-रोशनी के पीछे छिपे अंधेरों की कहानी
लेखक की कलम से
विनोद कुमार झा
मुंबई... वह शहर जो कभी सोता नहीं। रात के बारह बजे भी यहाँ की सड़कें किसी त्योहार की तरह जगमगाती रहती हैं। आसमान को छूती इमारतें, महंगी कारों का शोर, कैमरों की चमक और सपनों की भीड़। लाखों लोग यहाँ अपनी किस्मत बदलने आते हैं। कुछ सफल हो जाते हैं, तो कुछ भीड़ में खो जाते हैं।
इसी शहर में रहती थी अनन्या। वह देश की सबसे चर्चित फिल्म अभिनेत्री थी। उसके नाम पर करोड़ों की फिल्में बनती थीं। उसके एक विज्ञापन की फीस इतनी थी कि किसी छोटे शहर का पूरा मोहल्ला साल भर आराम से जी सकता था।
उसके बंगले के बाहर रोज़ सैकड़ों प्रशंसकों की भीड़ लगी रहती। सोशल मीडिया पर करोड़ों लोग उसकी एक मुस्कान के दीवाने थे। लोगों को लगता था कि अनन्या से अधिक खुश इंसान दुनिया में कोई नहीं होगा। लेकिन सच इससे बिल्कुल अलग था। लेकिन जैसे ही बंगले का दरवाज़ा बंद हुआ, मुस्कान भी कहीं खो गई।
चारों तरफ़ सन्नाटा था। हजारों वर्गफुट में फैले उस आलीशान घर में सिर्फ़ एसी की आवाज़ गूंज रही थी। दीवारों पर लगे महंगे चित्र, विदेशी फर्नीचर और झूमरों की रोशनी भी उस अकेलेपन को नहीं भर पा रही थी, जो वर्षों से जमा था। उसने अपना मोबाइल खोला। लाखों लोगों ने उसकी नई तस्वीर पर प्यार बरसाया था। सैकड़ों संदेश थे "आप हमारी प्रेरणा हैं", "आपकी जिंदगी कितनी शानदार है।"
रात को जब पूरा शहर जगमगा रहा होता, अनन्या अपने आलीशान बंगले की सबसे ऊँची बालकनी में अकेली बैठी आसमान को देखा करती। सामने फैली रोशनी उसे कभी आकर्षित नहीं करती थी। उसे याद आते थे अपने छोटे से गाँव के वे दिन, जब बिजली चली जाती थी तो पूरा परिवार लालटेन की रोशनी में बैठकर खाना खाता था। तब पैसे कम थे, लेकिन हँसी बहुत थी। आज पैसे बहुत थे, मगर हँसी कहीं खो गई थी।
एक शाम शूटिंग के दौरान अनन्या को अपनी माँ का फोन आया। माँ की आवाज़ धीमी थी। "बेटा... तुम्हारे पापा कई दिनों से बीमार हैं। अगर समय मिले तो एक बार आ जाना।" अनन्या ने जल्दी में कहा, "माँ, बस दो दिन और। यह शूट खत्म होते ही आ जाऊँगी।" लेकिन वे दो दिन दो हफ्तों में बदल गए।
इसी बीच एक रात उसे फिर फोन आया। इस बार गाँव के पड़ोसी बोल रहे थे। "बिटिया... जल्दी आ जाओ।" अनन्या जब तक पहुँची, पिता हमेशा के लिए जा चुके थे। वह पिता के चरणों में सिर रखकर फूट-फूटकर रोती रही।
पिता की चिता के सामने बैठी आर्या को पहली बार एहसास हुआ कि उसने सफलता की दौड़ में कितना कुछ खो दिया।लौटते समय गाँव की पगडंडी पर चलते हुए उसे लगा कि यह मिट्टी आज भी वैसी ही है, बदल तो सिर्फ़ वह गई है। मुंबई लौटने के बाद उसने कई दिनों तक कोई काम नहीं किया।
उसने अपने कमरे के आईने पर एक पर्ची चिपका दी "जिस सफलता की कीमत अपने लोग हों, वह सफलता नहीं, सौदा है।" यही वाक्य उसके जीवन का नया मंत्र बन गया।
उसकी आँखों के सामने बचपन की यादें घूमने लगीं पिता का उंगली पकड़कर स्कूल छोड़ना, मेले से गुड़िया खरीदकर लाना, पहली बार शहर भेजते समय कहा था "बेटी, चाहे जितनी बड़ी बन जाना, अपने लोगों को कभी मत भूलना।
