-कुछ रिश्ते किस्मत लिखती है तो कुछ अचानक मिलते हैं और चुपचाप दिल में बस जाते हैं
लेखक: विनोद कुमार झा
दिल्ली की भागती-दौड़ती जिंदगी में हर चेहरा किसी न किसी चिंता से घिरा दिखाई देता था। उन्हीं चेहरों में एक चेहरा था आर्या का। बड़ी-बड़ी आंखें, चेहरे पर सादगी और दिल में अनगिनत सपने। वह एक छोटे से गांव से दिल्ली नौकरी करने आई थी। पिता की बीमारी और घर की जिम्मेदारियों ने उसे समय से पहले ही समझदार बना दिया था।
आर्या एक प्रकाशन कंपनी में काम करती थी। सुबह की मेट्रो, ऑफिस की फाइलें और शाम की थकान यही उसकी जिंदगी बन चुकी थी। उसे लगता था कि उसकी जिंदगी में अब खुशियों के लिए कोई जगह नहीं बची। वह बस अपने परिवार के लिए जी रही थी।
उसी ऑफिस में नया कर्मचारी आया अभय। शांत स्वभाव, आंखों में आत्मविश्वास और चेहरे पर हमेशा मुस्कान। ऑफिस में हर कोई उसकी तारीफ करता था, लेकिन आर्या उससे हमेशा दूरी बनाकर रखती। उसे लगता था कि शहर के लोग केवल दिखावे के होते हैं।
एक दिन ऑफिस से लौटते समय अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। मेट्रो स्टेशन के बाहर भीड़ लगी थी। आर्या छत के नीचे खड़ी बारिश रुकने का इंतजार कर रही थी। तभी अभय उसके पास आया और मुस्कुराते हुए बोला, “अगर आप चाहें तो मेरी छतरी में आ सकती हैं। वरना ये बारिश आज घर नहीं पहुंचने देगी।”
आर्या ने पहले मना किया, लेकिन बारिश बढ़ती गई। आखिरकार वह उसके साथ चल पड़ी। रास्ते भर दोनों चुप रहे, लेकिन उस खामोशी में भी एक अजीब अपनापन था।
धीरे-धीरे दोनों की बातचीत शुरू होने लगी। कभी चाय पर, कभी ऑफिस की छोटी-छोटी बातों पर। अभय को आर्या की सादगी पसंद आने लगी, और आर्या को अभय का अपनापन। मगर दोनों में से किसी ने कभी अपने दिल की बात नहीं कही।
एक दिन आर्या को गांव से फोन आया। उसके पिता की तबीयत बहुत खराब थी। वह घबराकर रोने लगी। ऑफिस में सब लोग अपने काम में व्यस्त थे, लेकिन अभय ने बिना कुछ पूछे उसका हाथ थाम लिया और बोला, “घबराइए मत, सब ठीक होगा। मैं आपके साथ हूं।”
उस एक वाक्य ने आर्या के दिल में वर्षों से जमी बर्फ पिघला दी। उसे पहली बार महसूस हुआ कि इस अनजाने शहर में कोई ऐसा भी है जो बिना किसी स्वार्थ के उसका साथ देना चाहता है। अभय उसके साथ गांव गया। अस्पताल के चक्कर लगाए, दवाइयों की व्यवस्था की और हर मुश्किल वक्त में उसके परिवार के साथ खड़ा रहा। आर्या की मां अक्सर कहतीं, “बेटा, भगवान हर किसी को तुम्हारे जैसा सहारा दे।”
धीरे-धीरे आर्या को एहसास हुआ कि अभय केवल उसका दोस्त नहीं, उसकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा बन चुका है। मगर उसके मन में डर भी था कहीं यह रिश्ता भी टूट न जाए।
एक शाम गांव के खेतों के पास दोनों बैठे थे। हवा में मिट्टी की खुशबू घुली हुई थी। सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था। तभी अभय ने धीमी आवाज में कहा, “आर्या, जिंदगी में कुछ रिश्ते बिना बताए दिल में उतर जाते हैं। मुझे नहीं पता यह कब हुआ, लेकिन अब तुम्हारे बिना हर खुशी अधूरी लगती है।”
आर्या की आंखें नम हो गईं। उसने पहली बार अपने दिल की बात कही, “मुझे हमेशा लगता था कि प्यार केवल कहानियों में होता है। लेकिन तुमने सिखाया कि सच्चा प्यार बिना शोर के भी जिंदगी बदल देता है।” उस दिन दोनों ने कोई बड़ा वादा नहीं किया, कोई फिल्मी कसमें नहीं खाईं। बस एक-दूसरे का हाथ थाम लिया। वही हाथ धीरे-धीरे उनके पूरे संसार की नींव बन गया।
कुछ महीनों बाद दोनों की शादी हो गई। छोटा-सा घर था, सीमित साधन थे, लेकिन दिलों में अथाह सुकून था। सुबह की चाय साथ होती, शाम की थकान साथ बांटी जाती और हर मुश्किल आधी लगने लगी।
आर्या अक्सर सोचती जिस प्यार को उसने कभी खोजा ही नहीं, वही अनजाने में उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा सहारा बन गया।सच ही है, कुछ रिश्ते किस्मत लिखती है। वे अचानक मिलते हैं, चुपचाप दिल में बस जाते हैं, और फिर एक अनजाने प्यार से पूरा संसार बसा देते हैं।
