विनोद कुमार झा
मिथिलांचल के एक छोट सा गाँव छल हरियर खेत, कच्चा रास्ता आ माटि के खुशबू सँ भरल। ओही गाँव में रहैत छल रामचरित्र झा, जेकर जीवन एकदम साधारण छल, मुदा मन बहुत विशाल। हुनकर घर पुरान छल, दीवार में दरार पड़ल, आ छपड़ सऽ जगह-जगह सँ पानी टपकैत छल मुदा ओहि घर में प्रेम आ अपनापन के कमी नै छल।
रामचरित्र झा के एकटा बेटा छल जिनकर नाम गोपाल छल। गोपाल बचपन सँ बहुत होनहार छल, मुदा किस्मत ओकरा संग खेल खेलैत रहल। घर के हालत खराब होइत गेल, खेत कम होइत गेल, आ आमदनी सेहो घटैत गेल। रामचरित्र दिन-रात मेहनत करैत रहलाह, मुदा “टूटल खाट” अर्थात् फूटल किस्मत हुनका छोड़ए के नाम नै लैत छल।
एकटा पुरान माटिक घर जकर देबाल पर मिथिला पेंटिंग (अरपन) के किछ धंधलैल निशान अछि। ओहि ओसारी पर एकटा टूटल खाट बिछल अछि। ओहि खाट पर एकटा फाटल सुजनी (मिथिलाक पारंपरिक हाथ सँ सिएल रजाई/चादर) बिछल अछि, जकर रंग समय के साथ उड़ि गेल अछि मुदा ओकर एक-एक टांका में कोनो माय या दादी के ममता के निशान देखैत अछि।
घरक छपड़ (खपरैल) सँ सूर्य के रोशनी छान कऽ आबि रहल अछि। कतौ कोनो कोना में कनि जलजमाव के निशान अछि जे टपकैत पानि के गवाही दऽ रहल अछि। रामचरित्र झा खाट के कात में बैसल एकटा वृद्ध व्यक्ति, धोती-कुर्ता पहिरने, मुसकुराइत चेहरा जे ई कहि रहल अछि जे "सुख सुविधा तऽ कम अछि, मुदा संतोष बहुत अछि।"
गाँव में एक कहावत छल “जकड़ खाट टूटल, ओकरा भाग्य सेहो रूठल।” रामचरित्र पर ई कहावत सटीक बैठैत छल। जखन कखनो किछु अच्छा होए के उम्मीद जगैत, तखने कोनो नई समस्या सामने आबि जाए। कखनो फसल खराब, त कखनो बीमारी।
एक दिन गोपाल शहर जाए के फैसला कएलक। ओकरा लग केवल एक “फाटल सुजनी” छल पुरान थैला, जेकर कोना-कोना फाटल छल। ओही में ओ अपन किछु कपड़ा आ सपना भरि क’ शहर चलि पड़ल। जाते समय माई के आँखि में आँसू छल, मुदा उम्मीद सेहो छल “हमर बेटा जरूर किछु करि देखाएत।”
शहर में गोपाल के बहुत संघर्ष करए पड़ल। कखनो पेट भर खाना नै, त कखनो सुतए के जगह नै। मुदा ओ हार नै मानलक। दिन में मजदूरी, रात में पढ़ाई ई दिनचर्या बनि गेल। धीरे-धीरे ओ अपन मेहनत सँ आगे बढ़ए लागल।
ओहि फाटल सुजनी में अब केवल कपड़ा नै, बल्कि मेहनत आ संघर्ष के कहानी बसल छल। गोपाल ओहि सुनी के कखनो फेंकलक नै किएक तँ ओ ओकर पहचान बनि गेल छल।
समय धीरे-धीरे बदलए लागल। शहर में नई-नई तकनीक आबि रहल छल, लोग मोबाइल आ इंटरनेट के माध्यम सँ दुनिया सँ जुड़ि रहल छल। गोपाल सेहो ई बदलाव के अपनाबए लागल। ओ राति में पढ़ाई के संग कंप्यूटर सीखए लगल। जे लड़का कखनो फाटल सुजनी ल’ क’ शहर एल छल, ओ आब आधुनिक सोच के संग अपन जीवन के नई दिशा दे रहल छल।
शहर के समाज सेहो बदलि रहल छल। पहिने जँ गरीब आदमी के कदर कम छल, त अब मेहनत आ हुनर के आधार पर लोग अपन पहचान बना रहल छल। गोपाल के ई बात बुझायल “पहचान जन्म सँ नै, कर्म सँ बनैत छै।” ई सोच ओकरा अंदर एक नई आगि जगा देलक।
गोपाल एक छोट नौकरी सँ शुरुआत कएलक, मुदा धीरे-धीरे ओ अपन काबिलियत सँ ऑफिस में अलग पहचान बना लेलक। जे लोग पहिने ओकर फाटल कपड़ा देख क’ हँसैत छल, ओहि लोग आब ओकर सलाह लए लगल। समाज में ओकर इज्जत बढ़ए लागल। अब ओ केवल रामचरित्र के बेटा नै, बल्कि अपन मेहनत सँ बनल “गोपाल बाबू” बनि गेल।
गाँव में सेहो बदलाव के लहर पहुँचल। सड़क बनल, बिजली आयल, बच्चा स्कूल जाए लगल। रामचरित्र ई सब देख क’ खुश होइत रहलाह। हुनका बुझायल जे समय चाहे कतेक कठिन कियैक नै हो, बदलाव जरूर आबैत छै। गोपाल जखन छुट्टी में गाँव आबैत, त ओ बच्चा सभ के पढ़ाई के महत्व बुझाबैत।
गोपाल अपन कमाई सँ गाँव में एक छोट स्कूल खोललक। ओ कहलक “हमरा जइसन कोनो बच्चा सिर्फ गरीबी के कारण सपना नै छोड़ए।” धीरे-धीरे ओ स्कूल गाँव के पहचान बनि गेल। अब ओहि गाँव के नाम आसपास के इलाका में सम्मान सँ लेल जाए लागल।
गोपाल अपन फाटल सुजनी के स्कूल के एक कोना में टांगि देलक। ओ बच्चा सभ के कहैत “ई सुनी हमरा सिखौलक जे कठिनाई के सामने झुकब नै, लड़ब जरूरी छै।”
समय आ समाज के बदलाव में गोपाल के पहचान एक मिसाल बनि गेल। लोग कहए लगल “टूटल खाट हो या फाटल सुजनी, जँ हिम्मत अछि त सब कुछ बदलि सकैत छै।”
विनोद कुमार झा जी के ई पंक्तियाँ गरीबी में सेहो जे गरिमा आ प्रेम अछि, ओकरा बहुत नीक सँ दर्शबैत अछि। जेना कहल जाइत अछि "सुख तऽ मनक स्थिति अछि, धनक स्थिति नै।"
अंत में रामचरित्र अपन बेटा के देख क’ गर्व सँ भरि उठलाह। ओ बुझि गेलाह जे किस्मत भले टूटल रहे, मुदा मेहनत आ समय के संग ओ जुड़ि गेल। ई कहानी केवल एक परिवार के नै, बल्कि बदलैत समय में हर ओ आदमी के छै, जे अपन पहचान खुद बनाबए के हिम्मत रखैत छै।