संघर्ष आसान नहीं था। छोटे-छोटे ऑडिशन, रिजेक्शन, किराए का कमरा, भूखे पेट बिताई गई रातें और टूटते हुए सपने। लेकिन उसने हार नहीं मानी। कई वर्षों की मेहनत के बाद एक फिल्म ने उसकी किस्मत बदल दी। फिर सफलता का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ कि पीछे मुड़कर देखने का समय ही नहीं मिला। "उस दिन अनन्या को एहसास हुआ कि उसने सफलता तो पा ली, लेकिन जीवन का सबसे अनमोल रिश्ता खो दिया।
मुंबई लौटने के बाद उसने कई दिनों तक खुद को कमरे में बंद रखा। पहली बार उसने आईने में खुद को देखा। चेहरे पर वही चमक थी, लेकिन आँखों में गहरा खालीपन था। कुछ दिनों बाद वह बिना किसी सुरक्षा के शहर की सड़कों पर निकल पड़ी। उसने देखा एक रिक्शा चालक अपने छोटे बेटे के साथ हँसते हुए चाय पी रहा था। पास ही एक मजदूर परिवार सूखी रोटी खाकर भी खिलखिला रहा था।
अनन्या सोचने लगी "इनके पास कुछ नहीं है, फिर भी ये खुश हैं। मेरे पास सब कुछ है, फिर मैं इतनी अकेली क्यों हूँ?" उस रात उसने एक बड़ा फैसला लिया। उसने फिल्मों की संख्या कम कर दी। अपने गाँव में पिता के नाम से एक विद्यालय और एक अस्पताल बनवाया। माँ को मुंबई बुलाने के बजाय वह हर महीने गाँव जाने लगी। खेतों की मिट्टी में नंगे पैर चलती, बच्चों के साथ खेलती और बुज़ुर्गों की बातें सुनती।
धीरे-धीरे उसके चेहरे की मुस्कान लौट आई। एक दिन एक पत्रकार ने उससे पूछा, "मैडम, आपने अपने करियर की रफ्तार क्यों कम कर दी?"
अनन्या मुस्कुराई और बोली, "मैं पहले दुनिया की नजरों में सफल थी, लेकिन अपने दिल की नजरों में हार चुकी थी। अब मैं कम कमाती हूँ, लेकिन सुकून ज़्यादा कमाती हूँ।" उसका यह जवाब अगले दिन अखबारों की सुर्खियाँ बन गया।
समय बीतता गया। अनन्या ने अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा गरीब बच्चों की शिक्षा और बुज़ुर्गों की सेवा में लगाना शुरू कर दिया। अब लोग उसे केवल एक अभिनेत्री नहीं, बल्कि एक संवेदनशील इंसान के रूप में भी पहचानने लगे।
एक शाम वह फिर अपने गाँव के उसी खेत में बैठी थी, जहाँ कभी पिता के साथ खेला करती थी। हवा धीरे-धीरे बह रही थी। डूबते सूरज की लालिमा पूरे आसमान में फैल गई थी।
उसने आँखें बंद कीं। उसे लगा जैसे पिता की आवाज़ फिर सुनाई दे रही हो, "बेटी... अब तुम्हारी जिंदगी सच में पूरी हो गई। "अनन्या की आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन इस बार ये आँसू दुख के नहीं, आत्मसंतोष के थे।
उसे समझ आ गया था कि चमकती दुनिया की सबसे बड़ी रोशनी कैमरों की फ्लैश नहीं, बल्कि अपनों के प्रेम और मन की शांति होती है। जीवन में पैसा, प्रसिद्धि और सफलता महत्वपूर्ण हैं, लेकिन यदि उनके लिए अपने रिश्ते, परिवार, संवेदनाएँ और आत्मिक शांति खो दी जाए, तो जीवन अधूरा रह जाता है। सच्ची समृद्धि वहीं है जहाँ प्रेम, अपनापन, सेवा और संतोष हो। चमक-दमक क्षणिक होती है, लेकिन रिश्तों की रोशनी जीवनभर साथ रहती है।
- ( लेखक स्वतंत्र एवं सामाजिक विश्लेषक)
