अंधेरे रात में बदनाम मुसाफिर...

 लेखक: विनोद कुमार झा 

रात का सन्नाटा जितना गहरा होता है, उतनी ही स्पष्ट हो जाती हैं इंसान की आवाज़ें बाहर की भी और भीतर की भी। उस रात भी कुछ ऐसा ही था। आसमान में बादल थे, चाँद कहीं छिपा हुआ था, और हवा में एक अजीब-सी ठंडक थी जो सिर्फ मौसम की नहीं, बल्कि किसी अनजाने डर की प्रतीत होती थी।

दिल्ली से लगभग पचास किलोमीटर दूर एक छोटा-सा कस्बा रतनपुर जहां दिन में बाजार की चहल-पहल रहती थी, वहीं रात के अंधेरे में यह कस्बा एकदम वीरान हो जाता था। लोग जल्दी-जल्दी अपने घरों में घुस जाते, दरवाजे बंद कर लेते, जैसे रात में बाहर कोई खतरा मंडरा रहा हो। उस रात करीब साढ़े ग्यारह बजे, कस्बे के मुख्य बस स्टैंड पर एक बस आकर रुकी। बस लगभग खाली थी। उसमें से एक व्यक्ति उतरा लगभग चालीस वर्ष का, कंधे पर एक पुराना बैग, चेहरे पर थकान, और आंखों में अजीब-सी बेचैनी। उसका नाम था राघव।

राघव ने इधर-उधर नजर दौड़ाई। बस स्टैंड पर एक टूटी बेंच, एक बुझा हुआ लैम्पपोस्ट और दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़। उसने धीरे-धीरे कदम बढ़ाए और कस्बे की ओर चल पड़ा। चलते-चलते उसे एहसास हुआ कि कोई उसका पीछा कर रहा है। उसने पीछे मुड़कर देखा कोई नहीं था। उसने इसे अपना वहम समझा और आगे बढ़ गया। लेकिन कुछ कदम बाद फिर वही एहसास। इस बार उसने तेज़ी से पीछे देखा एक परछाईं थी, जो तुरंत ही गली में गायब हो गई।

राघव का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। वह सीधे एक पुराने ढाबे की ओर बढ़ा, जो अभी भी खुला हुआ था। ढाबे का मालिक, बूढ़ा हरनाम सिंह, उसे देखकर चौंका। “इतनी रात को? और इस हालत में?” हरनाम ने पूछा। “मुझे एक कमरा चाहिए… सिर्फ आज की रात के लिए,” राघव ने धीमी आवाज़ में कहा।

हरनाम ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। “यहाँ कमरे नहीं हैं… लेकिन पीछे एक छोटा-सा स्टोर है, अगर काम चल जाए तो…” राघव ने तुरंत हामी भर दी।

ढाबे के पीछे वह छोटा-सा कमरा धूल से भरा हुआ था, लेकिन राघव के लिए वह किसी महल से कम नहीं था उसने दरवाजा बंद किया, बैग को कोने में रखा और जमीन पर बैठ गया लेकिन उसकी बेचैनी खत्म नहीं हुई। उसने बैग खोला अंदर कुछ पुराने कागज़, एक फोटो और एक छोटा-सा पिस्तौल था।

फोटो को देखते ही उसकी आंखें नम हो गईं। फोटो में एक औरत और एक छोटी बच्ची थी मुस्कुराती हुई। “मैं वापस आऊंगा…” उसने खुद से कहा लेकिन क्या सच में वह वापस जा पाएगा?

रतनपुर में पिछले कुछ दिनों से एक खबर फैल रही थी “एक बदनाम मुसाफिर इस इलाके में घूम रहा है।” लोग कहते थे कि वह एक अपराधी है, जिसने अपने ही परिवार की हत्या की है और अब पुलिस से भाग रहा है। हर गली, हर चौक पर उसकी चर्चा थी। और उस रात, वही मुसाफिर रतनपुर में था।

सुबह होते ही कस्बे में हलचल शुरू हो गई। ढाबे पर भी लोग आने लगे। हरनाम सिंह चाय बना रहा था, तभी दो पुलिसवाले वहां पहुंचे। “यहाँ कोई बाहरी आदमी आया था क्या?” एक पुलिसवाले ने पूछा। हरनाम थोड़ा घबरा गया, लेकिन उसने खुद को संभाला। “नहीं साहब, यहाँ तो कोई नहीं आया…” तभी पीछे वाले कमरे का दरवाजा धीरे से खुला और राघव बाहर आया। पुलिसवालों की नजर उस पर पड़ी। एक पल के लिए सब कुछ ठहर गया। “यही है!” एक पुलिसवाले ने चिल्लाया।राघव ने बिना कुछ कहे भागना शुरू कर दिया।

