कौन कहता है कि प्यार अंधा होता है?
विनोद कुमार झा
शहर की भीड़-भाड़, भागती ज़िंदगी और हर चेहरे पर चढ़ी एक अदृश्य मुखौटे की परत के बीच, कुछ कहानियाँ ऐसी भी होती हैं जो न तो अखबार की सुर्खियों में जगह पाती हैं और न ही सोशल मीडिया की चकाचौंध में। मगर जब वे सामने आती हैं, तो समाज के आईने को साफ कर जाती हैं। यह कहानी भी कुछ ऐसी ही है जहाँ लोग कहते हैं “प्यार अंधा होता है”, लेकिन सच इसके ठीक उलट है।
एक अनदेखी मुलाकात : भागलपुर के एक साधारण से मोहल्ले में रहने वाला आदित्य एक मध्यमवर्गीय परिवार का लड़का था। पढ़ाई में तेज, व्यवहार में सरल और सपनों में बहुत बड़ा। उसके पिता एक स्कूल में शिक्षक थे और माँ गृहिणी। आदित्य की दुनिया किताबों और सपनों के बीच सिमटी हुई थी।
दूसरी ओर, उसी शहर के एक प्रतिष्ठित परिवार की लड़की समीक्षा खूबसूरती, आत्मविश्वास और आधुनिक सोच का संगम। वह कॉलेज की सबसे लोकप्रिय छात्राओं में गिनी जाती थी। लेकिन उसके भीतर एक गहरी संवेदनशीलता छिपी थी, जिसे बहुत कम लोग समझ पाते थे।
दोनों की मुलाकात कॉलेज की लाइब्रेरी में हुई। आदित्य एक कोने में बैठा पढ़ रहा था और समीक्षा अपने दोस्तों के साथ हँसी-मजाक करते हुए अंदर आई। किताबों की शांति में उसकी हँसी कुछ अलग ही गूंज रही थी।
“सॉरी,” समीक्षा ने धीरे से कहा, जब लाइब्रेरियन ने उसे चुप रहने को कहा। आदित्य ने सिर उठाकर पहली बार उसे देखा। वह नज़ारा जैसे किसी फिल्म का पहला सीन हो। लेकिन आदित्य ने तुरंत नजरें झुका लीं क्योंकि वह जानता था कि ये दुनिया उसकी नहीं है।
धीरे-धीरे बढ़ती नज़दीकियाँ : दिन बीतते गए। लाइब्रेरी अब दोनों के लिए एक साझा जगह बन चुकी थी। कभी किताबों के बहाने, कभी नोट्स के जरिए, दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई।
“तुम हमेशा इतने शांत क्यों रहते हो?” समीक्षा ने एक दिन पूछा। आदित्य मुस्कुराया, “शोर में बातें खो जाती हैं, इसलिए चुप रहना बेहतर लगता है।” “लेकिन कुछ बातें कहनी भी ज़रूरी होती हैं,” समीक्षा ने जवाब दिया। यहीं से उनके बीच एक अलग तरह की समझ विकसित होने लगी। यह आकर्षण नहीं था, न ही कोई दिखावा। यह कुछ ऐसा था जो धीरे-धीरे गहराता गया।
समाज की नज़र और पहली दीवार : जब कॉलेज में दोनों की दोस्ती की चर्चा होने लगी, तो लोगों ने अपने-अपने अंदाज़ में बातें बनानी शुरू कर दीं। “देखा उस लड़की को? उस लड़के के साथ घूम रही है…” “अरे वो? वो तो बहुत अमीर घर की है…” “लड़का तो साधारण है, ये रिश्ता टिकेगा नहीं…” इन बातों ने दोनों के बीच दूरी पैदा करने की कोशिश की। लेकिन समीक्षा ने एक दिन आदित्य से साफ कहा “लोग क्या कहते हैं, इससे फर्क पड़ता है?” आदित्य ने धीमे से कहा, “फर्क नहीं पड़ता… लेकिन असर जरूर पड़ता है।”
सच्चाई का सामना : एक दिन समीक्षा के पिता को इस रिश्ते के बारे में पता चला। घर में तूफान आ गया। “तुम्हें समझ नहीं है? वो लड़का हमारे स्तर का नहीं है!” “पापा, इंसान का स्तर उसके दिल से होता है, पैसे से नहीं,” समीक्षा ने दृढ़ता से कहा।लेकिन समाज के दबाव, परिवार की प्रतिष्ठा और रिश्तेदारों की बातें—सब मिलकर एक बड़ी दीवार बन गए। उधर आदित्य ने भी दूरी बनानी शुरू कर दी। उसने सोचा “शायद यही सही है। मैं उसकी दुनिया के लायक नहीं हूँ।”
बिछड़ने का दर्द : एक शाम, जब दोनों आखिरी बार मिले, तो न कोई शिकायत थी, न कोई वादा। “तुम खुश रहना,” आदित्य ने कहा। “तुम भी,” समीक्षा की आँखों में आँसू थे। दोनों अलग हो गए लेकिन दिलों में एक अधूरी कहानी छोड़ गए।
पाँच साल बीत गए। आदित्य अब एक सफल पत्रकार बन चुका था। उसने अपने संघर्ष से खुद को साबित किया। उसके लेख राष्ट्रीय अखबारों में छपने लगे। समीक्षा की शादी एक बड़े बिजनेसमैन से हो गई थी। सब कुछ था उसके पास पैसा, शोहरत, आराम लेकिन सुकून नहीं।
एक दिन अखबार में आदित्य का लेख पढ़ते हुए उसकी नजर एक लाइन पर ठहर गई “प्यार अंधा नहीं होता, हम उसे अंधा बना देते हैं समाज के डर से।” समीक्षा की आँखों से आँसू बह निकले।
फिर एक मुलाकात : एक कार्यक्रम में दोनों आमने-सामने आए। “कैसी हो?” आदित्य ने पूछा। “ठीक हूँ… शायद,” समीक्षा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा। कुछ देर की खामोशी के बाद समीक्षा बोली “तुम सही थे… प्यार अंधा नहीं होता।” आदित्य ने कहा “हाँ, हम ही आँखें बंद कर लेते हैं।” यह कहानी किसी एक आदित्य या समीक्षा की नहीं है। यह उन लाखों लोगों की कहानी है जो प्यार करते हैं, लेकिन समाज के डर से उसे खो देते हैं।
क्या प्यार सच में अंधा होता है?
नहीं। प्यार तो सबसे ज्यादा देखने वाला भाव है वह इंसान के भीतर की अच्छाई, सच्चाई और आत्मा को देखता है। अंधा तो समाज है, जो जाति, पैसे और प्रतिष्ठा के चश्मे से हर रिश्ते को तौलता है। जब भी आप किसी को प्यार करें, तो यह मत सोचिए कि लोग क्या कहेंगे। यह सोचिए कि आपका दिल क्या कहता है।
क्योंकि “प्यार अंधा नहीं होता, हम ही उसे देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।” प्यार को साबित करने के लिए आँखें बंद नहीं, बल्कि दिल खोलने की जरूरत होती है। समाज की परिभाषाओं से ऊपर उठकर, अगर हम रिश्तों को समझना सीख जाएँ, तो शायद बहुत सी अधूरी कहानियाँ पूरी हो जाएँ।और तब कोई यह नहीं कहेगा ‘प्यार अंधा होता है’, बल्कि यह कहेगा ‘प्यार सबसे ज्यादा देखने वाली चीज़ है।’
