय पर नहीं होती, यदि परिणाम में लंबा विलंब होता है, यदि नियुक्ति प्रक्रिया वर्षों तक खिंचती है, तो उसके मन में स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है, क्या व्यवस्था वास्तव में उसके साथ खड़ी है?
इस सवाल का जवाब नारों से नहीं, पारदर्शिता और समयबद्ध कार्रवाई से देना होगा। सरकारों को भर्ती कैलेंडर को गंभीरता से लागू करना चाहिए। रिक्त पदों की वास्तविक संख्या सार्वजनिक होनी चाहिए। परीक्षाओं की समयसीमा तय होनी चाहिए। परिणाम और नियुक्ति प्रक्रिया में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए। यदि किसी कारण से परीक्षा या भर्ती प्रभावित होती है तो युवाओं को स्पष्ट और समयबद्ध जानकारी दी जानी चाहिए।
युवा को अंधेरे में रखना अविश्वास को जन्म देता है। युवाओं को भी अपनी राह तलाशनी होगी। यहां केवल सरकार को दोष देकर बात पूरी नहीं हो सकती।
बदलती अर्थव्यवस्था में रोजगार का स्वरूप भी बदल रहा है। सरकारी नौकरी महत्वपूर्ण है, लेकिन हर युवा को सरकारी नौकरी ही मिले, यह संभव नहीं है। इसलिए शिक्षा व्यवस्था को रोजगारपरक बनाना, कौशल विकास को बढ़ाना, उद्यमिता को प्रोत्साहित करना और निजी क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण रोजगार पैदा करना भी उतना ही जरूरी है।
युवाओं को भी केवल एक परीक्षा या एक नौकरी के सहारे अपने भविष्य को नहीं छोड़ना चाहिए। नई तकनीक, डिजिटल सेवाएं, कृषि आधारित उद्योग, छोटे कारोबार, स्टार्टअप, स्थानीय उद्यम, फ्रीलांसिंग और कौशल आधारित सेवाओं में नए अवसर तलाशे जा सकते हैं। लेकिन इसके लिए प्रशिक्षण, पूंजी, बाजार और मार्गदर्शन की जरूरत होगी।
सरकार का काम केवल नौकरी देना नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण तैयार करना भी है जिसमें नौकरी पैदा करने वाला युवा तैयार हो सके।
युवाओं की सबसे बड़ी मांग- अवसर
युवा मुफ्त की सुविधा नहीं मांगता। वह अवसर मांगता है। वह चाहता है कि उसकी मेहनत का मूल्य हो। वह चाहता है कि परीक्षा निष्पक्ष हो। वह चाहता है कि भर्ती समय पर हो। वह चाहता है कि योग्यता को प्राथमिकता मिले। वह चाहता है कि उसकी उम्र सरकारी प्रक्रियाओं के इंतजार में न निकल जाए।
और सबसे बढ़कर वह चाहता है कि उसके भविष्य को राजनीति के वादों और आंकड़ों के बजाय वास्तविक अवसरों से जोड़ा जाए। एक देश तब मजबूत होता है जब उसका युवा अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त होता है। जिस देश का युवा निराश हो जाए, वहां विकास के आंकड़े भी अधूरे लगने लगते हैं।
“लुटिया” आखिर किसकी गई?
“लुटिया ले गया चोर” कहने में व्यंग्य है, लेकिन इसके भीतर एक गंभीर सामाजिक पीड़ा छिपी है।
यदि वर्षों की पढ़ाई के बाद भी युवा को अवसर न मिले, यदि भर्ती की प्रतीक्षा में उसकी उम्र निकल जाए, यदि प्रतियोगिता में लाखों युवाओं की मेहनत बार-बार अनिश्चितता से टकराए और यदि आश्वासन वास्तविक परिणामों में परिवर्तित न हों, तो सवाल केवल एक नौकरी का नहीं रह जाता।
सवाल यह होता है कि क्या हमने अपने युवाओं के सपनों की लुटिया तो नहीं डुबो दी?
यह जिम्मेदारी सरकार की भी है, समाज की भी और शिक्षा व्यवस्था की भी। राजनीतिक दलों को रोजगार को केवल चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राष्ट्रीय नीति का विषय बनाना होगा। सरकारों को आंकड़ों से आगे बढ़कर प्रत्येक भर्ती की समयसीमा और प्रत्येक योजना के परिणाम का हिसाब जनता के सामने रखना होगा।
उम्मीद अभी बाकी है
निराशा के इस दौर में भी उम्मीद की किरण मौजूद है। भारत की युवा आबादी उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। यही युवा तकनीक सीख सकता है, नए व्यवसाय खड़े कर सकता है, गांवों में रोजगार पैदा कर सकता है, उद्योगों को नई दिशा दे सकता है और देश की अर्थव्यवस्था को गति दे सकता है लेकिन इसके लिए उसे केवल भाषण नहीं चाहिए।
उसे विश्वास चाहिए।
उसे निष्पक्ष व्यवस्था चाहिए।
उसे समय पर अवसर चाहिए।
उसे परिणाम चाहिए।
आश्वासन राजनीति का हिस्सा हो सकता है, लेकिन युवा का भविष्य आश्वासन के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। सरकारें आती-जाती रहेंगी, राजनीतिक दल बदलते रहेंगे, नारे बदलते रहेंगे, लेकिन देश की युवा पीढ़ी वही रहेगी। इसलिए उसकी उम्मीदों के साथ खिलवाड़ किसी एक सरकार या दल का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के भविष्य का प्रश्न है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम युवा को यह भरोसा दिलाएं कि उसकी मेहनत बेकार नहीं जाएगी। परीक्षा की तैयारी करते हुए उसे यह विश्वास हो कि प्रक्रिया पूरी होगी। डिग्री हासिल करते हुए उसे यह भरोसा हो कि उसके लिए अवसर मौजूद हैं। कारोबार शुरू करते हुए उसे यह विश्वास हो कि व्यवस्था उसके साथ खड़ी है।
तभी लोकतंत्र में विश्वास मजबूत होगा। तभी सरकार और युवा के बीच की दूरी कम होगी। और तभी “लुटिया ले गया चोर” जैसी व्यथा एक दिन बदलकर यह कहने का अवसर देगी—
“मेहनत रंग लाई, अवसर मिला और युवा ने देश की तस्वीर बदल दी।” क्योंकि युवा को दया नहीं चाहिए, उसे दिशा और अवसर चाहिए। उसे खैरात नहीं चाहिए, उसे अपने श्रम का सम्मान चाहिए। और उसे बार-बार आश्वासन नहीं चाहिए उसे ऐसा भविष्य चाहिए जिस पर वह आज विश्वास कर सके।
