खटाहड़ा गाड़ी, चमकदार पर्दा

 लेखक: विनोद कुमार झा 

गाँव के बाहर कच्ची सड़क के किनारे एक पुरानी, जर्जर और जगह-जगह से टूटी हुई गाड़ी खड़ी रहती थी। उसकी रंगत उड़ चुकी थी, पहियों में जंग लग चुका था और इंजन भी किसी बूढ़े आदमी की तरह खाँसता हुआ चलता था। गाँव के बच्चे उसे देखकर हँसते और कहते, "लो आ गई खटाहड़ा गाड़ी!"

उस गाड़ी का मालिक था रामप्रसाद। उम्र लगभग साठ वर्ष, चेहरे पर झुर्रियाँ और आँखों में संघर्ष की अनगिनत कहानियाँ। वह उसी पुरानी गाड़ी से गाँव-गाँव जाकर सब्जियाँ बेचता था। उसकी पत्नी सावित्री कई वर्षों से बीमार थी और इकलौता बेटा मोहन शहर में नौकरी की तलाश में भटक रहा था।

रामप्रसाद की गाड़ी भले ही पुरानी थी, लेकिन वह उसे अपनी संतान की तरह संभालता था। हर सुबह उसे साफ करता, पहियों में हवा भरता और फिर सब्जियों से लादकर निकल पड़ता। लोगों को आश्चर्य होता कि इतनी पुरानी गाड़ी से आखिर कोई इतना प्रेम कैसे कर सकता है।

एक दिन गाँव में एक नया परिवार आकर बस गया। उनके पास एक बड़ी चमचमाती कार थी। कार इतनी सुंदर थी कि पूरा गाँव उसे देखने उमड़ पड़ा। बच्चे उसके आसपास मंडराने लगे। गाँव के लोग उसकी तारीफ करते नहीं थकते थे।

रामप्रसाद जब अपनी पुरानी गाड़ी लेकर वहाँ से गुजरा तो कुछ युवकों ने मजाक उड़ाया।

"रामू काका, अब आपकी खटाहड़ा गाड़ी का जमाना गया। देखिए कैसी चमकदार कार आई है!" सब लोग हँस पड़े।

रामप्रसाद मुस्कुराया और बोला, "बेटा, चमक हमेशा काम नहीं आती। असली कीमत साथ निभाने की होती है।" लोगों ने उसकी बात को गंभीरता से नहीं लिया।

कुछ दिनों बाद गाँव में मेले का आयोजन हुआ। नए परिवार ने अपनी चमकदार कार को रंग-बिरंगी लाइटों और सुंदर पर्दों से सजाया। वह कार मेले का आकर्षण बन गई। दूसरी ओर रामप्रसाद अपनी पुरानी गाड़ी में सब्जियाँ और कुछ जरूरत का सामान लेकर पहुँचा।

मेले के दौरान अचानक मौसम बदल गया। तेज आँधी और बारिश शुरू हो गई। लोगों में अफरा-तफरी मच गई। उसी समय खबर आई कि गाँव के एक गरीब किसान की पत्नी को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हो गई है। उसे तुरंत कस्बे के अस्पताल ले जाना जरूरी था।

गाँव वाले चमचमाती कार के मालिक के पास पहुँचे। "भाई साहब, कृपया अपनी कार दे दीजिए। एक महिला की जान का सवाल है।"

कार के मालिक ने कार की ओर देखा और बोला, "माफ कीजिए, अभी-अभी कार सजाई है। बारिश में कहीं खराब हो गई तो?"

लोग निराश होकर लौटने लगे। तभी रामप्रसाद आगे आया और बोला  "मेरी गाड़ी ले चलो।" एक युवक बोला, "काका, यह खटाहड़ा गाड़ी रास्ते में बंद हो जाएगी।"

रामप्रसाद ने दृढ़ता से कहा, "कोशिश करने में क्या हर्ज है?"

