श्रावण में धरती पर उतर आती है शिव की अनुभूति

 विनोद कुमार झा 

"हर-हर महादेव... बोल बम..."

जैसे ही श्रावण मास की पहली भोर दस्तक देती है, भारत की आत्मा मानो एक साथ जाग उठती है। मंदिरों की घंटियां, शिवालयों में गूंजते मंत्र, कांवड़ियों के कदमों की लय और "बोल बम" के गगनभेदी उद्घोष पूरे वातावरण को शिवमय बना देते हैं। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की सामूहिक आस्था का ऐसा विराट उत्सव है, जिसमें धर्म, संस्कृति, प्रकृति और मानवता एक सूत्र में बंध जाते हैं।

ऐसा लगता है मानो कैलाश पर्वत से स्वयं भगवान भोलेनाथ अपने भक्तों का उत्साह बढ़ाने धरती पर उतर आए हों। कांवड़ में बंधे छोटे-छोटे घुंघरुओं की मधुर झंकार किसी साधारण ध्वनि की तरह नहीं सुनाई देती; वह मानो शिव के डमरू की गूंज बन जाती है। कांवड़ियों के बढ़ते कदमों के साथ ऐसा आभास होता है कि नंदी पर विराजमान भगवान शिव स्वयं अपने भक्तों के साथ चल रहे हैं। हर थकान के पीछे भक्ति है, हर कदम में विश्वास है और हर स्वर में शिव का स्मरण।

श्रावण का महीना प्रकृति के सौंदर्य का भी उत्सव है। वर्षा से धुली धरती, खेतों की हरियाली, वृक्षों पर झूमती पत्तियां, मिट्टी की सोंधी महक और ठंडी हवाओं का स्पर्श ऐसा अनुभव कराता है, मानो प्रकृति स्वयं भगवान शिव का अभिषेक कर रही हो। भारतीय संस्कृति ने शायद इसी कारण शिव को प्रकृति का देवता माना है जो हिमालय में निवास करते हैं, जिनकी जटाओं में गंगा बहती है, जिनके मस्तक पर चंद्रमा है और जिनके गले में सर्प विराजमान है। शिव का स्वरूप हमें प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है।

कांवड़ यात्रा केवल गंगाजल लाने का मार्ग नहीं है, बल्कि आत्मविश्वास, अनुशासन और समर्पण की कठिन साधना है। नंगे पांव सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा, बारिश की फुहारें, धूप की तपिश और शारीरिक थकान इन सबके बावजूद कांवड़ियों के चेहरे पर मुस्कान बनी रहती है। उनके लिए मंजिल से अधिक महत्वपूर्ण वह विश्वास होता है, जो उन्हें हर कदम पर आगे बढ़ाता है।

इस यात्रा का सबसे सुंदर पक्ष सामाजिक समरसता है। यहां न कोई अमीर है, न गरीब; न जाति का भेद है, न पद का। हर व्यक्ति केवल "भोले का भक्त" बन जाता है। रास्तों में लगने वाले सेवा शिविर भारतीय संस्कृति के उस मानवीय स्वरूप को जीवंत करते हैं, जहां बिना किसी स्वार्थ के भोजन, पानी, दवा और विश्राम की व्यवस्था की जाती है। सेवा करने वाला भी धन्य होता है और सेवा स्वीकार करने वाला भी। यही भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान है।

श्रावण के सोमवारों का महत्व सदियों से भारतीय जनमानस में विशेष रहा है। सुबह से ही मंदिरों में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग जाती हैं। गंगाजल, बेलपत्र, धतूरा, भांग, अक्षत और पुष्प अर्पित कर भक्त भगवान शिव का रुद्राभिषेक करते हैं। यह विश्वास केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर आशा का दीप जलाए रखने की शक्ति भी है। भगवान शिव को आशुतोष कहा गया है जो सच्ची श्रद्धा से शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों का कल्याण करते हैं।

आज जब समाज तेज़ी से बदल रहा है, रिश्तों में दूरियां बढ़ रही हैं और जीवन भागदौड़ का पर्याय बनता जा रहा है, तब श्रावण हमें ठहरकर अपने भीतर झांकने का अवसर देता है। यह महीना सिखाता है कि जीवन का वास्तविक सुख संग्रह में नहीं, समर्पण में है; प्रतिस्पर्धा में नहीं, करुणा में है; और अहंकार में नहीं, विनम्रता में है।

भगवान शिव का व्यक्तित्व भी यही संदेश देता है। वे देवों के देव होते हुए भी सबसे सरल हैं। वे राजमहलों में नहीं, कैलाश की वादियों में रहते हैं। उनके आभूषण स्वर्ण और रत्न नहीं, बल्कि सर्प, रुद्राक्ष और भस्म हैं। समुद्र मंथन का विष स्वयं पीकर उन्होंने संसार को बचाया। उनका जीवन बताता है कि सच्चा नेतृत्व वही है, जो दूसरों के कष्ट अपने ऊपर लेने का साहस रखता हो।

श्रावण इसलिए भी विशेष है क्योंकि यह केवल पूजा-पाठ का महीना नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, सेवा, संयम, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक एकता का भी संदेश देता है। कांवड़ियों की यात्रा हमें बताती है कि जब लक्ष्य पवित्र हो तो कठिन रास्ते भी सरल लगने लगते हैं।

जब संध्या के समय किसी मंदिर से घंटियों की ध्वनि सुनाई देती है और दूर कहीं से "हर-हर महादेव" का स्वर हवा में तैरता हुआ कानों तक पहुंचता है, तब सहज ही महसूस होता है कि श्रावण केवल पंचांग का एक महीना नहीं है। यह भारत की आत्मा का उत्सव है। यह वह समय है, जब करोड़ों दिल एक साथ शिव का स्मरण करते हैं और पूरा देश भक्ति, सेवा और सद्भाव के रंग में रंग जाता है।

श्रावण हमें हर वर्ष यही याद दिलाता है कि यदि मन में श्रद्धा, कर्म में सेवा और जीवन में विनम्रता हो, तो शिव केवल मंदिरों में नहीं, हर हृदय में विराजमान हो जाते हैं। और तब "बोल बम" का उद्घोष केवल आवाज़ नहीं रहता, बल्कि जीवन जीने का मंत्र बन जाता है।

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