लेखक: विनोद कुमार झा
एक छोटे से गाँव हरिपुर में रामदुलारी नाम की एक महिला रहती थी। गाँव में उसकी पहचान किसी अमीर या बड़े घराने की महिला के रूप में नहीं थी, बल्कि एक मेहनती, हँसमुख और स्वादिष्ट भोजन बनाने वाली गृहिणी के रूप में थी। उसके पति हरिराम खेतों में मजदूरी करते थे और जो कुछ कमाई होती, उसी से परिवार का गुजारा चलता। घर में दो बच्चे थे बड़ा बेटा गोपाल और छोटी बेटी रानी।
रामदुलारी का घर मिट्टी का बना हुआ था। बरामदे में एक पुरानी चारपाई, कोने में रखा चूल्हा और आँगन में कुछ सब्जियों के पौधे उसकी दुनिया थे। आर्थिक तंगी हमेशा बनी रहती थी, लेकिन उसके चेहरे पर कभी शिकन नहीं दिखती थी। वह अक्सर कहा करती थी, "गरीबी थाली में हो सकती है, मन में नहीं।"
एक बार की बात है। लगातार कई दिनों से बारिश होने के कारण हरिराम को मजदूरी नहीं मिली थी। घर में रखा अनाज भी लगभग समाप्त हो चुका था। रामदुलारी ने रसोई में रखे डिब्बों को एक-एक करके देखा। गेहूँ थोड़ा-सा बचा था, चावल खत्म हो चुके थे और सब्जियों का नामोनिशान नहीं था। केवल एक डिब्बे में आधा कटोरा मूंग दाल बची थी।
शाम को बच्चे खेलकर घर लौटे। गोपाल ने आते ही पूछा, "अम्मा, आज खाने में क्या बनेगा?"
रामदुलारी ने मुस्कुराकर कहा, "आज तो राजा-महाराजाओं वाला भोजन बनेगा।"
रानी खुशी से उछल पड़ी, "सच अम्मा? क्या पूड़ी-कचौड़ी बनेगी?"
रामदुलारी हँसते हुए बोली, "उससे भी स्वादिष्ट।" बच्चे उत्सुक हो गए। उधर हरिराम भी दिनभर काम न मिलने से थोड़ा उदास था। उसे चिंता थी कि अगले कुछ दिन घर कैसे चलेगा।
रामदुलारी ने मूंग दाल धोकर चूल्हे पर चढ़ा दी। दाल पकने लगी। तभी उसकी नजर आँगन में लगे धनिये के छोटे-छोटे पौधों पर पड़ी। पिछले महीने उसने कुछ धनिये के बीज छिड़क दिए थे और अब हरी-हरी पत्तियाँ लहरा रही थीं।
उसने तुरंत ताजा धनिया तोड़ा, साफ पानी से धोया और बारीक काट लिया। फिर मिट्टी की हांडी में थोड़ा-सा देसी घी डाला। घी गर्म हुआ तो उसमें जीरा, हींग और सूखी लाल मिर्च डाली। जैसे ही मसाले चटखने लगे, उसने कटे हुए धनिये को डाल दिया।क्षणभर में ऐसी सुगंध फैली कि पूरा घर महक उठा।
दाल तैयार थी। रामदुलारी ने वह गरमागरम छौंक दाल में डाल दिया। चूल्हे से उठती खुशबू इतनी लाजवाब थी कि पड़ोस की कमला चाची अपने घर से निकलकर सीधी रामदुलारी के आँगन में आ पहुँचीं।
"अरी रामदुलारी! आज क्या बना रही है? खुशबू तो पूरे मोहल्ले में फैल रही है।" रामदुलारी ने मुस्कुराते हुए कहा, "कुछ खास नहीं चाची, बस मूंग दाल है और धनिये का छौंक।"
कमला चाची ने आश्चर्य से कहा, "इतनी सी दाल से इतनी शानदार खुशबू?"
