विनोद कुमार झा
"हर-हर महादेव... बोल बम... जय श्री महाकाल!"
यह केवल एक उद्घोष नहीं, बल्कि करोड़ों शिवभक्तों की आत्मा की आवाज है। सावन का पवित्र महीना आते ही भारत की धड़कन बदल जाती है। मंदिरों की घंटियों की मधुर ध्वनि, डमरू की गूंज, शिव भजनों की स्वर-लहरियाँ और कांवड़ियों के मुख से निकलता "बोल बम" का जयघोष वातावरण को ऐसा दिव्य बना देता है कि लगता है मानो स्वयं कैलाश धरती पर उतर आया हो।
सावन केवल पंचांग का एक महीना नहीं है, यह भक्ति, तप, त्याग और आत्मसमर्पण का महापर्व है। इस महीने में शिवभक्त अपने आराध्य के प्रति प्रेम व्यक्त करने के लिए कठिन से कठिन मार्ग भी मुस्कुराते हुए पार कर लेते हैं। उनके लिए न धूप मायने रखती है, न वर्षा और न ही लंबी दूरी। उनके लिए सबसे बड़ा सौभाग्य यही है कि वे अपने कंधों पर पवित्र गंगाजल लेकर भोलेनाथ का जलाभिषेक करने जा रहे हैं।
इस वर्ष प्रकृति का दृश्य भी अद्भुत है। मानो देवराज इंद्र स्वयं भगवान शिव के भक्तों का स्वागत कर रहे हों। आसमान से गिरती वर्षा की बूंदें केवल पानी नहीं लगतीं, बल्कि ऐसा प्रतीत होता है जैसे स्वर्ग से देवताओं का आशीर्वाद बरस रहा हो। तेज बारिश के बीच भी शिवभक्तों के कदम नहीं रुकते। भीगे हुए भगवा वस्त्र, कंधों पर सजी कांवड़, हाथों में त्रिशूल और होंठों पर "हर-हर महादेव" का मंत्र यह दृश्य केवल देखा नहीं जाता, बल्कि हृदय में उतर जाता है।
जब लाखों कांवड़िए एक साथ आगे बढ़ते हैं, तब सड़कें केवल सड़कें नहीं रह जातीं, वे आस्था की गंगा बन जाती हैं। चारों ओर भगवा ही भगवा दिखाई देता है। छोटे बच्चे, युवा, बुजुर्ग, महिलाएँ हर वर्ग, हर समाज और हर प्रदेश का व्यक्ति एक ही पहचान के साथ चलता है वह शिव का भक्त है।
कांवड़ यात्रा हमें यह भी सिखाती है कि सच्ची भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होती, बल्कि अनुशासन, सेवा और त्याग में भी दिखाई देती है। मार्ग में लाखों लोग बिना किसी भेदभाव के कांवड़ियों की सेवा करते हैं। कोई शरबत पिला रहा है, कोई भोजन करा रहा है, कोई चिकित्सा सेवा दे रहा है तो कोई थके हुए यात्रियों के विश्राम की व्यवस्था कर रहा है। यही सनातन संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति है जहाँ सेवा ही सबसे बड़ी साधना बन जाती है।
भगवान शिव को "भोलेनाथ" इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे अपने भक्तों के भाव देखते हैं, वैभव नहीं। उन्हें स्वर्ण का मुकुट नहीं, श्रद्धा से अर्पित एक लोटा जल भी प्रिय है। इसलिए सावन में जब कोई साधारण भक्त नंगे पैर, भीगते हुए, कठिन मार्ग तय करके बाबा के दरबार तक पहुँचता है, तब उसकी भक्ति स्वयं महादेव के हृदय को स्पर्श करती है।
शास्त्र में कहा गया हैं कि शिव विनाश के देव नहीं, बल्कि कल्याण के देव हैं। वे विष पीकर भी संसार को अमृत देते हैं। वे श्मशान में रहकर भी जीवन का उत्सव सिखाते हैं। वे भस्म धारण करके भी अहंकार का अंत और आत्मा की अमरता का संदेश देते हैं। यही कारण है कि महाकाल के भक्त संकट में भी मुस्कुराना जानते हैं।
आज जब पूरे देश में कांवड़ यात्रा अपने चरम पर है, तब हर मार्ग पर आस्था का महासागर उमड़ रहा है। डमरू की थाप, "बोल बम" के नारे, शिव तांडव स्तोत्र की गूंज और भक्तों का उत्साह ऐसा वातावरण बना देता है कि देखने वाला भी अनायास ही शिवमय हो जाता है।
सच तो यह है कि जब स्वयं महाकाल अपने भक्तों का हाथ थाम लें, तब किसी भी संकट की शक्ति नहीं रहती। काल भी उसी के सामने नतमस्तक हो जाता है, जिसके साथ कालों के काल महाकाल खड़े हों। इसलिए सावन हमें केवल पूजा करना नहीं सिखाता, बल्कि यह विश्वास भी देता है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ, यदि मन में महादेव का नाम और कर्म में सच्चाई है, तो मंजिल अवश्य मिलेगी।
आइए, इस पावन अवसर पर हम भी अपने भीतर के क्रोध, लोभ, अहंकार और द्वेष का जलाभिषेक करें। अपने मन को शिवमय बनाएं, सेवा को अपना धर्म और करुणा को अपना आभूषण बनाएं। यही सावन का वास्तविक संदेश है और यही भगवान भोलेनाथ की सच्ची आराधना है।
हर-हर महादेव!
बोल बम!
जय हो भोले भंडारी!
जय श्री महाकाल!
