लेखक: विनोद कुमार झा
एक छोटे से कस्बे में स्थित आदर्श विद्या मंदिर विद्यालय अपनी अनुशासनप्रियता और उत्कृष्ट शिक्षा के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। विद्यालय के प्रधानाचार्य और वरिष्ठ शिक्षक आचार्य विद्याभूषण केवल पुस्तकीय ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन का ज्ञान भी बच्चों को दिया करते थे। उनकी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे हमेशा उत्सुक रहते थे कि आज गुरुजी कौन-सी नई बात सिखाने वाले हैं।
एक दिन सुबह की प्रार्थना के बाद आचार्य विद्याभूषण अपनी कक्षा में पहुँचे। उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। बच्चे समझ गए कि आज कुछ विशेष होने वाला है। गुरुजी ने उपस्थिति दर्ज करने के बाद ब्लैकबोर्ड पर बड़े अक्षरों में लिखा था "सवालों में क्या रखा है, जवाब दो!"
फिर उन्होंने बच्चों की ओर देखते हुए पूछा, "बताओ बच्चों, सवालों में क्या रखा है?"
पूरी कक्षा में सन्नाटा छा गया। बच्चों ने एक-दूसरे की ओर देखा। किसी को समझ नहीं आया कि गुरुजी क्या पूछ रहे हैं।कुछ क्षण बाद मोहन खड़ा हुआ और बोला, "गुरुजी, सवालों में ज्ञान छिपा होता है।"
गुरुजी मुस्कुराए, "अच्छा जवाब है, लेकिन पूरा नहीं।"
फिर सीमा बोली, "गुरुजी, सवालों में जिज्ञासा होती है।"
"बहुत बढ़िया," गुरुजी ने कहा, "लेकिन अभी भी उत्तर अधूरा है।" अब एक-एक करके कई बच्चे खड़े हुए। किसी ने कहा सवालों में सीख होती है, किसी ने कहा परीक्षा होती है, तो किसी ने कहा सफलता का रास्ता होता है। लेकिन गुरुजी हर बार यही कहते, "उत्तर अच्छा है, पर पूरा नहीं।"
आखिरकार पूरी कक्षा परेशान हो गई। बच्चों को लगने लगा कि शायद गुरुजी ऐसा प्रश्न पूछ रहे हैं जिसका उत्तर देना असंभव है। तभी कक्षा के सबसे शांत विद्यार्थी रवि ने हाथ उठाया। गुरुजी ने उसे खड़े होने का संकेत दिया।
रवि बोला, "गुरुजी, सवालों में चाहे जो कुछ भी रखा हो, लेकिन अगर हम जवाब ही न दें तो सवाल का कोई अर्थ नहीं रह जाता।" यह सुनते ही गुरुजी के चेहरे पर संतोष झलक उठा।
उन्होंने कहा, "शाबाश रवि! तुमने बात की जड़ पकड़ ली।" सभी बच्चे उत्सुकता से गुरुजी की ओर देखने लगे। गुरुजी ने समझाना शुरू किया, "बच्चों, जीवन में लोग अक्सर सवालों में उलझे रहते हैं। वे पूछते हैं कि सफलता कैसे मिलेगी? सम्मान कैसे मिलेगा? खुशी कहाँ मिलेगी? लेकिन वे जवाब खोजने का प्रयास नहीं करते। केवल सवाल पूछने से कुछ नहीं होता, जवाब ढूँढ़ना पड़ता है।"
उन्होंने आगे कहा, "मान लो किसान यह पूछता रहे कि फसल कैसे होगी, लेकिन खेत में बीज ही न बोए, तो क्या फसल उग जाएगी? नहीं। विद्यार्थी यह पूछता रहे कि अच्छे अंक कैसे आएँगे, लेकिन पढ़ाई न करे, तो क्या सफलता मिलेगी? नहीं। "बच्चे ध्यानपूर्वक सुन रहे थे।
गुरुजी ने एक और उदाहरण दिया। उन्होंने मेज पर रखी पानी की बोतल उठाई और पूछा, "यदि किसी प्यासे व्यक्ति के सामने पानी रखा हो और वह केवल यह पूछता रहे कि प्यास कैसे बुझेगी, तो क्या उसकी प्यास बुझ जाएगी?"
"नहीं गुरुजी!" पूरी कक्षा एक साथ बोली।
"क्यों?" "क्योंकि उसे पानी पीना होगा।" "बिल्कुल सही," गुरुजी ने कहा, "यही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है। सवाल रास्ता दिखाते हैं, लेकिन मंजिल तक जवाब और कर्म ही पहुँचाते हैं।" उस दिन की कक्षा समाप्त हो गई, लेकिन बच्चों के मन में गुरुजी की बात घर कर गई।
कुछ दिनों बाद विद्यालय में वार्षिक परीक्षा की घोषणा हुई। कई बच्चे घबरा गए। वे बार-बार पूछ रहे थे कि अच्छे अंक कैसे आएँगे, कौन-से प्रश्न आएँगे, कितना कठिन पेपर होगा।
तभी रवि ने अपने मित्रों से कहा, "गुरुजी की बात याद है? सवालों में क्या रखा है? जवाब दो।" "मतलब?" मोहन ने पूछा।
रवि बोला, "मतलब यह कि यह पूछने के बजाय कि परीक्षा कैसी होगी, हमें तैयारी करनी चाहिए। यही असली जवाब है। "बात सबकी समझ में आ गई। बच्चों ने मिलकर पढ़ाई शुरू कर दी। वे एक-दूसरे की मदद करने लगे। किसी को गणित में कठिनाई होती तो दूसरा समझाता, किसी को विज्ञान में समस्या होती तो सभी मिलकर हल निकालते।
कुछ महीनों बाद परीक्षा के परिणाम आए। इस बार विद्यालय का परिणाम पहले से कहीं बेहतर था। कई विद्यार्थियों ने उत्कृष्ट अंक प्राप्त किए।
परिणाम वितरण समारोह में गुरुजी ने बच्चों को संबोधित करते हुए कहा, "आज तुम सबने सिद्ध कर दिया कि सफलता केवल प्रश्न पूछने से नहीं मिलती। सफलता तब मिलती है जब हम उत्तर खोजते हैं और उस पर कार्य करते हैं।"
फिर उन्होंने वही वाक्य दोहराया "सवालों में क्या रखा है, जवाब दो।" बच्चों ने एक स्वर में कहा, "गुरुजी, अब हम समझ गए हैं कि जीवन में केवल प्रश्न नहीं, बल्कि उनके उत्तर खोजने और उन पर अमल करने का महत्व है।"
गुरुजी की आँखों में संतोष था। उन्हें विश्वास हो गया था कि उनके विद्यार्थी केवल पढ़े-लिखे नहीं, बल्कि समझदार इंसान भी बनेंगे।
उस दिन के बाद विद्यालय में जब भी कोई बच्चा किसी कठिनाई को लेकर केवल शिकायत करता या बार-बार प्रश्न पूछता, तो उसके मित्र मुस्कुराकर कहते "सवालों में क्या रखा है, जवाब दो!" और यही वाक्य धीरे-धीरे पूरे विद्यालय का प्रेरणादायक मंत्र बन गया।
जीवन में केवल समस्याओं और सवालों पर चर्चा करने से कुछ नहीं बदलता। सफलता उन लोगों को मिलती है जो उत्तर खोजते हैं, निर्णय लेते हैं और कर्म करते हैं।