कस्बे की गलियों में भगदड़ मच गई। लोग दरवाजों से झांकने लगे। “वही है… बदनाम मुसाफिर…” आवाजें गूंजने लगीं।राघव भागता रहा। उसे रास्ते याद नहीं थे, लेकिन वह रुकना नहीं चाहता था। उसे पता था अगर वह रुक गया, तो सब खत्म हो जाएगा। आखिरकार वह एक सुनसान खेत में पहुंचा। चारों ओर सिर्फ अंधेरा और सन्नाटा। लेकिन पुलिस ने उसे घेर लिया। “अब उसे भागने का कोई रास्ता नहीं है!” एक अधिकारी ने कहा। राघव ने धीरे-धीरे अपने हाथ ऊपर कर दिए।

“तुम पर अपने परिवार की हत्या का आरोप है… क्या कहना है?” अधिकारी ने पूछा। राघव की आंखों में आंसू आ गए। “मैंने किसी को नहीं मारा…” उसकी आवाज कांप रही थी। “तो फिर भाग क्यों रहे हो?” “क्योंकि मुझे कोई सुनने को तैयार नहीं…”

राघव को थाने ले जाया गया। पूरे कस्बे में खबर फैल गई “बदनाम मुसाफिर पकड़ा गया।”लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। थाने में एक युवा महिला अधिकारी थी अदिति। उसने केस की फाइल उठाई और ध्यान से पढ़ना शुरू किया। फाइल में लिखा था  नाम: “राघव, उम्र 40, पेशा: पत्रकार। आरोप: पत्नी और बेटी की हत्या।” अदिति को कुछ अजीब लगा। “अगर उसने हत्या की है, तो उसने खुद पुलिस को सूचना क्यों दी?” उसने सोचा। उसने राघव से मिलने का फैसला किया।

“तुम सच बताओ… क्या हुआ था?” अदिति ने पूछा। राघव ने गहरी सांस ली। “मैं एक पत्रकार था… मैंने एक बड़े घोटाले का खुलासा किया था… कुछ ताकतवर लोग उसमें शामिल थे…”

“फिर?” “उन्होंने मुझे धमकी दी… मैंने नजरअंदाज कर दिया… और एक रात… जब मैं घर लौटा… तो…” उसकी आवाज रुक गई। “मेरी पत्नी और बेटी… खून से लथपथ पड़ी थीं…” अदिति स्तब्ध रह गई। “मैंने पुलिस को फोन किया… लेकिन जब वे आए… तो उन्होंने मुझे ही गिरफ्तार करने की कोशिश की… मैंने देखा कि केस को दबाया जा रहा है… और मुझे ही दोषी ठहराया जा रहा है…” “तो तुम भाग गए?” “हाँ… क्योंकि मुझे पता था—अगर मैं पकड़ा गया, तो सच कभी सामने नहीं आएगा…” अदिति के मन में सवालों का तूफान उठ गया। क्या राघव सच कह रहा था? या यह सिर्फ एक कहानी थी?

अगले कुछ दिनों में अदिति ने खुद जांच शुरू की। उसने पुराने रिकॉर्ड खंगाले, गवाहों से बात की, और धीरे-धीरे सच सामने आने लगा। वह घोटाला सच था। और उसमें कुछ बड़े नाम शामिल थे।

एक रात, अदिति को एक गुप्त कॉल आया।“अगर सच जानना है, तो पुरानी मिल में आओ…” अदिति वहां पहुंची। वहां जो उसने देखा, वह चौंकाने वाला था। कुछ लोग बैठे थे वही लोग, जिनके नाम उस घोटाले में थे और उनके पास… राघव के परिवार की हत्या के सबूत थे। अदिति ने तुरंत पुलिस को सूचना दी। छापा पड़ा। सभी गिरफ्तार हुए और सच सामने आ गया।

कुछ दिनों बाद, अखबार की हेडलाइन थी “बदनाम मुसाफिर नहीं, सच का सिपाही राघव बरी” राघव को रिहा कर दिया गया। लेकिन उसकी आंखों में अब भी वही खालीपन था। उसने सब कुछ खो दिया था।

एक शाम, वह उसी बस स्टैंड पर खड़ा था, जहां से उसकी कहानी शुरू हुई थी। अदिति उसके पास आई और पूछा “अब क्या करोगे?” उसने पूछा। राघव ने हल्की मुस्कान दी। “सच लिखूंगा… क्योंकि यही मेरा काम है…”बस आ गई। राघव उसमें चढ़ गया और इस बार, वह एक बदनाम मुसाफिर नहीं, बल्कि एक सच्चा योद्धा बनकर जा रहा था।

समाप्त

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