उन्होंने कटोरी में थोड़ा-सा चखा और उनकी आँखें चमक उठीं। "वाह! यह तो सचमुच कमाल है।"
अगले दिन यह बात पूरे गाँव में फैल गई। लोग कहने लगे कि रामदुलारी ने साधारण मूंग दाल को ऐसा स्वाद दिया कि सब उँगलियाँ चाटते रह गए।
गाँव में ही लाला बद्रीप्रसाद नाम का एक व्यापारी रहता था। वह अपने धन और शानो-शौकत पर बहुत घमंड करता था। जब उसने यह चर्चा सुनी तो हँस पड़ा।
"अरे भई! मूंग दाल में भी कोई स्वाद होता है? लोग तो बेकार ही तारीफ कर रहे हैं।" यह बात रामदुलारी तक पहुँची, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
कुछ दिनों बाद गाँव में मंदिर के वार्षिक उत्सव की तैयारी शुरू हुई। पूरे गाँव के लिए सामूहिक भोज रखा जाना था। प्रधान जी ने घोषणा की कि इस बार भोजन बनाने की जिम्मेदारी रामदुलारी संभालेगी।
लाला बद्रीप्रसाद ने तुरंत विरोध किया। "एक गरीब औरत क्या भोज बनाएगी? इतने लोगों के लिए खाना बनाना कोई खेल नहीं है।"
लेकिन गाँव वालों को रामदुलारी की कला पर भरोसा था। उत्सव का दिन आया। सुबह से ही बड़े-बड़े भगोनों में खाना बनने लगा। सब्जी, चावल और रोटियों के साथ रामदुलारी ने अपनी प्रसिद्ध मूंग दाल भी बनाई।
जब दाल तैयार हुई तो उसने उसी अंदाज में ताजे धनिये का छौंक लगाया। पूरे मंदिर परिसर में ऐसी सुगंध फैली कि लोग बार-बार पूछने लगे-"खाना कब परोसा जाएगा?"
दोपहर को भोज शुरू हुआ। गाँव के सैकड़ों लोगों ने भोजन किया। सबसे अधिक प्रशंसा दाल की हुई। एक बुजुर्ग बोले, "जीवन में इतनी स्वादिष्ट दाल नहीं खाई।" दूसरे व्यक्ति ने कहा, "लगता है इसमें कोई जादू है।"
लाला बद्रीप्रसाद भी वहीं बैठा था। उसने दाल चखी तो कुछ क्षणों के लिए चुप रह गया। फिर बोला, "रामदुलारी, सच बताओ, इसमें ऐसा क्या डाला है?"
रामदुलारी मुस्कुराई। "कुछ नहीं लाला जी। मूंग दाल, थोड़ा घी, थोड़ा धनिया और भरपूर प्रेम।" लोग हँस पड़े। लेकिन उसके शब्दों में गहरी सच्चाई थी।
समय बीतता गया। रामदुलारी की चर्चा आसपास के गाँवों तक पहुँच गई। लोग उससे खाना बनाने की सलाह लेने आने लगे। कोई पूछता कि स्वादिष्ट भोजन का रहस्य क्या है, तो कोई पूछता कि कम खर्च में अच्छा खाना कैसे बनाया जाए।
हर बार उसका एक ही जवाब होता- "संसाधन कम हों तो निराश मत होइए। जो उपलब्ध है, उसी में अपना सर्वश्रेष्ठ दीजिए। मूंग दाल में धनिये का छौंक भी चमत्कार कर सकता है।" धीरे-धीरे यह वाक्य पूरे इलाके में प्रसिद्ध हो गया।
जब कोई व्यक्ति सीमित साधनों में कोई शानदार काम कर देता, लोग कहते- "वाह! यह तो मूंग दाल में धनिया का छौंक लगा दिया।"
वर्षों बाद गोपाल पढ़-लिखकर शिक्षक बन गया और रानी नर्स। जब भी उनसे सफलता का रहस्य पूछा जाता, वे अपनी माँ की कहानी सुनाते।
गोपाल कहा करता था-"हमारे घर में धन नहीं था, लेकिन माँ ने हमें सिखाया कि जीवन में छोटी-सी अच्छी बात भी बड़ा बदलाव ला सकती है। जैसे साधारण मूंग दाल में धनिये का छौंक स्वाद भर देता है, वैसे ही मेहनत, ईमानदारी और सकारात्मक सोच जीवन को सुंदर बना देती है।"
आज भी हरिपुर गाँव के लोग रामदुलारी को याद करते हैं। उसकी बनाई दाल का स्वाद शायद समय के साथ लोगों की जुबान से मिट गया हो, लेकिन उसकी सीख आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है-"जीवन में बड़े चमत्कार हमेशा बड़े साधनों से नहीं होते। कई बार छोटी-सी कोशिश, थोड़ा-सा प्रेम और सही समय पर लगाया गया 'धनिये का छौंक' साधारण जीवन को असाधारण बना देता है।"
शिक्षा: किसी कार्य की सफलता केवल बड़े संसाधनों पर निर्भर नहीं होती। लगन, प्रेम, बुद्धिमानी और छोटी-छोटी सकारात्मक बातें भी साधारण काम को यादगार बना सकती हैं।