महिला को सावधानी से गाड़ी में बैठाया गया। बारिश तेज थी। सड़क कीचड़ से भर चुकी थी। गाड़ी कई बार हिचकोले खाती, कभी रुकती, कभी चलती। रामप्रसाद का दिल भी इंजन की तरह धड़क रहा था।

आखिरकार वे अस्पताल पहुँच गए। समय पर इलाज मिलने से महिला और नवजात दोनों सुरक्षित बच गए।

अगले दिन यह खबर पूरे गाँव में फैल गई। जो लोग कल तक उस गाड़ी का मजाक उड़ाते थे, वही उसकी प्रशंसा कर रहे थे।

कुछ दिनों बाद ग्राम पंचायत ने रामप्रसाद का सम्मान समारोह रखा। मंच पर उसे शॉल और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया।

अपने संबोधन में सरपंच ने कहा, "हम सबने चमकदार पर्दों और बाहरी सुंदरता को महत्व दिया, लेकिन कल यह साबित हो गया कि असली मूल्य सेवा, त्याग और इंसानियत का होता है।"

सभा में बैठे लोग तालियाँ बजाने लगे। उसी समय चमचमाती कार का मालिक भी मंच पर आया। उसकी आँखों में शर्म थी।

उसने कहा, "रामप्रसाद जी, मैंने आपकी गाड़ी को खटाहड़ा समझकर उसकी कीमत नहीं पहचानी। कल आपकी गाड़ी ने वह काम किया जो मेरी चमकदार कार नहीं कर सकी। मुझे क्षमा कर दीजिए।" रामप्रसाद मुस्कुराया।

"क्षमा माँगने की जरूरत नहीं है भाई। हम सब सीखते ही तो रहते हैं।" समय बीतता गया। मोहन को शहर में नौकरी मिल गई। घर की आर्थिक स्थिति भी सुधरने लगी। उसने अपने पिता के लिए नई गाड़ी खरीदने का निश्चय किया।

जब नई गाड़ी घर आई तो पूरे गाँव के लोग देखने पहुँचे। मोहन ने खुशी से कहा, "पिताजी, अब इस पुरानी गाड़ी को बेच देते हैं।"

रामप्रसाद कुछ देर चुप रहा। उसने अपनी पुरानी गाड़ी पर हाथ फेरा। "बेटा, यह सिर्फ गाड़ी नहीं है। यह हमारे संघर्षों की साथी है। इसने भूख के दिनों में हमारा पेट भरा है, बीमारी में साथ दिया है और एक परिवार की जान बचाई है। इसे बेचना मेरे बस की बात नहीं।"

मोहन की आँखें भर आईं। उसने कहा, "ठीक कहा पिताजी। कुछ चीजों की कीमत पैसों से नहीं लगाई जा सकती।"

इसके बाद पुरानी गाड़ी को घर के आँगन में सम्मानपूर्वक रखा गया। बच्चे जब भी उसके बारे में पूछते, रामप्रसाद उन्हें उसकी कहानी सुनाता।

धीरे-धीरे "खटाहड़ा गाड़ी" गाँव में सम्मान का प्रतीक बन गई। लोग समझ गए कि चमकदार पर्दे और बाहरी सजावट किसी वस्तु या इंसान की असली पहचान नहीं होते। असली पहचान उसके कर्म, उसके त्याग और उसके द्वारा निभाए गए रिश्तों से बनती है।

 जीवन में अक्सर लोग बाहरी चमक-दमक देखकर निर्णय ले लेते हैं, लेकिन वास्तविक मूल्य रूप, रंग और सजावट में नहीं, बल्कि उपयोगिता, निष्ठा, सेवा और इंसानियत में छिपा होता है। कई बार एक "खटाहड़ा गाड़ी" भी वह काम कर जाती है जो "चमकदार पर्दों" के पीछे छिपी बड़ी-बड़ी चीजें नहीं कर पातीं।

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